श्रृद्धांजलि *********** शशिकपूर :अभिनय की एक दीवार – राकेश अचल

1505

श्रृद्धांजलि
***********
शशिकपूर :अभिनय की एक दीवार
*********************************
आज शाम की चाय का जायका शशिकपूर के निधन की खबर से अचानक कसैला हो गया..एक साथ चार-पांच दशकों पुराने शशिकपूर के तमाम चेहरे सामने तैरने लगे .फिल्मों में रसीले अंदाज का एक चुलबुला,शांत अभिनेता अब हम दोबारा कभी नहीं देख पाएंगे .
कपूर खानदान के स्तम्भ शशिकपूर मेरे जन्म से एक दशक पहले से सिनेमा में काम करने लगे थे ,लेकिन वे मेरे प्रिय अभिनेता थे इसलिए मैंने बीस साल बाद उनकी अपने जन्म से पहले बनी तमाम फ़िल्में तो देखीं ही साथ ही उनकी शायद ही कोई फिल्म ऐसी होगी जो न देखी हो.कभी स्कूल से भाग कर देखि तो कभी तीज-त्यौहार की छुट्टी उनकी फिल्मों के नाम कर दी .
मेरे जन्म के पहले 1950 से 1960 के बीच शशिकपूर समाधी ,संग्राम,आवारा और मोरध्वज में काम कर चुके थे.ये श्वेत श्याम फ़िल्में थीं लेकिन इनमें ही शशिकपूर की अभिनय क्षमता की परीक्षा हो गयी थी .धर्मपुत्र,मेंहदी लगे हाथ और बेनजीर इन फिल्मों के बाद आयीं लेकिन उनकाो पहचाना गया 1966 में आयी फिल्म ‘वक्त’से. इस फिल्म के हीरो भले ही उस ज़माने के दिग्गज बलराज साहनी थे लेकिन उनके बेटे के रूप में शशिकपूर दर्शकों के दिल में बस गए .
मील का पत्थर कही जाने वाली फिल्म वक्त के बाद शशिकपूर के पास फिल्मों की लाइन लग गयी.
शेक्सपियर वाला ,एक श्रीमान एक श्रीमती,जहाँ प्यार मिले,प्यार का मौसम,कन्यादान,आमने सामने,नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे और प्यार किये जा सातवें दशक की उन फिल्मों में शुमार थीं जिकी वजह से शशिकपूर उस दौर के युवाओं के नंबर वन हीरो बन गए थे ,1970 में शशि सुहाना सफर,अभिनेत्री और बॉम्बे टाकीज के जरिये दर्शकों के बीच आये और छा गए .1971 में आई शर्मीली ने तो जैसे धूम ही मचा दी थी.
शशिकपूर की पहली फिल्म ग्वालियर आकर मैंने जानवर और इंसान रॉक्सी सिनेमा में देखी थी .डिलाइट में ‘आ गले लग जा, देखने पता नहीं कितनी बार गया .पाप-पुण्य,रोटी-कपड़ा और मकान ,मिस्टर रोमियो ,चोर मचाये शोर,चोरी मेरा काम जैसी तमाम फिल्मे देखकर कभी जी नहीं भरा.कारण सबमें शशिकपूर थे.इनके जिले अधर और निर्दोष मुस्कान जानलेवा लगती थी .प्रेम कहानी,अनादि,सलाखें और दीवार में शशिकपूर ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया.आज के शाआंआँशांह अमिताभ बच्चन भी उनके सामने लरजते दिखाई दिए थे. जंजीर के संवाद लोग आज भी नहीं भूले.आप उन्हें अभिनय की दीवार भी कह सकते हैं .
नाच उठे संसार,जय बजरंगबली और शंकर दादा के बाद कभी-कभी में शशिकपूर को सबने सराहा,इनमें से कभी-कभी की धूम मची रही .कभी -कभी के बाद आपबीती,फकीरा,चोर-सिपाही,ईमानधर्म,मुक्ति,फरिश्ता और कातिल ,चक्कर पै चक्कर आई .हीरा और पत्थर,जूनून,त्रिशूल ,आहुति ,दो मुसाफिर तथा स्टीम-शिवम-सुंदरम में शशि की अदाकारी के अलग रंग सामने आये. अपना क़ानून,तृष्णा,मुकद्दर,हीरालाल-पन्नालाल,अतिथि अहसास में शशिकपूर की यादगार भूमिकाएं थीं.सुहाग,गौतम गोविंदा ,काला पत्थर,,नीयत शान,स्वयम्वर ,गंगा सूरज,दो और दो पांच ,कालीगता,मान गए उस्ताद में उनकी कई फ़िल्में चलीं तो अनेक फ्लॉप भी हुईं,लेकिन क्रान्ति में उनकी जोरदार वापसी हुई .शशि ने बाद में सिलसिल,क्रोधी,बसेरा,एक और एक ग्यारह,कलियुग,बेजुबान ,नमक हलाल,वकील बाबू और विजेता में भी काम किया.सवाल,बंधन कच्चे धागों का,उत्स्व,घर एक मंदिर,पाखंडी,यादों की जंजीर,-आसमान ,आंधी तूफ़ान ,भवानी जंक्शन,पिघलता आसमान जैसी अनेक फ़िल्में भारतीय दर्शकों को दीं लेकिन धीरे-धीरे उनका ग्लैमर कम होने लगा. २००० तक उन्होंने २० और फिल्मों में काम किया .पिछले सत्रह साल से वे फिल्मों दे दूर हो गए थे,उन्हें किसी ने रिटायर नहीं किया ,वे स्वेच्छा से घर बैठे .
शशिकपूर को फिल्मों के साथ ही रंगमंच से भी बहुत प्यार था,वे अंग्रेजी फिल्मों में काम करने वाले पहले भारतीय अभिनेता रहे .शशिकपूर ने हर किस्म की भूमिकाएं निभाईं लेकिन उनका चॉकलेटी रूप सबसे ज्यादा पसंद किया गया .कपूर खानदान के वे प्रतिभाशाली प्रतिनिधि थे,वे हमेशा विवादों से दूर रहे,शर्मिला टाइगर के साथ उनकी जोड़ी अक्सर सबसे ज्यादा पसंद की गयी .वर्ष १९७१ में पिता पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद शशि कपूर ने जेनिफर के साथ मिलकर पिता के स्वप्न को जरी रखने के लिए मुंबई में पृथ्वी थियेटर का पुनरूथान किया।
शशिकपूर अपने भाई शम्मी कपूर से एकदम अलग दिखाई देते थे.उन्होंने एक हीरो के रूप में एक लम्बे आरसे तक अपनी देह को सम्हाला,लेकिन बाद में वे भी परिवार के अनुवांशिक रोग मोटापे की चपेट में आ गए थे .शशिकपूर को अपने जीवन काल में वो सब मिला जो वे चाहते थे ,सिवाय इसके की वे अपने बेटे कुणाल को स्थापित अभिनेता के रूप में नहीं देख पाए,वर्ष २०११ में उनको भारत सरकार ने पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष २०१५ में उनको २०१४ के दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया। इस तरह से वे अपने पिता पृथ्वीराज कपूर और बड़े भाई राजकपूर के बाद यह सम्मान पाने वाले कपूर परिवार के तीसरे सदस्य बन गये।भारतीय साइन जगत में जब तक फिल्मों का वजूद रहेगा शशिकपूर को नहीं भुलाया जा सकेगा.एक मोहन कलाकार के रूप में शशिकपूर साहब को मेरी विनम्र श्रृद्धांजलि?
[जैसा आनन-फानन में याद आया ]
.