पैराडाइज पेपर्सः काले पन्नों के सफेद दागी – प्रमोद भार्गव

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कालेधन पर बड़ा प्रहार मानी जा रही नोटबंदी की सालगिरह के ठीक पहले विदेषों में कालाधन सफेद करने को लेकर बड़ा नया खुलासा हुआ है। इसके अठारह माह पहले पनामा पेपर्स के जरिए दुनियाभर के सफेद कुबेरों में 426 भारतीयों के नाम सामने आए थे। यह खुलासा जर्मनी के अखबार ‘ज्यूड डाॅयचे त्साइटंुग‘ ने किया था। इसी अखबार ने अब ‘इंटरनेषनल कंसोर्टियम आॅफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट (आईसीआईजे) नामक खोजी रिपोर्ट छापी है। इस रिपोर्ट को विष्व के 96 समाचार संस्थानों के पत्रकारों ने मिलकर फर्जी कंपनियों के जरिए कालाधन जमा करने वाले कुबेरों के दस्तावेजों को खंगाला और फिर विष्वस्तरीय खुलासा किया है। इनमें भारत का इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र समूह भी षामिल हैं। इसके लिए 1.34 करोड़ दस्तावेजों की छानबीन की गई। इनसे उजागर हुआ कि बरमूडा की सवा सौ साल पुरानी वित्तीय एवं कानूनी सलाहकार कंपनी ऐपलबे ने कालेधन का निवेष बड़ी मात्रा में कराया। इस खुलासे से पता चला है कि सबसे ज्यादा कालाधन जमा करने वाले लोगों में 31000 अमेरिका के 14000 ब्रिटेन और 12000 नागरिक बरमूडा के हैं। भारत के 714 लोगों के नाम पैराडाइज अभिलेखों में हैं। इनमें लोकप्रिय सिने अभिनेता अमिताभ बच्चन, केंद्रीय नागरिक एवं उड्डयन राज्य मंत्री जयंत सिन्हा, भाजपा के राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा, राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अषोक गहलोत, कांग्रेस नेता सचिन पायलट, पी. चिदंबरम के बेटे के साथ कार्ति चिदंबरम कारोबारी विजय माल्या, लाॅविस्ट नीरा राडिया, फोर्टिस-एस्काॅर्टस अस्पताल के अध्यक्ष डाॅ अषोक सेठ और संजय दत्त की पत्नी मान्यता दत्त जैसे प्रमुख लोगों के नाम षामिल हैं। हालांकि इस सूची में नाम होने से यह जाहिर नहीं होता कि ये लोग कर वंचना के दोशी है।

दरअसल विदेषी बैंकों में धन जमा करना कोई अपराध उस स्थिति में नहीं हैं, जब कायदे-कानूनों का पालन करके धन जमा किया गया हो। इसलिए यह जांच के बाद ही साफ होगा कि भारतीय नागरिकों ने कर चोरी करते हुए धन जमा किया है। दरअसल पनामा पेपर्स उजागार होने पर 426 भरतीयों के नाम सामने आए थे। इनकी जांच करने पर पता चला कि इनमें से 147 लोग और कंपनिया ही कार्यवाही के लायक हैं। लेकिन कर चोरी में लिप्त होने के बावजूद इनके विरुद्ध अब तक कोई कड़ी कार्यवाही नहीं की गई है। इस लिहाज से यह आषंका उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि सरकार कर चोरी करने वालों के विरुद्ध कोई कार्यवाही करना चाहती भी है या नहीं ? जबकि इन्हीं पनामा पेपर्स में नाम आने पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज षरीफ को न केवल सत्ता से वंचित होना पड़ा, बल्कि अदालती कार्यवाही का भी सामना कर रहे हैं।पैराडाइज दस्तावेज 180 देषों के नागरिक और कंपनियों से जुड़े हैं। इनमें भारत 19वें नबंर पर हैं। बरमूडा की ऐपलबे कंपनी अपनी दुनियाभर में फैंली 118 सहयोगी कंपनियों के जरिए दुनिया के भ्रश्ट नौकरषाहों, राजनेताओं, उद्योपतियों और अन्य व्यवसायों से जुड़े लोगों का कालाधन विदेषी बैंकों में जमा कराने के दस्तावेज तैयार करती है। बहुराश्ट्रय कंपनियों के षेयर खरीदने-बेचने और उनमें भागीदारी के फर्जी दस्तावेज भी यह कंपनी तैयार कराती है। कर चोरी का ये लोग दुनिया के उन देषों में अपने धन को सुरक्षित रखते है, जिन्हें कालेधन का स्वर्ग कहा जाता है।

एक जमाने में स्विट्जरलैंड इसके लिए बदनाम था। लेकिन अब माॅरिषस, बरमूडा, बहामास, लग्जमबर्ग और कैमन आईलैंड देष भी कालेधन को सुरक्षित रखने की सुविधा कालेधन के कुबेरों को दे रहे हैं। इन देषों ने ऐसे कानून बनाए हुए हैं, जिसे लोगों को कालाधन जमा करने की वैधानिक सुविधा प्राप्त होती है। दरअसल इसी धन से इन देषों की अर्थव्यवस्थाएं गतिषील हैं। बरमूडा एक छोटा देष है और वहां प्राकृतिक एवं खनिज संपदाओं की कमी है। इसलिए यह देष अपनी अर्थव्यवस्था को गतिषील बनाए रखने के लिए देष तस्कर व अपराधियों का धन भी सफेद बनाने का काम बड़े पैमाने पर करता है। यही वजह है कि स्विस बैंकों की तरह बरमूडा  भी काले कारोबारियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया है। हालांकि इसके पहले भी भारतीय लोगों के नाम इस तरह के खुलासों में आते रहे हैं। अप्रैल 2013 में आॅफषोर लीक्स के नाम से पहला खुलासा हुआ था। इसमें 612 भारतीयों के नाम षामिल थे। फिर स्विस लीक्स नामक खुलासा हुआ। इसमें 1195 भारतीयों के नाम थे। इनके खाते एचएसबीसी बैंक की जिनेवा षाखा में बताए गए थे। इसके बाद 2016 में पनामा लीक्स के जरिए 426 भारतीयों के नाम सामने आए थे। इन सभी खुलासों के बावजूद कर चोरी करने वालों पर अब तक कोई ठोस कार्यवाही सामने नहीं आ पाई है। नरेंद्र मोदी सरकार नोटबंदी और षेल कंपनियों पर कानूनी षिकंजे को बड़ी कार्यवाही मानकर चल रही है। लेकिन इन सब कोषिषों से कालेधन के उत्सर्जन पर कितना असर पड़ा, यह पारदर्षिता के साथ स्पश्ट नहीं हो पाया है ? यदि समय रहते फर्जी कंपनियां बनाने वालों पर कड़ी कानूनी कार्यवाही नहीं की गई तो कल को फिर से कागजी कंपनियां वजूद में आ जाएंगी ? दरअसल हमारा प्रषानिक ढांचा कुछ ऐसा है कि वह गलत काम करने वालों को कानूनी सरंक्षण देता है। इसलिए अवसर मिलते ही नए-नए गोरखधंधे षुरू हो जाते हैं। सरकार जिस तरह से उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप और स्टेंडअप जैसे तकनीकि कारोबारियों को प्रोत्साहित कर रही है, उसमें षेल कंपनियों को बढ़ने में देर नहीं लगेगी।                                                                                                                                                                                                                               दरअसल दुनिया में 77.6 प्रतिषत काली कमाई ‘ट्रांसफर प्राइसिंग‘ मसलन संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण के मार्फत पैदा हो रही है। इसमें एक कंपनी विदेषों में स्थित अपनी सहायक कंपनी के साथ हुए सौदों में 100 रुपए की वस्तु की कीमत 1000 रुपए या 10 रुपए दिखाकर करों की चोरी और धन की हेराफेरी करती हैं। ऐपलबे कंपनी यही गोरखधंधा कर रही थी। भारत समेत दुनिया में जायज-नजायज ढंग से अकूत संपत्ति कमाने वाले लोग ऐसी ही कंपनियों की मदद से एक तो कालेधन को सफेद में बदलने का काम करते हैं,दूसरे विदेष में इस पूंजी को निवेष करके पूंजी से पूंजी बनाने का काम करते हैं। हालांकि कंपनी ने दस्तावेजों के लीक होने के बाद दावा किया है कि वह तो विधि-सम्मत काम करती है। दरअसल समस्या की असली जड़ यहीं हैं।

यूरोप के कई देषों ने अपनी अर्थव्यस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए दोहरे कराधान कानूनों को वैधानिक दर्जा दिया हुआ है और इन्हें अंतरराश्ट्रीय स्तर पर सरंक्षण प्राप्त है। बरमूडा, पनामा और स्विट्रलैंड जैसे देषों के बैंकों को गोपनीय खाते खोलने, धन के स्रोत छिपाने और कागजी कंपनियों के जरिए लेनदेन के कानूनी अधिकार हासिल हैं। भारत में ‘प्रर्वतन निदेषालय एचएसबीसी और उससे पहले की आईसीआईजे के राजफाष पर 43 विदेषी खातों की जांच कर रहा है। आईसीआइजे द्वारा 2013 में बताई गई सूचना के आधार पर राजस्व विभाग के 434 लोगों की पहचान की है, जिनमें से 184 ने विदेषी इकाइयों से सौदे की बात स्वीकार ली है। इन खातों के विस्तृत आकलन के बाद लगभग 6500 करोड़ रुपए की अवैध संपत्ति का पता चला है। ‘अमेरिका सीनेट की एक रिपोर्ट से भी यह उजागर हुआ था कि ब्रिटेन के हांगकांग एंड षंघाई बैंक काॅर्पोरेषन यानी एचएसबीसी बैंक मनी लाॅन्ड्रिंग में षामिल है। रिपोर्ट में स्पश्ट तौर से कहा गया था कि इस बैंक के कर्मचारियों ने गैर कानूनी तरीक से कालाधन का हस्तांतरण किया है। कुछ धन का लेनदेन आतंकवादी संगठनों को भी किया है। इस खुलासे के बाद भारतीय रिर्जव बैंक ने भी अपने स्तर पर पड़ताल की थी, लेकिन इस पड़ताल के निश्कर्श क्या निकले,यह कोई नहीं जानता ?भारत में इस खुलासे के बाद राजनीतिक सरगर्मी तेज होना लाजिमी है, वैसे भी गुजरात और हिमाचल प्रदेष में चुनाव चल रहे है, इसलिए आरोप-प्रत्यारोप और गहराएंगे। अब तक कांग्रेस पर ही कालेधन को छुपाने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन इस बार केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा और सांसद आरके सिन्हा के नाम आने से भाजपा भी कठघरे में है। वह इस मुद्दे पर कैसे पाक साफ निकल पाएगी चुनावी परीक्षा की घड़ी में यह मुष्किल काम है।
प्रमोद भार्गव

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लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।