घट-बढ़ का खेल ……! राकेश अचल

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घट-बढ़ का खेल
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@राकेश अचल@
डीजल-पेट्रोल के दाम रोजाना तय करने की नीति से हर रोज उपभोक्ता की जेबें काटने वाली केंद्र और राज्य सरकारें चुनाव नजदीक आते देख दामों के घट-बढ़ का खेल खेल रहीं हैं,ताकि जनता का वोट आसानी से हासिल किया जा सके .इसी कड़ी में मध्यप्रदेश ने भी डीजल और पेट्रोल पर से वेट की दर कम कर दी है .अब सरकार के जन हितैषी होने का ढिंढोरा पीटा जा रहा है .
केंद्र सरकार ने कांग्रेस द्वारा प्रस्तावित पेरोल-डीजल की दरें तय करने के फार्मूले को अपनाकर बीते अनेक महीनों में जनता की जेब पर ऐसा डाका डाला की हर कोई देखता रह गया .जब दुनिया में डीजल-पेट्रोल के दाम गिर रहे थे तब भारत में इन दोनों ईंधनों के दाम आसमान छू रहे थे और सरकारें मौन थीं .विपक्ष को काठ मार गया था ,जनता असहाय थी,न कहीं कोई प्रदर्शन हुआ और न कहीं कोई प्रतिकार ,फलस्वरूप सरकारों के हौसले बुलंद होते रहे ,लेकिन जैसे ही प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में विधानसभा के चुनाव नजदीक आये पूरे देश में भाजपा शासित राज्य सरकारों ने डीजल और पेट्रोल के दाम कम करने के लिए वेट कम करना शुरू कर दिया .
पेट्रोल और डीजल के दामों को लेकर जब पानी सर के ऊपर निकलने लगा तब केंद्र सरकार ने राज्यों से अपील की थी कि वो तेल उत्पादों से वैट घटाएं जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम हो सकें। इससे पहले केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी 2 रुपये कम कर दी थी। केंद्र की अपील पर सबसे पहले गुजरात ने ही पेट्रोल-डीजल पर वैट हटाने की पहल की क्योंकि इसी राज्य में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और इसी राज्य में भाजपा का एक छत्र राज्य संकट में है. । गुजरात, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश के बाद अब मध्य प्रदेश सरकार ने भी पेट्रोल-डीजल पर वैट घटा दिया है। घटी हुई कीमतें आज आधी रात से लागू होंगी। राज्य सरकार ने पेट्रोल पर 3 फीसदी और डीजल पर 5 फीसदी वैट को घटा दिया है यानि अब पेट्रोल 1.70 रुपये और डीजल 4 रुपये सस्ता हो जाएगा। पूरे देश में सबसे ज्यादा वैट भी मध्य प्रदेश में ही लगता है अभी यहां पर वैट की दर 49 फीसदी है।
देश की जनता को लूटने के बाद अब पेट्रोल और डीजल को गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के दायरे में लाने की मांग के बीच उत्तर भारत के आधा दर्जन राज्यों ने सिर जोड़ लिए हैं। हरियाणा, पंजाब, चंडीगढ़, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हिमाचल और राजस्थान ने सहमति बना ली कि उनके यहां पेट्रोलियम पदार्थो के दाम घटाने अथवा बढ़ाने का निर्णय एकमत से लिया जाएगा।सूत्रों का कहना है की इन सभी राज्यों की सीमा आपस में मिलती है। तर्क दिया गया कि यदि कोई पड़ोसी राज्य पेट्रोलियम पदार्थों के रेट कम करेगा तो उसके यहां बिक्री बढ़ने लगेगी और साथ लगते राज्य में बिक्री घटने के साथ ही राजस्व कम होने लगेगा। बता दें कि पेट्रोल व डीजल पर जीएसटी और एक्साइज ड्यूटी मिलाकर करीब 57 फीसद टैक्स देना पड़ता है। देश भर में मांग उठ रही कि पेट्रोल व डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए, ताकि अधिकतम 28 फीसद टैक्स ही वसूला जा सके।
आपको पता होगा की राज्यों की सबसे अधिक आय पेट्रोल व डीजल की बिक्री से होती है, ऐसे में यदि इनकों जीएसटी के दायरे में लाया गया तो उनका राजस्व घट जाएगा। इसलिए कोई भी राज्य जीएसटी काउंसिल में पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाने की पैरवी नहीं कर रहा है।केंद्र सरकार ने हालांकि राज्यों को पेट्रोलियम पदार्थो पर वैट कम करने का अधिकार दिया है। कुछ राज्य इसे कम करना भी चाहते हैं, लेकिन उत्तर भारत के उक्त राज्यों ने तय किया कि इतना वैट किसी सूरत में कम नहीं होगा, जिससे आपस में पेट्रोलियम पदार्थो के दामों में अधिक अंतर आ जाए।’कुल मिला कर अब डीजल और पेट्रोल की कीमतें सीधे सियासत से जुड़ गयीं हैं ,जनता के हितों से इनका कोई लेना-देना नहीं है .अब देखना होगा की भाजपा शासित राज्यों में जनता की आँखों में धूल झोंकने के इस प्रयोग का किसे कितना सियासी लाभ होता है .
@ राकेश अचल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवम साहित्यकार है।