राजनीति में महेंद्र सिंह कालूखेड़ा जैसे सच्चे सहयोगी सिंधिया परिवार को कहां मिलेंगे ! कालूखेड़ा की सिंधिया परिवार के  प्रति निष्ठा ने राजनीति को किया गौण…- अशोक कोचेटा

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श्रृद्धांजलि
अशोक कोचेटा
शिवपुरी। पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद और विधानसभा की लोकलेखा कमेटी के अध्यक्ष महेंद्र सिंह कालूखेड़ा का निधन सिंधिया परिवार के लिए एक अपूर्णनीय क्षति है। लंबे समय तक राजनीति में रहने के बाद भी श्री कालूखेड़ा ने पॉलिटिक्स से ऊपर रॉयल फैमिली के प्रति अपनी वफादारी का अंतिम क्षण तक परिचय दिया। स्व. राजमाता विजयराजे सिंधिया के साथ वह जनसंघ से जुड़े रहे और विधायक बने, लेकिन जब स्व. माधवराव सिंधिया कांग्रेस में आए तो श्री कालूखेड़ा भी उनके साथ कांग्रेस में आ गए और जब स्व. सिंधिया ने कांगे्रस छोड़कर नई पार्टी बनाई तो भी स्व. कालूखेड़ा की उनके प्रति निष्ठा में कमी नहीं आई। सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी महेंद्र सिंह कालूखेड़ा ने साथ नहीं छोड़ा और यह सच्चाई है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनीति में स्थापित करने में महेंद्र सिंह कालूखेड़ा का अहम योगदान रहा है। श्री कालूखेड़ा का शिवपुरी से भी गहरा रिश्ता रहा है और सिंधिया समर्थकों में उनकी लोकप्रियता अपार है। सच्चाई तो यह है कि सिंधिया समर्थक सांसद सिंधिया से अधिक उनसे आत्मीय लगाव रखते हैं।
शिवपुरी की राजनीति में महेंद्र सिंह कालूखेड़ा स्व. राजमाता विजयराजे सिंधिया और स्व. माधवराव सिंधिया के जीवनकाल में काफी सक्रिय रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से उनका शिवपुरी काफी कम आना जाना रहा है, लेकिन इसके बाद भी सिंधिया समर्थकों में उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। स्व. राजमाता विजयराजे सिंधिया के जीवनकाल में उनके संसदीय चुनाव की बागडोर महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के हाथों में रहा करती थी और उस दौरान वह अशोकनगर से जनसंघ के विधायक भी निर्वाचित हुए थे। 1977 के बाद जब राजमाता विजयराजे सिंधिया और उनके सुपुत्र माधवराव सिंधिया के राजनैतिक रास्ते अलग हुए तो महेंद्र सिंह कालूखेड़ा भले ही स्व. सिंधिया के साथ चले गए, लेकिन राजमाता के प्रति उनकी आत्मीयता में लेशमात्र भी कमी नहीं आई। कौन नहीं जानता कि वर्ष 1996 में राजमाता के खिलाफ चुनाव लडऩे के लिए उस समय के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने वर्तमान जिला कांग्रेस अध्यक्ष और कांग्रेस विधायक रामसिंह यादव को ललचाया था, लेकिन वह महेंद्र सिंह कालूखेड़ा ही थे जिन्होंने राजपरिवार के प्रति अपनी अटूट निष्ठा का परिचय देेते हुए रामसिंह यादव को चुनाव न लडऩे के लिए  सहमत किया था। स्व. माधवराव सिंधिया के जीवनकाल में शिवपुरी के सिंधिया समर्थकों में महेंद्र सिंह, बालेेंद्र शुक्ल और शिवप्रताप सिंह के गुट हुआ करते थे, लेकिन इनमें पलड़ा महेंद्र सिंह कालूखेड़ा का ही हमेशा भारी रहा है। स्व. माधवराव सिंधिया के बाद जब राजनीति में उनके सुपुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया का अवतरण हुआ तो वह महेंद्र सिंह ही थे जिन्होंने उनकी उंगली पकड़कर उन्हें राजनीति के कठोर रास्ते पर चलना सिखाया। तब तक बालेंद्र शुक्ल कांग्रेस की राजनीति से ओझल हो गए थे और शिवप्रताप सिंह का निधन हो गया था। सिंधिया समर्थकों में भले ही शिवपुरी के वरिष्ठ कांग्रेस नेता उनके समर्थक न रहे हों, लेकिन कांग्रेस के प्रत्येक छोटे कार्यकर्ता के वह दिल में बसते थे। इसका कारण यह था कि एक तो वह बहुत संवेदनशील और हर कार्यकर्ता की हेल्प करने में उत्सुक रहते थे। श्री सिंधिया के प्रति जो झिझक कार्यकर्ता के मन में रहती थी वह स्व. कालूखेड़ा से बातचीत करने में कार्यकर्ता को कभी महसूस नहीं होती थी। यहां तक कि किसी कार्यकर्ता को यदि सिंधिया से शिकायत होती थी तो वह महेंद्र सिंह जी से बातचीत कर अपने मन का गुबार निकाल लेता था। इससे बहुत से छिटके हुए कार्यकर्ता पुन: सिंधिया खेेमे में लौटे। इनमें पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राकेश गुप्ता, युवक कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष विजय शर्मा आदि प्रमुख थे। इसी प्रकार महेंद्र सिंह समर्थक ओपी भैया को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, लेकिन इसके बाद भी ओपी भैया महेंद्र सिंह से लगातार जुड़े रहे। सन 2006 के लगभग एक घटना ऐसी हुई जिसमें महेंद्र सिंह अपने विरोधियों के निशाने पर आए। वह मौका था जब वरिष्ठ कांग्रेस नेता बैजनाथ सिंह यादव ने ज्योतिरादित्य सिंधिया और महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के सम्मान में स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया। यह पहला मौका था जब महेंद्र सिंह सांसद सिंधिया के साथ शिवपुरी आए। सांसद होने के कारण ज्योतिरादित्य शिवपुरी पहले भी आते रहे हैं, लेकिन महेंद्र सिंह के साथ आने के कारण शिवपुरी में अदभुत स्वागत समारोह का नजारा देखा गया। पूरे शहर में सिंधिया और महेंद्र सिंह के स्वागत के बैनर और पोस्टर लगाए गए। जिससे यह संदेश गया कि शिवपुरी के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में सिंधिया से अधिक महेंद्र सिंह कालूखेड़ा लोकप्रिय हैं। हालांकि इससे महेंद्र सिंह को नुकसान भी हुआ और लंबे समय तक उनका शिवपुरी आना रूक गया, परंतु महेंद्र सिंह की वफादारी कायम रही और धीरे-धीरे उनके खिलाफ जमीं हुई धूल साफ हो गई। पिछले चुनाव में उन्होंने सिंधिया से दो-दो हाथ करने वाले देशराज सिंह से उनके घर मुंगावली में जाकर चुनाव लड़ा और उन्हें धूल चटाई।