पित्र पक्ष में कैसे करे पित्र आराधना ( पं विकास दीप ) 09425137382

1148

पितृ पक्ष में श्राद्ध-
पितृ अपने पूर्वज पितरों के प्रति श्रद्धा भावना रखते हुए पितृ पक्ष एवं श्राद्ध कर्म करना नितान्त आवश्यक है. हिन्दू शास्त्रों में देवों को प्रसन्न करने से पहले, पितरों को प्रसन्न किया जाता है.
पितरॊं की कृपा प्राप्ति के लिये मन्त्र –
श्राद्ध पक्ष में यथा सम्भव जाप करें । एक थाली में भोजन सजाकर सामने रखें। तीन बार पानी से उसके चारों ओर गोल घेरा बनायें। अपने पितरॊं को याद करके ईस थाली को गाय कॊ खिला दें। इससे पितरॊं अर्थात मृत पूर्वजॊं की कृपा आपकॊ प्राप्त होगी ।
॥ ऊं सर्व पितरेभ्यो, मम सर्व शापं प्रशमय प्रशमय, सर्व दोषान निवारय निवारय, पूर्ण शान्तिम कुरु कुरु नमः
पितृ पक्ष का महत्व
देवताओ से पहले पितरो को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है।देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व होता है. वायु पुराण ,मत्स्य पुराण ,गरुण पुराण, विष्णु पुराण आदि पुराणों तथा अन्य शास्त्रों जैसे मनुस्मृति इत्यादि में भी श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया गया है.
पूर्णिमा से लेकर अमावस्या के मध्य की अवधि अर्थात पूरे 16 दिनों तक पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये कार्य किये जाते है. पूरे 16 दिन नियम पूर्वक कार्य करने से पितृ-ऋण से मुक्ति मिलती है. पितृ श्राद्ध पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है. भोजन कराने के बाद यथाशक्ति दान – दक्षिणा दी जाती है. इससे स्वास्थ्य समृ्द्धि, आयु व सुख शान्ति रहती है ।।

पितृपक्ष तर्पण कब करें
पितृ्पक्ष अर्थात श्राद्धपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्चिन कृ्ष्ण अमावस्या तक रहते है. इस प्रकार प्रत्येक साल में पितृ पक्ष के 16 दिन विशेष रुप से व्यक्ति के पूर्वजों को समर्पित रह्ते है. पूर्वजों का मुक्ति मार्ग की ओर अग्रसर होना ही पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है. ।।

श्राद्धपक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्चिन कृ्ष्ण अमावस्या के मध्य जो भी दान -धर्म किया जाता है. वह सीधा पितरों को प्राप्त होने की मान्यता है. पितरों तक यह भोजन ब्राह्माणों व पक्षियों के माध्यम से पहुंचता है. जिन व्यक्तियों की तिथि का ज्ञान न हो, उन सभी का श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है.
चतुर्दशी तिथि के श्राद्ध की विशेषता
ऎसे सभी जो आज किसी कारण वश हमारे मध्य नहीं तथा इस लोक को छोड कर परलोक में वास कर रहे है, तथा इस लोक को छोडने का कारण अगर शस्त्र, विष या दुर्घटना आदि हो तो ऎसे पूर्वजों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है. व चतुर्दशी तिथि में लोक छोडने वाले व्यक्तियों का श्राद्ध अमावस्या तिथि में करने का विधान है.
पितृ कौन हैं?
माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। जो जीवन रहते उनकी सेवा नहीं कर पाते, उनके देहावसान के बाद बहुत पछताते हैं। इसीलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पत्र की अनिवार्यता मानी गई है। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर ला दिया। जन्मदाता माता-पिता को मृत्योपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है।

प्रस्तुत है पितृ एवं पितृ पक्ष के महत्व की विशेष जानकारी –
एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन दद्याज्जलाज्जलीन।
यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणदेव नश्यति।
श्राद्ध पक्ष में अपने दिवंगत पितरों के निमित्त जो व्यक्ति तिल, जौ, अक्षत, कुशा, दूध, शहद व गंगाजल सहित पिण्डदान व तर्पणादि, हवन करने के बाद ब्राह्माणों को यथाशक्ति भोजन, फल-वस्त्र, दक्षिणा, गौ आदि का दान करता है, उसके पितर संतृप्त होकर साधक को दीर्घायु, आरोग्य, स्वास्थ्य, धन, यश, सम्पदा, पुत्र-पुत्री आदि का आशीर्वाद देते हैं। जो व्यक्ति जान-बूझकर श्राद्ध कर्म नहीं करता, वह शापग्रस्त होकर अनेक प्रकार के कष्टों व दु:खों से पीड़ित रहता है। अपने पूर्वज पितरों के प्रति श्रद्धा भावना रखते हुए पितृ यज्ञ व श्राद्ध कर्म करना नितांत आवश्यक है। इससे स्वास्थ्य, समृद्धि, आयु एवं सुख-शांति में वृद्धि होती है।
श्राद्ध में कुश और तिल का महत्व
दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है। यह भी मान्यता है कि कुश और तिल दोंनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं। कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्यों का और जड़ पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को प्रिय हैं और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माने जाते हैं। मान्यता है कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध किया जाये तो दुष्टात्मायें हवि को ग्रहण कर लेती हैं।
श्राद्ध के देवता —- वसु, रुद्र और आदित्य श्राद्ध के देवता माने जाते हैं।
कम ख़र्च में श्राद्ध
विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति केवल मोटा अन्न, जंगली साग-पात-फल और न्यूनतम दक्षिणा, वह भी ना हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए या किसी गाय को दिन भर घास खिला देनी चाहिए अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि हे! प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।
किसे करना चाहिए श्राद्ध?
श्राद्ध के प्रकार
श्राद्ध तीन प्रकार के होते हैं-
नित्य- यह श्राद्ध के दिनों में मृतक के निधन की तिथी पर किया जाता है।
नैमित्तिक- किसी विशेष पारिवारिक उत्सव, जैसे-पुत्र जन्म पर मृतक को याद कर किया जाता है।
काम्य- यह श्राद्ध किसी विशेष मनौती के लिए कृतिका या रोहिणी नक्षत्र में किया जाता है।
श्राद्ध के लिए अनुचित बातें
कुछ अन्न और खाद्य पदार्थ जो श्राद्ध में नहीं प्रयुक्त होते- मसूर, राजमा, कोदों, चना, कपित्थ, अलसी, तीसी, सन, बासी भोजन और समुद्रजल से बना नमक। भैंस, हिरिणी, उँटनी, भेड़ और एक खुरवाले पशु का दूध भी वर्जित है पर भैंस का घी वर्जित नहीं है। श्राद्ध में दूध, दही और घी पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक माने जाते हैं। श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि में कभी नहीं किया जाता है। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है।
अनुष्ठान का अर्थ
अपने दिवंगत बुजुर्गों को हम दो प्रकार से याद करते हैं-
स्थूल शरीर के रूप में
भावनात्मक रूप से।


श्राद्ध विधि : ऐसे करें पितरों को तृप्त
हिन्दू धर्म के मरणोपरांत संस्कारों को पूरा करने के लिए पुत्र का प्रमुख स्थान माना गया है। शास्त्रों में लिखा है कि नरक से मुक्ति पुत्र द्वारा ही मिलती है। इसलिए पुत्र को ही श्राद्ध, पिंडदान का अधिकारी माना गया है और नरक से रक्षा करने वाले पुत्र की कामना हर मनुष्य करता है।
इसलिए यहां जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार पुत्र न होने पर कौन-कौन श्राद्ध का अधिकारी हो सकता है –
– पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए।
– पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है।
– पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में संपिंडों को श्राद्ध करना चाहिए।
– एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राद्ध करता है।
– पुत्री का पति एवं पुत्री का पुत्र भी श्राद्ध के अधिकारी हैं।
– पुत्र के न होने पर पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध कर सकते हैं।
– पुत्र, पौत्र या प्रपौत्र के न होने पर विधवा स्त्री श्राद्ध कर सकती है।
– पत्नी का श्राद्ध तभी कर सकता है, जब कोई पुत्र न हो।
– पुत्र, पौत्र या पुत्री का पुत्र न होने पर भतीजा भी श्राद्ध कर सकता है।
– गोद में लिया पुत्र भी श्राद्ध का अधिकारी है।
– कोई न होने पर राजा को उसके धन से श्राद्ध करने का विधान है।
आश्विन कृष्ण पक्ष में जिस दिन पूर्वजों की श्राद्ध तिथि आए उस दिन पितरों की संतुष्टि के लिए श्राद्ध विधि-विधान से करना चाहिए। किंतु अगर आप किसी कारणवश शास्त्रोक्त विधानों से न कर पाएं तो यहां बताई श्राद्ध की सरल विधि को अपनाएं –
– सुबह उठकर स्नान कर देव स्थान व पितृ स्थान को गाय के गोबर लिपकर व गंगाजल से पवित्र करें।
– घर आंगन में रंगोली बनाएं।
– महिलाएं शुद्ध होकर पितरों के लिए भोजन बनाएं।
– श्राद्ध का अधिकारी श्रेष्ठ ब्राह्मण (या कुल के अधिकारी जैसे दामाद, भतीजा आदि) को न्यौता देकर बुलाएं।
– ब्राह्मण से पितरों की पूजा एवं तर्पण आदि कराएं।
– पितरों के निमित्त अग्नि में गाय का दूध, दही, घी एवं खीर अर्पित करें।
गाय, कुत्ता, कौआ व अतिथि के लिए भोजन से चार ग्रास निकालें।
– ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं, मुखशुद्धि, वस्त्र, दक्षिणा आदि से सम्मान करें।
– ब्राह्मण स्वस्तिवाचन तथा वैदिक पाठ करें एवं गृहस्थ एवं पितर के प्रति शुभकामनाएं व्य
श्राद्ध किसी दूसरे के घर में दूसरे की भूमि में कभी नही करना चाहिये,ज भूमि सार्वजनिक हो,जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व नही हो,वहां श्राद्ध कर्म किया जा सकता है,शास्त्रीय निर्देशों के अनुसार दूसरों के घर मे श्राद्ध करने पर खुद के पितरों को कुछ नही मिलता है,गृहस्वामी के पितर बलपूर्वक श्राद्ध करने वाले के पितरों से सब कुछ छीन लेते है।

यदि किसी विवशता के कारण ही दूसरे के गृह अथवा भूमि में श्राद्ध करना पडे,तो सर्वप्रथम उस भूमि का किराया अथवा मूल्य उस भूस्वामी को दे देना चाहिये।
जो लोग श्राद्ध नहीं करते, उनके पितृ उनके दरवाजे से वापस दुखी होकर चले जाते हैं पूरे वर्ष श्राप देते तथा अपने सगे संबंधियों का रक्त चूसते रहते हैं और वर्ष भर उनके घर में मांगलिक कार्य नहीं होते। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में पितृ दोष का सबसे अधिक महत्व है। यदि घर में कोई मांगलिक कार्य नहीं हो रहे हैं, रोज नई-नई आफतें आ रही है, आदमी दीन-हीन होकर भटक रहा है या संतान नहीं हो रही है, या विकलांग पैदा हो रही है तो इसका मुख्य कारण यह है कि उस व्यक्ति की कुंडली में श्राद भाव से अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा पक्ष की अमावस्या को विधि विधान के साथ पिंड श्राद्ध करता है, तो पितृ उससे प्रसन्न हो जाते हैं तथा उसे आशीर्वाद देकर जाते । पं विकास दीप शर्मा मंशापूर्ण ज्योतिष शिबपुरी 09425137382 , 09993462153

*★★ पितृ-पक्ष – श्राद्ध*

निर्णय-सिन्धु में विवरण है

*•• उदिते दैवतं भानोपित्रयं चास्तमिते रवौ ।*
*द्वियमुहूर्ता त्रिरहश्चव सा तिथिरहव्यकव्यो: ।*

अर्थात — सूर्य के उदय से दो मुहूर्त तक तिथि में देव-कर्म और अस्त से तीन मुहूर्त तक पितृ-कर्म तथा शेष दिन में हव्य-कव्य उत्तम है ।
कहने का तात्पर्य ये है कि – आपके गुजरे हुये पूर्वज – आपके लिये देव भी है और पितृ भी हैं ।
इसलिये – जैसी भी तिथि अनुकूल मिले आप श्राद्ध करें ।

*05 सितंबर से 20 सितंबर 2017 तक ।*

*•• 05 सितंबर – मंगलवार – पूर्णिमा- श्राद्ध ।*
12 : 42 to 12 : 33 – दूसरे दिन तक ।

*•• 06 सितंबर – बुधवार – प्रतिप्रदा श्राद्ध ।*
12 : 33 to 11 53 – दूसरे दिन तक ।

*•• 07 सितंबर – गुरुवार – द्वितीय श्राद्ध ।*
11 : 53 to 10 : 45 दूसरे दिन तक ।

*•• 08 सितंबर – शुक्रवार – तृतीया श्राद्ध ।*
10 : 45 to 09 : 14 दूसरे दिन तक ।

*•• 09 सितंबर – शनिवार – चतुर्थी श्राद्ध ।*
09 : 14 to 07 : 25 दूसरे दिन तक ।

*•• 10 सितंबर – रविवार – पंचमी श्राद्ध ।*
07 : 25 to 05 24 तक

*•• 11 सितंबर – सोमवार – षष्ठी श्राद्ध ।*
05 : 24 to 03 : 15 तक

*•• 12 सितंबर – मंगलवार – सप्तमी श्राद्ध ।*
03 : 15 to 01 : 03 तक रात्रि ।

*•• 13 सितंबर – बुधवार – अष्टमी श्राद्ध ।*
01 : 03 to 22 : 49 तक उसी दिन ।

*•• 14 सितंबर – गुरुवार – नवमी श्राद्ध ।*
20 : 37 तक उसी दिन ।

*•• 15 सितंबर – शुक्रवार – दशमी श्राद्ध ।*
18 : 30 तक उसी दिन ।

*•• 16 सितंबर – शनिवार – एकादशी श्राद्ध ।*
16 : 31 तक उसी दिन ।

*•• 17 सितंबर – रविवार – द्वादशी श्राद्ध ।*
14 : 43 दोपहर तक उसी दिन ।

*•• 18 सितंबर – सोमवार – त्रयोदशी श्राद्ध ।*
13 : 09 दोपहर तक उसी दिन ।

*•• 19 सितंबर – मंगलवार – चतुर्दशी श्राद्ध ।*
11 : 53 दोपहर तक उसी दिन ।

*•• 20 सितंबर – बुधवार अमावस्या श्राद्ध ।*
11 : 00 दोपहर तक उसी दिन ।

पं विकास दीप शर्मा मंशापूर्ण ज्योतिष शिबपुरी 9993462153 , 9425137382