सवाल: ट्रम्प को उत्तर कोरिया का जवाब कैसे देना चाहिए।

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उत्तर कोरिया ने छठा परमाणु परीक्षण करके उत्तर-पूर्व एशिया में नया डर और कोरियाई धरती पर युद्ध के आसार पैदा कर दिए हैं.
हाल ही में जिस मिसाइल का परीक्षण किया गया वह 6.3 तीव्रता के भूकंप के बराबर ख़तरनाक है. यह उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों की विनाशकारी शक्तियों का एक उदाहरण है.
सितंबर 2016 में किए गए परीक्षण के मुक़ाबले यह पांच से छह गुना ज़्यादा बड़ा था और हिरोशिमा में गिराए गए परमाणु बम से करीब सात गुना ज़्यादा असरदार.
हालांकि अभी हाइड्रोजन बम के सफल परीक्षण के उत्तर कोरिया के दावे का आकलन करना ज़ल्दबाजी होगी. इसके पहले भी उत्तर कोरिया ने ऐसे ही परीक्षण करने के दावे किए थे, धमाकों के हल्के असर की वजह से इस पर संदेह किया जा रहा है.
उत्तर कोरिया क्यों चाहता है परमाणु हथियार?
परमाणु परीक्षण को लेकर उत्तर कोरिया का उद्देश्य बदला नहीं है.
उत्तर कोरिया 1960 के दशक से परमाणु हथियारों के अधिग्रहण की इच्छा रखता है और यह राजनीतिक स्वायत्तता, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और सैन्य शक्ति की इच्छा में भी निहित है.
इसके साथ किम जोंग-उन अमरीका की ओर से किसी संभावित हमले से निपटने के लिए पहले ही बचाव के उपाय तैयार कर लेना चाहते हैं. लगातार किए जा रहे मिसाइल परीक्षण के साथ हाल ही में सामने आई ‘घरेलू’ परमाणु बम की तस्वीर भी जाहिर तौर पर उत्तर कोरिया की ताकत दिखाती है.


‘…तो उत्तर कोरिया पर होगी कड़ी सैन्य कार्रवाई’
नागासाकी से ज़्यादा शक्तिशाली है उ. कोरियाई बम
उत्तर कोरिया और अमरीकाइमेज कॉपीरइट
हालांकि विश्लेषक उत्तर कोरिया की ओर से लगातार किए जा रहे मिसाइल परीक्षण को लेकर एक मत नहीं हैं. इस बात पर भी बहस छिड़ी है कि उत्तर कोरिया परमाणु हथियारों से अमरीका पर हमला कर सकता है.
लगातार मिसाइल और परमाणु हथियारों के परीक्षण के बावजूद ऐसा नहीं लगता कि अमरीकी राष्ट्रपति कोरिया की ओर से होने वाले हमले का जवाब देने के बजाय सीधे किसी तरह का हमला करने पर विचार करेंगे.
हालांकि उत्तर कोरिया के अधिकारी इस बात ये वाकिफ़ होंगे कि अमरीका पर सीधा हमला करना आत्महत्या करने से कम नहीं होगा.
दिसंबर 2011 में कार्यभार संभालने के बाद से ही किम जोंग उन के व्यवहार से पता चलता है कि वह समझदार अभिनेता हैं, हालांकि अपने क़रीबी पारिवारिक सदस्यों और देश के शीर्ष अधिकारियों को मारने की इच्छा उनकी क्रूरता को भी दिखाती है.
अपने कामों से वह ख़तरों के खिलाड़ी लगते हैं जैसे- अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की नाक में दम करना. साथ ही सैन्य सुधारों के ज़रिए वह अपने देश के लोगों की नज़र में खुद को बेहतर प्रशासक दिखाने की कवायद भी करते हैं.
किम जोंग उन का ये अंदाज़ तमाम उत्तर कोरियाई लोगों के बीच लोकप्रिय है, ख़ासकर उन लोगों के बीच जो प्योंगयोंग में रहते हैं.
अमरीका को कैसे जवाब देना चाहिए?


जब उत्तर कोरिया क्षेत्रीय असुरक्षा का प्रमुख कारण बना हुआ है, ऐसे में शायद सबसे चिंताजनक और अस्थिरता की स्थिति डोनल्ड ट्रंप की सोच को लेकर है.
अमरीकी राष्ट्रपति ने लगातार इस बात के संकेत दिए हैं कि अगर उत्तर कोरिया ने अपनी गतिविधियां नहीं रोकी तो अमरीका सैन्य कार्रवाई कर सकता है जिसके बुरे परिणाम जापान, दक्षिण कोरिया और खासकर सियोल में रहने वाले एक करोड़ से ज़्यादा लोगों को झेलने पड़ सकते हैं.
आखिरकार, उत्तर कोरियाई चुनौती पर अमरीका की सैन्य प्रतिक्रिया का नुकसान उसके दो प्रमुख क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए प्रलय से कम नहीं होगा और साथ ही इससे दक्षिण कोरिया में मौजूद 28,500 अमरीकी सैनिकों की ज़िंदगी भी ख़तरे में पड़ जाएगी.
इसलिए यह समझना आसान है कि अमरीकी रक्षा सचिव जेम्स मैटिस और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एचआर मैक्मास्टर क्यों सैन्य कार्रवाई के पक्ष में नहीं हैं. वह इसे आखिरी रास्ता मानते हैं.
राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से युद्ध की चेतावनी जैसी बातें एक सोची समझी चाल भी हो सकती है जिसका उद्देश्य प्योंगयांग को आगे किसी भी हरकत से रोकना होगा. इसके साथ ही चीनी नेतृत्व पर उत्तर कोरिया को दी जाने वाली कच्चे तेल की सप्लाई रोकने का दवाब बनाकर उसे आर्थिक दबाव झेलने को मजबूर करने की भी रणनीति हो सकती है.
हालांकि अगर ऐसा इरादा है तो ये कारगर नहीं दिख रहा. उत्तर कोरिया ने अप्रैल से ही कच्चे तेल का भंडार बढ़ाना शुरू कर दिया था ताकि भविष्य में किसी भी तरह की कटौती होने पर निपटा जा सके.
उधर, चीनी नेतृत्व लगातार उत्तर कोरिया के कामों की वजह से गुस्से में है और कभी भी तेल की सप्लाई रोक सकता है जिसका असर कम समय के लिए, लेकिन जल्द दिख सकता है.
अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप अमरीकी हितों के लिए दक्षिण कोरियाई लोगों की कुर्बानी नहीं देंगे, ऐसे में मौजूदा संकट का जवाब देने का एक मात्र तरीका है- उत्तर कोरिया पर ज़्यादा से ज़्यादा प्रतिबंध लगाना.
आर्थिक दबाव
उत्तर कोरिया की मिसाइलइमेज कॉपीरइटKCNA
ट्रेजरी सेक्रेटरी स्टीवन म्नुचिन फ़िलहाल उस प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं जिसके तहत उत्तर कोरिया से व्यापार संबंध रखने वाले किसी भी देश को अमरीकी बाज़ार से बाहर कर दिया जाएगा. हालांकि इसे लेकर तर्क और बहसों का सिलसिला भी शुरू हो सकता है. इसलिए इसके बेअसर होने का भी ख़तरा है.
अमरीका की ओर से एकतरफा प्रतिबंधों को लागू करना मुश्किल होगा. ख़ासकर इसके लिए चीन जैसे देशों को व्यापार प्रतिबंधों के लिए उकसाना होगा. इससे उत्तर कोरिया पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा.
हालांकि, किसी भी तरह के प्रतिबंध हों या फिर सैन्य कार्रवाई, डिप्लोमेसी और बातचीत ही मौजूदा समस्या के हल का सबसे अच्छा तरीका है.
जब संयुक्त राष्ट्र और दूसरे देश उत्तर कोरिया के व्यवहार की कड़ी निंदा कर रहे हैं, तब यह अमरीका की ज़िम्मेदारी है जो कि सबसे बड़ी विश्व शक्ति है कि सक्रियता और विचारविमर्श के जरिए उत्तर कोरिया से बातचीत के रास्ते खोजे.
सैन्य टकराव से क्या होगा?


बातचीत न होने से रणनीतिक तनाव जारी रहेगा. उत्तर कोरिया को रास्ते में लाने की सभी कोशिश के नाकाम होने से निराश राष्ट्रपति ट्रंप आखिर में सैन्य कार्रवाई पर ही उतर आएं जो कि किम जोंग उन को अच्छे से पता है.
ऐसी स्थिति में इस बात की संभावना ज़्यादा है कि दोनों पक्ष एक दूसरे के बारे में भ्रांतियां पाल लें और ऐसी लड़ाई न शुरू हो जाए जहां परमाणु हथियारों का इस्तेमाल हो. यह सोची-समझी लड़ाई नहीं, ग़लत आकलन की वजह से अचानक पैदा होने वाला संकट हो सकता है.
बातचीत बाकी है. इसलिए यह उत्तर कोरिया को जवाब देने का एक तरीका हो सकता है जो न केवल डिप्लोमैटिक और आर्थिक रूप से उस पर असर डालेगा बल्कि संभावित लाभ का अंदाज़ा भी लगाया जा रहा है.
राष्ट्रपति ट्रंप भी बातचीत को ग़लत नहीं मानते और इससे सैन्य टकराव को रोका जा सकता है. इसी के साथ फ़िलहाल के लिए मुसीबत टाली जा सकती है.
(डॉ. जॉन नीलसन राइट उत्तर पूर्व एशिया, एशिया प्रोग्राम, चैथम हाउस के सीनियर रिसर्च फेलो हैं और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में जापानी राजनीति और पूर्वी एशिया के अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सीनियर लेक्चरर हैं.)
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