जाती धर्म मैं बटा हुआ मनुष्य सनातन धर्मी नहीं है: यथार्थ गीता

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जातियाँ धर्म नहीं हैं
धर्म का रूप देना पराधीनता के प्रमुख कारणों में है।

जातियाँ-कुल-गोत्र कबीलों द्वारा निवास, शौर्य या व्यवसाय पर आधारित सम्मान-पत्र हैं और विश्व में सर्वत्र हैं। इनसे केवल इतना बोध होता है कि हम उस वंश परम्परा में हैं जिन्होंने ऐसा किर्तीमान अर्जित किया था। पहले इन जातियों के नाम कुछ दुसरे थे, आज कुछ और हैं।

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र योग-साधना के क्रमोन्नत सोपान हैं। यदि साधना का ज्ञान नहीं है, कोइ उस पर दो कदम चला नहीं है तो वह- न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय, न वैश्य और न शुद्र ही। वह मात्र अचेत है, जगत रूपी रात्रि में खोया निश्चेष्ट है।

गीतोक्त संयम समझ कर जब वह साधना-पथ पर प्रथम चरण रखता है, उस दिन से वह साधन में अल्पज्ञ है, शुद्र है और जैसे प्रवेश परीक्षाओं में छात्र का चयन हो जाने पर वह अपने आप को भाग्यवान मानने लगता है इतना ही मुल्यवान यह शुद्र स्तर है। इसके बाद क्मोन्नत सोपनों पर उत्कर्ष होता जाता है।

किन्तु जातियाँ ही धर्म है- यह रोग भारत में भगवान बुद्ध के समय से ही पनप रहा था। ब्राह्मण परिवार के एक युवक ने भ.बुद्धसे निवेदन किया- भन्ते ! आप अए बरिष्ठ शिष्यों को ब्राह्मण कह कर सम्बोधित करते हैं; क्या आप मुझे ब्राह्मण नहीं कहेंगे ? मै अच्छे कुल में जन्मा हूँ, संस्कृत में मंत्र पढ़ता हूँ, यज्ञ कर सकता हूँ, करा सकता हूँ।

भगवान बुद्ध ने कहा, “नहीं वत्स कोई जन्म से, कुल से या पढ़ने लिखने से ब्राह्मण नहीं होता। ब्राह्मण वह है जो जितेन्द्रिय है, जिसमें मनो निग्रह है। जो संयम पुर्वक श्वसन-क्रिया में लगा है, जो भीतर-बाहर निर्मल है, ब्रह्म-चिंतन में जिसकी सूरत प्रवाहित है, मै उसको ब्राह्मण कहता हूँ।”

यहाँ भगवान बुद्ध ने नया कुछ नहीं कहा बल्कि उन्होंने वही दुहरा दिया जो ‘गीता’ में है-
शमो दमस्तप: शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।।
(१८/४२)
~ मन का शमन, इन्द्रियों का दमन इन्द्रियों को ईश्वर की ओर तपाना (तप) स्वरूप की स्थिति दिलानेवाली साधना का अध्ययन और सरलता से से ब्रह्म में विलय दिला देनेवाली ये योग्यताएँ जिसमें है वह ब्राह्मण है।

बुद्ध ने कहा कि ब्राह्मण एक स्थितिहै। ‘गीता’ कहती है-
यस्य सर्वे समारम्भा: कामसङ्कल्पवर्जिता: ।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा : ।।
(४/१९)
~ जिस पुरुष के द्वारा सम्पुर्णता से आरम्भ की हुयी क्रिया (ईश्वर-दर्शन की नियत विधि, नियत कर्म) इतनी उन्नत हो गयी कि- “कामसङ्कल्पवर्जिता:”- काम अर्थात कामना और संकल्प से उपर उठ गयी। (मन का दुसरा नाम संकल्प है, संकल्प-विकल्प का निरोध होना मन की निरोधावस्था है।)
इस निरोध के साथ ही “ज्ञानाग्नि दग्धकर्माणम्”- जिसको वह जानता था, जिसके लिये प्रयत्नशील था, कर्म कर रहा था- उसका प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है और ज्ञानाग्नि में कर्म सदा-सदा के लिये जल जाते हैं (जो संसकारों की परत में थे वे और जो नियत कर्म करना अनिवार्य था- वह भी जल जाते हैं)।
“तमाहु: पण्डितं बुधा:”- ऐसी स्थितिवालो को बोधस्वरूप महापुरुषों ने पण्डित कह कर सम्बोधित किया है।
●● अस्तु, बाहर समाज में जन्मना जाति ही वर्ण है, इसी व्यवस्था में जीवनयापन करना ही धर्म है- यह धारणा बुद्ध काल में भी प्रचलित थी, कदाचित महाभारत-काल मे भी रही हो (वैसे महाभारत मे प्रक्षिप्त अंशों से इनकार नहीं किया जा सकता)

★★★ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने कृतित्व से इन धारणाओं को समूलोच्छेद कर एकछत्र ‘गीता’ शास्त्र प्रसारित कर दिया;
किन्तु कालान्तर में इस रोग ने इतनी जड़ पकड़ लिया कि आज से ग्यारह सौ वर्षों पूर्व जब विदेशी आक्रान्ता आने लगे तो (जैसा कर्नल टाड ने ‘राजस्थान के इतिहास’ में लिखा है) उन्हें रोकनेवाला यहाँ कोई नहीं था
क्योंकि यह नियम धार्मिक मान्यता प्राप्त कर चुका था कि केवल क्षत्रिय ही लड़ेगा, जो सौ में करीब सात होते थे। उनमें भी औरतें, वृद्ध और बच्चे। तीन चार लड़ने वालों पर अधिकार कर लिया तो शेष को पशुओं की तरह ले जायँ।
● शुद्र लड़ नहीं सकता; क्योंकि वह शस्त्र हाथ में उठाये तो नरक में जाय।
● लेकिन दान की वस्तु छिनते देख ब्राह्मण भी शस्त्र उठा सकता है।
● सिर्फ गाय की रक्षा के लिये वैश्य शस्त्र उठा सकता है, अन्यथा कदापि नहीं।

साभार

स्वामी अड़गड़ानंद जी