घर मे ही निवास करती है लक्ष्मी और अलक्ष्मी ( पं विकास दीप astro)

849

घर मे लक्ष्मी रूठ जाती है क्या कारण है ????
वैष्णव साहित्य में हालाहल को अलक्ष्मी से जोड़ कर देखा गया है जो दुर्भाग्य और दारिद्रय की देवी हैं और लक्ष्मी की जुड़वां बहन हैं.
जैसे कोई भी शानदार चीज बिना कचरा पैदा किए नहीं बनती, वैसे ही लक्ष्मी के साथ हमेशा अलक्ष्मी भी होती हैं.
जो इन दोनों जुड़वां बहनों की अनदेखी करते हैं वो ऐसा करके ख़तरा मोल लेते हैं. अलक्ष्मी दुख की देवी हैं.
जब तक उन्हें स्वीकार नहीं किया जाता तब तक किस्मत हमेशा अपने साथ नाश लाती है.

दरिद्रा के प्रवेश करने के स्थान

मार्कण्डेय ऋषि ने दु:सह मुनि से कहा–* जिसके यहां शिवलिंग का पूजन न होता हो तथा जिसके यहां जप आदि न होते हों बल्कि रुद्रभक्ति की निन्दा होती हो, वहीं पर तुम निर्भय होकर घुस जाना।

लिंगार्चनं यस्य नास्ति यस्य नास्ति जपादिकम्।
रुद्रभक्तिर्विनिन्दा च तत्रैव विश निर्भय:।।

जहां * पति-पत्नी परस्पर झगड़ा करते हों, * घर में रात्रि के समय लोग झगड़ा करते हों, * जो लोग बच्चों को न देकर स्वयं भोज्य पदार्थ खा लेते हों, * जो स्नान नहीं करते, दांत-मुख साफ नहीं करते, * गंदे कपड़े पहनते, संध्याकाल में सोते व खाते हों, * जुआ खेलते हों, * ब्राह्मण के धन का हरण करते हों, * परायी स्त्री से सम्बन्ध रखते हों, * हाथ-पैर न धोते हों, उस घर में तुम दोनों घुस जाओ। पं विकास दीप शर्मा मंशापूर्ण ज्योतिष शिवपुरी 9993462153 , 9426137382

लक्ष्मी का संबंध मिष्ठान्न से है जबकि अलक्ष्मी का संबंध खट्टी और कड़वी चीजों से.
यही वजह है कि मिठाई घर के भीतर रखी जाती है जबकि नीबू और तीखी मिर्ची घर के बाहर टँगी हुई देखी जाती है.
लक्ष्मी मिठाई खाने घर के अंदर आती हैं जबकि अलक्ष्मी द्वार पर ही नींबू और मिर्ची खा लेती हैं और संतुष्ट होकर लौट जाती हैं.
दोनों को ही स्वीकार किया जाता है पर स्वागत एक का ही होता है.
महिलाएं घर की संपत्ति अर्थात लक्ष्मी का रूप होती हैं। जिस घर में महिलाओं का सम्मान नहीं होता मां लक्ष्मी उस घर से अपना नाता तोड़ लेती हैं। शास्त्रों में वर्णित है की घर की महिला सर्वगुण संपन्न हो तो समस्याओं को उस घर में स्थान नहीं मिलता। वह मकान में प्रेम तथा जीवंतता का संचार कर उसे घर बनाती हैं। भाग्यशाली होते हैं ऐसे घर जिन घरों की महिलाओं में कुछ विशेष गुण विद्यमान होते हैं। उस घर में लक्ष्मी को बुलाने के लिए निमंत्रण नहीं देना होता बल्कि उस घर की महिला ही लक्ष्मी का रूप होती हैं।
महिलाएं जो घर में होती हैं लक्ष्मी का रूप
* मीठे वचन बोलने वाली, आस्तिक, सेवा भाव रखने वाली, क्षमाशील, दानशील, बुद्धिमान, दयावान और कर्तव्यों का पालन पूर्ण निष्ठा से करने वाली लक्ष्मी का रूप होती है।
* जो स्त्री तन से ही नहीं मन से भी सुंदर हो।
* घर आए मेहमानों का स्वागत सत्कार करे।
* पराया दुख देखकर दुखी होकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसकी सहायता करे और जो दूसरों को दुख-दर्द में देखकर उसको दूर करने में आनंद का अनुभव करे।
* घर की रसोई में भेद-भाव किए बिना समान रूप से सभी को भोजन परोसे। सभी सदस्यों को भोजन कराने के उपरांत भोजन करे।
* जो प्रतिदिन स्नान करके साफ और स्वच्छ वस्त्र पहन कर रसोई घर में प्रवेश करती है।
* सुबह शाम घर में देवी-देवताओं के सामने धूप, दीप और सुंगधित अगरबत्ती जला कर पूजा-पाठ करती है।
* पतिव्रत धर्म का पालन करे।
* धर्म और नीति के मार्ग पर चलने के लिए पारिवारिक सदस्यों को प्रेरित करे।
महिलाएं जो घर में होती हैं अलक्ष्मी का रूप
* जो स्त्री मैली-कुचैली सी और पाप कर्मों में रत रहती है, पराय पुरुषों में उसका मन रमता है।
* जो बात-बात पर गुस्सा करती है, अपने पति को दबाने के लिए रोष प्रदर्शन, छल या मिथ्या भाषण करती है।
* अपने घर को सजा सवार कर नहीं रखती, जिसके विचार उत्तम नहीं होते, अपना घर छोड़ दूसरों के घर नित्य जाती रहती है, जिसे लज्जा नहीं आती, उसके घर में लक्ष्मी कभी नहीं रहती।
* अपने पति से प्रेम न करने वाली स्त्री पति के लिए सदैव दुख का कारण बनती है।

श्रीलिंगमहापुराण के अनुसार समुद्र मंथन में महाभयंकर विष निकलने के बाद ज्येष्ठा अशुभ लक्ष्मी उत्पन्न हुईं फिर विष्णुपत्नी पद्मा लक्ष्मी प्रकट हुईं। लक्ष्मीजी से पहले प्रादुर्भूत होने के कारण अलक्ष्मी ज्येष्ठा कही गयीं हैं।

अलक्ष्मी (दरिद्रा, ज्येष्ठादेवी)

ततो ज्येष्ठा समुत्पन्ना काषायाम्बरधारिणी।
पिंगकेशा रक्तनेत्रा कूष्माण्डसदृशस्तनी।।
अतिवृद्धा दन्तहीना ललज्जिह्वा घटोदरी।
यां दृष्ट्वैव च लोकोऽयं समुद्विग्न: प्रजायते।।

समुद्रमंथन से काषायवस्त्रधारिणी, पिंगल केशवाली, लाल नेत्रों वाली, कूष्माण्ड के समान स्तनवाली, अत्यन्त बूढ़ी, दन्तहीन तथा चंचल जिह्वा को बाहर निकाले हुए, घट के समान पेट वाली एक ऐसी ज्येष्ठा नाम वाली देवी उत्पन्न हुईं, जिन्हें देखकर सारा संसार घबरा गया।

क्षीरोदतनया, पद्मा लक्ष्मी

या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी।
गम्भीरावर्तनाभिस्तनभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया।।
या लक्ष्मीर्दिव्यरूपैर्मणिगणखचितै: स्नापिता हेमकुम्भै:।
सा नित्यं पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमांगल्ययुक्ता।।

उसके बाद तिरछे नेत्रों वाली, सुन्दरता की खान, पतली कमर वाली, सुवर्ण के समान रंग वाली, क्षीरसमुद्र के समान श्वेत साड़ी पहने हुए तथा दोनों हाथों में कमल की माला लिए, खिले हुए कमल के आसन पर विराजमान, भगवान की नित्य शक्ति ‘क्षीरोदतनया’ लक्ष्मी उत्पन्न हुईं। उनके सौन्दर्य, औदार्य, यौवन, रूप-रंग और महिमा देखकर देवता और दैत्य दोनों ही मोहित हो गए।

नम: कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नम:।
कृष्णप्रियायै सततं महालक्ष्म्यै नमो नम:।।
पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नम:।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नम:।।

लक्ष्मीजी ने भगवान विष्णु के साथ अपने विवाह से पहले कहा कि बड़ी बहन का विवाह हुए बिना छोटी बहन का विवाह शास्त्रसम्मत नहीं है। तब भगवान विष्णु ने दु:सह ऋषि को समझा-बुझाकर ज्येष्ठा से विवाह करने के लिए मना लिया। कार्तिकमास की द्वादशी तिथि को पिता समुद्र ने दरिद्रादेवी का कन्यादान कर दिया। विवाह के बाद दु:सह ऋषि जब दरिद्रा को लेकर अपने आश्रम पर आए तो उनके आश्रम में वेदमन्त्र गुंजायमान हो रहे थे। वहां से ज्येष्ठा दोनों कान बंद कर भागने लगी। यह देखकर दु:सह मुनि उद्विग्न हो गये क्योंकि उन दिनों सब जगह धर्म की चर्चा और पुण्यकार्य हुआ करते थे। सब जगह वेदमन्त्रों और भगवान के गुणगान से बचकर भागते-भागते दरिद्रा थक गई। तब दरिद्रा ने मुनि से कहा–’जहां वेदध्वनि, अतिथि-सत्कार, यज्ञ-दान, भस्म लगाए लोग आदि हों, वहां मेरा निवास नहीं हो सकता। अत: आप मुझे किसी ऐसे स्थान पर ले चलिए जहां इन कार्यों के विपरीत कार्य होता हो।’

दु:सह मुनि उसे निर्जन वन में ले गए। वन में दु:सह मुनि को मार्कण्डेय ऋषि मिले। दु:सह मुनि ने मार्कण्डेय ऋषि से पूछा कि ‘इस भार्या के साथ मैं कहां रहूं और कहां न रहूं?’