पूजा के बाद आरती क्यों करते है

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पूजा में आरती विधान क्यों ।।

आज के व्यस्त एवं आधुनिकता से घिरे जीवन के उपरांत भी भारतीय समाज के सभी वर्गों के लोगों के मध्य धर्म के प्रति जागरूकता , जिज्ञासा एवं बढ़ता हुआ रुझान , सचमुच सराहनीय है | हम सभी अपने-अपने आराध्य की पूजा अर्चना करते है, परन्तु पूजा में सम्मलित कई तत्वों से अवगत हुए बिना ही अपनी साधना को संपन्न कर करते है | पूजा से सम्बंधित लघु क्रियाओं की जानकारी करके तथा उनका सही विधिविधान के साथ करने से, हमारे द्वारा इष्ट को समर्पित, आग्रह एवं , और भी महत्वपूर्ण बन जाती है | पूजा विधि की कोई भी कमी को आरती से पूरा किया जाता है ।।
आरती पूजन
“आरती” शब्द हिंदू ग्रंथ ऋग्वेद में से लिया गया है। आरती प्रार्थना का समापन अनुष्ठान है। चूँकि, हिंदू धर्म में अग्नि को शुद्ध माना गया है, इसमें, पूजन के अन्त में, जलती हुई लौ या इसके समान कुछ खास वस्तुओं से आराध्य के सामाने एक विशेष विधि से घुमाई जाती है। इसमें इष्टदेवता की प्रसन्नता के हेतु , दीपक दिखाने के साथ उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है। यह उपासक के हृदय में भक्तिदीप प्रज्वलित करने तथा देवता के कृपा आशीर्वाद ग्रहण करने का सुलभ माध्यम है| आरती को आरात्रिक और नीराजन भी कहते हैं। 1) नीराजन का अर्थ है- विशेषरूप से, नि:शेष रूप से प्रकाशित करना। अनेक दीप बत्तियाँ जलाकर विग्रह के चारों ओर घुमाने का अभिप्राय यही है कि पूरा-का-पूरा विग्रह एड़ी से चोटी तक प्रकाशित हो उठे-चमक उठे, अंग-प्रत्यंग स्पष्ट रूप से उद्भासित हो जाय,और जिसके फलस्वरूप दर्शक या उपासक भली-भाँति देवता की रूप-छटा को निहार सके, हृदयंग्म कर सके। पूजन मंत्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी नीराजन (आरती) कर लेने से उसमें पूर्णता आ जाती है। 2) आरात्रिक शब्द ,संस्कृतके आर्तिका प्राकृत रूप है और जिसका अर्थ है- अरिष्ट। यह विशेषत: माधुर्य उपासना से संबंधित है|

आरती की विधि
आरती करते हुए भक्त, यदि अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारती कहलाती है। दीप – भक्ति विज्ञान के अनुसार, आरती में पहले मूलमन्त्र (जिस देवता का जिस मन्त्र से पूजन किया गया हो, उस मन्त्र)- के द्वारा तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिये , तत्पश्चात , एक पात्र में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या (जैसे ३, ५ या ७) में बत्तियां जलाकर आरती करनी चाहिए। इसके अलावा कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं। पद्म पुराण में विदित है की – कुंकुम, अगर, कपूर, घृत और चन्दन की सात या पाँच बत्तियाँ बनाकर अथवा रुई और घी की बत्तियाँ बनाकर शंख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुए आरती करनी चाहिए।किसी विशेष पूजा के उपलक्ष्य में ,आरती पांच प्रकार से संपन्न की जा सकती है- पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरी धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग (मस्तिष्क, हृदय, दोनों कंधे, हाथ व घुटने) से। पंच-प्राणों की प्रतीक आरती मानव शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक मानी जाती है। आरती की थाली या दीपक को ईष्ट देव की मूर्ति के समक्ष ऊपर से नीचे, गोलाकार घुमाया जाता है,जिसमें , सर्व प्रथम भगवान की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार, दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंगों पर घुमाया जाता है। इसके साथ आरती गान भी समूह द्वारा गाय़ा जाता है जिसको संगीत आदि की संगत भी दी जाती है। आरती होने के बाद आरती करने वाला व्यक्ति , आरती की ज्योत को शांत करने के उपरान्त , दीपक को उपस्थित , भक्त-समूह में घुमाता है | पं विकास दीप शर्मा मंशापूर्ण ज्योतिष शिवपुरी 9993462153 , 9425137382

आरती में सामग्री का महत्व
आरती के समय कई सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है। इन सभी के पीछे धार्मिक ही नहीं, वैज्ञानिक आधार भी हैं। आरती का थाल धातु का बना होता है, जो प्रायः पीतल, तांबा, चांदी या सोना का हो सकता है। इसमें एक गुंधे हुए आटे का, धातु का, गीली मिट्टी आदि का दीपक रखा होता है और दीपक के अलावा पूजा के फ़ूल, धूप-अगरबत्ती आदि भी रखे हो सकते हैं। आरती के समय कलश का प्रयोग किया जाता है , किंवदंति है कि समुद्र मंथन के समय विष्णु भगवान ने अमृत कलश धारण किया था। इसलिए कलश में सभी देवताओं का वास माना जाता है। कलश में जल डाला जाता है ,जिससे ईश्वर आकृष्ट होते हैं।| यदि प्राप्त हो सके, तो कलश में गंगा, गोदावरी,यमुना, सिंधु, सरस्वती, कावेरी और नर्मदा नदी का जल भी डाला जा सकता है| सप्त नदियों के जल में सकारात्मक ऊर्जा को आकृष्ट करने और उसे वातावरण में प्रवाहित करने की क्षमता होती है। पूजा कलश में , तांबे का पैसा, सुपारी और पान और तुलसी डाली जाती है, जिसके कारण सात्विक लहरें और सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है, जो वातावरण को शुद्ध करती है तथा हमारे अन्दर रजोगुण को समाप्त कर देती हैं | आरती के समय हम कलश पर नारियल रखते हैं। नारियल की शिखाओं में सकारात्मक ऊर्जा का भंडार पाया जाता है। हम जब आरती गाते हैं, तो नारियल की शिखाओं में मौजूद ऊर्जा, तरंगों के माध्यम से, कलश के जल में पहुंचती है।

पूजा के बाद क्यों महत्वपूर्ण है आरती ?
स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं। बिना आरती के कोई भी पूजा अपूर्ण मानी जाती है। आरती करने का ही नहीं, आरती देखने का भी बहुत बड़ा पुण्य है। आरती में बजने वाले शंख और घड़ी-घंटी के स्वर के साथ, हमारे शरीर में सोई आत्मा जागृत होती है जिससे मन और शरीर उर्जावान हो उठता है। आरती का धार्मिक महत्व होने के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। आरती में प्रयुक्त सभी पदार्थ जैसे -रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन अत्यंत शुद्ध एवं शांति प्रदान करने वाले होते हैं | जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है।