// आपातकाल की याद के बहाने//(लोकतंत्र… अंतिम पहर की कहानी, एक दार्शनिक की ज़ुबानी)- डॉ राकेश पाठक

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अमरीका में एक दार्शनिक हुए विल डुरंट । सन 1950 में उनकी एक किताब आयी थी- “प्लेज़र्स ऑफ फिलॉसफी”..
किताब में डुरंट ने जो लिखा है उसे पढ़ना इस समय ज़रूरी और सामयिक है।
डुरंट ने एक अध्याय का शीर्षक दिया है-, “लोकतंत्र”
इसमें लोकतंत्र के पटाक्षेप के समय की संभावित स्थितियों का ब्यौरा दिया है।
डुरंट ने लिखा है—

० लोकतंत्र के अंतिम पहर में एक गिरोह का शासन होगा।
अपराधी अपने आर्थिक विकास की चरम सीमा पर होंगे क्योंकि उन्हें राज्य का पूर्ण सहयोग, संरक्षण मिलेगा और कानून का भी।

० अगर गिरोह के लोग अपराध,अत्याचार,व्यभिचार करते हैं
तो उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाएगा

० गिरफ्तार हो भी गए तो कोई सजा नहीं होगी।

० यदि सजा हुई तो जेल नहीं भेजा जाएगा।

० जेल भेजा गया तो बाद में माफी दे दी जाएगी।

० माफी न दी गयी तो जेल से भागने का अवसर दिया जाएगा।

० इसके बाद भी अगर इस गिरोह के लोग मर गए तो उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार होगा।

० उनकी स्मृति में कीर्ति स्थलों का निर्माण कर उनकी प्रतिमाएं स्थापित की जायेंगीं।

* ठीक 42 साल पहले आज की ही रात देश में “आपातकाल” की काली इबारत लिखी गयी थी। आज के हालात को समझने के लिए कई दशक पहले लिखी किताब आईने का काम कर रही है अगर कुछ देखना,समझना चाहें तो…!

वर्ना विवेकहीन भीड़ में बदलते “लोक” से लोकतंत्र को कोई भी नहीं बचा सकेगा..!

यह टिप्पणी हमारे मित्र और ग्वालियर के पुरातत्वविद रमाकांत चतुर्वेदी जी Ramakant Chaturvedi जी से हुई चर्चा पर आधारित है। शुक्रिया रमाकांत जी।

नोट: ‘आपातकाल’ देश के लोकतांत्रिक इतिहास की 19 महीने लम्बी काली रात ही था। किसी सूरत में मंज़ूर नहीं।

-डॉ राकेश पाठक