पीले गुलाबों के साए में हरी पत्तियों की खेप-ट्यूब लाईट: -विजय भदौरिया

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 ट्यूब लाईट मूवी देखी।

आवामी फ़िज़ाओं में घोले गए दमघोंटू क़ौमी ज़हर के प्रति रक्षात्मक रवैये को यक़ीन की ताक़त और भाईयों की मुहब्बत की चाशनी में लपेट कर परोसी जाने वाली कहानी का नाम है -ट्यूबलाईट! फ़िल्म का पात्र असमान्य व्यवहार का व्यक्ति है, जिसे तर्क की बजाए सीधे कथनों की भाषा समझ आती है।उसका छोटा भाई,जिसने उसे ‘सामान्य’कहे जाने का दर्जा दिया है,फ़ौजी होकर युद्ध में लापता है।फ़िल्म में उपनिषदीय घोष की भाँति ‘यक़ीन में ताक़त है’ का सूत्र गुजांयमान रखा गया है,जिसे संयोगों के माध्यम से दर्शकों की चेतना में ‘नैति-नैति’बनाए रखने का प्रयास भी किया गया है।सिनेमाई चमत्कारों और वैज्ञानिक व्याख्याओं के दोलन में केन्द्रीय पात्र के कृतित्व रखे गए हैं ताकि दर्शक अपनी-अपनी समझ के साथ सहमत हो सकें। अब आती है बात असली संदेश की! ‘यक़ीन में ताक़त है’के घोष के ऊपर एक नाद और प्रभावशाली ढंग से प्रकट हुआ है।और वह है हिन्दुस्तानियत के सर्टिफिकेशन का!
पूर्वोत्तरीय नायिका के माध्यम से,जिस पर शत्रु देश चीन(१९६५ युद्ध के दौरान चीन के लिए’शत्रु’विशेषण प्रयुक्त किया गया था)का होने का आरोप स्थानीय लोगों द्वारा लगाया जाता है,यह कहलवाया गया है कि रंग,चमड़ी या क़ौम के आधार पर उनकी हिन्दुस्तानियत को चुनौती नही दी सकती।असल में ‘चीनी’ प्रकरण की आड़ में एक पूरी की पूरी क़ौम का संदेश फ़िल्मकार द्वारा आवाम में प्रसारित किया गया है।यह काम बड़ी सूक्ष्मता से किया गया है। गोया किसी मरीज़ को चढ़ती ड्रिप में किसी इंजेक्शन का मिलाना! मरीज़ को न इल्म हो,न अलग से छेदा जाए! चूँकि चीनी पीली चमड़ी के होते हैं और एक क़ौम विशेष को हरा रंग ज़्यादा भाता है,अत: कहा जा सकता है कि पीले गुलाबों के साए में हरी पत्तियों की खेप भेजी गई है।नायिका द्वारा ‘हिन्दुस्तानियत का सर्टिफ़िकेट कोई और देने वाला कौन होता है’ वाला भाव प्रछन्न रूप से क़ौम विशेष के द्वारा कहा जाता प्रतीत होता है। इसके पीछे,दरअसल,राजनैतिक षड्यंत्रों की उपज ,यानि कि,असहिष्णुता का वातावरण ही है,जो इसी देश के नागरिकों को ही इस देश का निवासी होने का सर्टिफ़िकेट पेश करने को मजबूर कर रहा है।वह भी जातीयता के आधार पर! किसी भी राष्ट्र के लिए यह घातक परिस्थिति है।
वस्तुत: यह सांस्कृतिक आपातकाल की घड़ी है जो फ़िल्मों और वक्तव्यों के माध्यम से हमें सचेत कर रही है कि समय रहते इन प्रवृत्तियाँ को हतोत्साहित नही किया गया तो हिन्दुस्तान के भीतर ही कई देश बन जाएँगें । चरखे से हालिया बेदख़ल किए गए गांधी को आदर्शों के रूप में दिखाया जाना,क़ौम विशेष की हितैषी प्रतीत होने वाली राजनैतिक पार्टी के चश्मे का फ़िल्मकार द्वारा पहना जाना भी सिद्ध करता है!
            ख़ैर..। फ़िल्म की पटकथा थोड़ी कमज़ोर रही है।भाईयों के आपसी प्रेम,असामान्य व्यक्ति का सरल दृष्टिकोण,हिन्दुस्तानियत का सर्टिफ़िकेट और यक़ीन की ताक़त सहित गांधीवादी दर्शन जैसे चार प्रमुख विषयों को लेकर फ़िल्म हिज्जों-हिज्जों में पिरोई गई है अलबत्ता विषाद यह है कि पूर्णता का अभाव सभी जगह दृष्टिगोचर होता है। परिवार के साथ देखे जाने पर असहज करने वाले दृश्य पूरी फ़िल्म में क़तई नहीं हैं ।सलमान खान की टुटपुंजिया कही जा सकने वाली हरकतों के मुरीद दर्शकों को शायद फ़िल्म अच्छी न लगे। बहरहाल.. निर्दोष भाव से यह निर्दोष सी फ़िल्म एक बार देखी तो जा सकती है। नही तो तत्व प्रेमीजन सिनेमाहाल में बैठ तपती गरमी से राहत तो पा ही सकते हैं!
विजय भदौरिया

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