ऐसा तो विभाजन के समय भी नहीं हुआ….

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सोचा था की संक्रमण के इक्कीस दिनों तक सरकार के खिलाफ एक शब्द नहीं लिखूंगा लेकिन ऐसा नहीं कर पा रहा ।आँखें बंद कर समर्थन करना फितरत में नहीं हैं। सरकार ने कोरोना से बचाव के लिए 21 दिन का एकांत धारण करने के साथ ही ‘मुल्कबंदी’ का ऐलान किया तो सबने बिना ना-नुकुर के इसे शिरोधार्य कर लिया,लेकिन जब दूसरे ही दिन हजारों मील के सफर पर पैदल जाने के लिए विवश लोगों को सड़कों पर देखा तो सरकार की अदूरदर्शिता पर शर्म आ गयी ।
बीते दिनों 22 मार्च को भी सरकार ने बिना तैयारी के एक दिन के लॉक डाउन की घोषणा की थी और उसके प्रतिफल उसके सामने थे बावजूद इसके सरकार ने सबक नहीं लिया और 25 मार्च से समाज के सबसे कमजोर तबके को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया ।मुल्कबंदी के ऐलान से पहले क्या सरकार की नजर में ये लाखों-करोड़ों दिहाड़ी वाले नहीं थे। देश के महानगरों से अपने गांवों को वापस लौटने के लिए विवश लोगों के पास न खाना है ,न पैसा,रेल,बस पहले से बंद है ,ऐसे में उनके सामने बंद देश में पैदल चलने और पुलिस की लाठियां खाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है ।
केंद्र और राज्य सरकारों ने स्थिति बेकाबू होने के बाद कोई 80 करोड़ की आबादी के लिए राहतों का ऐलान तो किया लेकिन इसका फायदा उन लोगों को तो नहीं मिला जो अपनी घर-गृहस्थी के साथ सड़क पर हैं ,जिन्हें अपने घर तक पहुंचने में अभी पांच से सात दिन लगेंगे ।देश के विभाजन के समय जैसे दृश्य देश ने देखे थे उससे भी भयावह तस्वीरें अब देश के सामने हैं। दुधमुंहें बच्चे और उनकी बेवश माताओं को देखकर जी पसीज उठता है ।लेकिन हम जैसे लोग इस असहाय आबादी की कोई मदद नहीं कर सकते सिवाय उनके पक्ष में लिखने के ।
अभी मुल्कबंदी की मियाद लम्बी है ,पूरे 18 दिन बाक़ी हैं, यदि सरकार गरीबों के भोजन-पानी की माकूल व्यवस्था न कर पायी तो कोरोना से कम भूख-प्यास से ज्यादा लोग मारे जायेंगे,ये हकीकत है और इस बारे में लिखने पर राष्ट्रद्रोह का आरोप भी लगाया जा सकता है लेकिन जो है सो है ।
सरकार की बदइंतजामी की तस्वीरें केवल महानगरों से आई हैं,देहात में क्या दशा है कोई नहीं जानता क्योंकि वहां से सूचनाएँ बहुत धीमी गति से आ रहीं हैं ।कोरोना से निबटने के लिए सरकार ने जितनी राशी की व्यवस्था की है उससे कहीं ज्यादा की राशि तो राष्ट्रपति भवन के रख-रखाव के लिए मंजूर की गयी है ,किन्तु ये सवाल किसी भी मंच पर नहीं उठाया जा सकता।संसद और विधान सभाएं स्थगित हैं,टीवी चैनल अपनी सीमाओं में जो दिखा सकते हैं सो दिखा रहे हैं लेकिन विस्थापन के समय जैसी तस्वीरें देखकर सरकार का दिल पसीजता होगा ,ये कहा नहीं जा सकता ।सरकार खुद एकांत में जो है ।
पिछले एक सप्ताह में अनेक मर्मान्तक कहानियां सामने आई हैं ,इन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता ।हम जिस महानगर में रहते हैं वहां भी आवश्यक सामान की आपूर्ति प्रशासन नहीं करा पा रहा है,ऐसे में गांवों में क्या स्थिति होगी कल्पना की जा सकती है ।सरकारी हेल्पलाइनों के नंबर केवल विज्ञापन के काम आ रहे हैं,कोई,किसी की सुनने को राजी नहीं ।जहां सम्वेदनशील लोग हैं वहीं कुछ हो पा रहा है ।इस मामले में मै मध्यप्रदेश सरकार की सराहना करना चाहता हूँ ,उसने असहाय राहगीरों के बारे में दूसरों से पहले सोचा है ।
सवाल ये है की जब मांग और आपूर्ति की स्थिति गड़बड़ा रही है तब मुल्कबंदी को कब तक ,कितना प्रभावी बनाया जा सकेगा,क्या सेना के इस्तेमाल से स्थितियां काबू में आ जाएंगी ? ,शायद नहीं। इस संकटकाल में समझदारी के साथ जिम्मेदारी और नैतिकता की भी जरूरत है। शासन द्वारा गरीबों के लिए घोषित सहायता बिना एक पैसे की बेईमानी के हितग्राहियों तक पहुँच जाए तो सब मिलजुलकर मौजूदा आपदा से जूझ सकते हैं,अन्यथा नहीं ।
एक तरफ लक्ष्मण रेखा है,एक तरफ रावण
कैसे लड़ा जाएगा बोलो फिर ऐसे में रण ?

@ राकेश अचल