कमलनाथ का आपातकाल … ! @ राकेश अचल

149

प्रदेश के एक सांध्य दैनिक के दफ्तर को सील कर इंदौर की पुलिस ने एक नई बहस शुरू कर दी है की क्या प्रदेश में कमलनाथ सरकार ने आपातकाल लागू कर दिया है ?मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ आपातकाल के किरदारों में से एक हैं ,इसलिए ये आशंका होना स्वाभाविक है कि वे भी जरूरत पड़ने पर प्रदेश में आपातकाल के हथकंडे का इस्तेमाल कर सकते हैं ।कहा जा रहा है कि बहु चर्चित हनीट्रैप काण्ड के खलनायकों को बचने के लिए इंदौर में प्रेस के खिलाफ आपातकाल के हथकंडों का इस्तेमाल किया जा रहा है ।
आपको पता है कि मै हर समय आपातकाल की मानसिकता के खिलाफ खड़ा हुआ हूँ,इंदौर में जब पुलिस ने लोकस्वामी के दफ्तर को सील किया,तब भी मैंने इसकी मुखालफत की थी,मैंने ही नहीं पूरे प्रदेश में पुलिस की इस कार्रवाई का विरोध किया गया था ।इस विरोध के बावजूद पुलिस ने जब अखबार के स्वामी जीतू सोनी की गिरफ्तारी पर दस हजार रूपये का इनाम घोषित कर दिया तब मुझे दोबारा सोचना पड़ रहा है कि क्या पुलिस और सरकार में इतनी ताकत है कि वो जानबूझकर एक अखबार मालिक को फरार अपराधी बताकर उस पर ईनाम की घोषणा कर सके ?
अभिव्यक्ति की आजादी का प्रबल समर्थक होने के बावजूद मै इस बात का हामी नहीं हूँ कि अखबार की आड़ में कोई भी ऐसा काम किया जाये जो विधि सम्मत न हो ।दुर्भाग्य से अब हमारे पेशे में ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत में है जो अखबार या समाचार चैनलों के इतर दूसरे ब्यवसाय भी करते हैं । आज के मीडिया कारोबार में बिल्डर,शराब कारोबारी ,मध्यान्ह भोजन और दवाओं के सप्लायर ही नहीं दूसरे ठेकेदार भी सक्रिय हैं ,इन्हें रोका भी नहीं जा सकता क्योंकि इसके लिए हमारे पास कोई क़ानून नहीं है ,ऐसे में जब इतर धंधों में लिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है तब क्या इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा जा सकता हैं,जोड़ा जाना चाहिए?
अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल इसलिए भी खड़ा हुआ है क्योंकि बीते छह साल में देश को राष्ट्रीय स्तर पर गोदी मीडिया बनाने की योजनाबद्ध कोशिशें की गयीं है और इसी का नतीजा है कि आज मीडिया किसी न किसी का ‘माउथ पीस’ बनकर रह गया है ।ऐसे माउथपीस मीडिया के अधिकारों की रक्षा में क्या समूचे मीडिया जगत को खड़ा हो जाना चाहिए या ऐसे लोगों को चिन्हित कर अलग-थलग किया जाना चाहिए ?हमारे एक मित्र ने कहा कि लोकस्वामी के खिलाफ कार्रवाई का असल मकसद हनीट्रैप में लिप्त नौकरशाहों और नेताओं को बचाना है ,इसीलिए अखबार का दमन किया जा रहा है ।मुमकिन है कि ये बात सच भी हो और न भी हो ! पर इसकी पड़ताल कौन करेगा ?कौन बताएगा कि फलां अखबार या चैनल का मालिक दूध का धुला है और कौन नहीं ?
लोकस्वामी के खिलाफ कार्रवाई के मामले में सरकार का निर्भीकता से कार्रवाई करना बताता है कि कहीं न कहीं दाल में कुछ काला अवश्य है,यदि ऐसा न होता तो मीडिया का रुख देखकर कमलनाथ सरकार अपने हाथ जरूर पीछे कर लेती ,लेकिन सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया,,इससे जाहिर है कि सरकार के पास ऐसा कुछ है जो लोकस्वामी के मालिक को अपराधी सिद्ध करने के लिए काफी है ।मीडिया और सरकार के बीच कोई भ्रम न रहे इसके लिए आवश्यक है कि प्रदेश की सरकार ये साबित करे कि वो जो भी कार्रवाई कर रही है वो विधि-सम्मत है और उसका अन्य कोई निहितार्थ नहीं है। सरकार की नियत में खोट के अनेक चिन्ह पहले से मौजूद हैं।
प्रदेश में कमलनाथ सरकार के उपेक्षापूर्ण व्यवहार के कारण प्रदेश का मीडिया पहले से ही नाराज है ,किंतु सरकार को मीडिया की नाराजगी की कोई परवाह नहीं है ।मीडिया के प्रति उदासीन सरकार लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं ।इससे प्रदेश का वातावरण भी प्रभावित हो सकता है ।अभी समय है कि सरकार जागे और मीडिया के साथ एक आवश्यक दूरी बनाये रखकर भी सकारात्मक सहयोग जारी रखे ।लोकतंत्र के लिए मीडिया की उपस्थिति आवश्यक भी है और अनिवार्य भी ।अब देखना ये होगा कि क्या कमलनाथ और उनकी सरकार मीडिया की जरूरत अनुभव करती है या पूर्व के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की तरह मीडिया से हट-बचकर निकलना चाहती है ।प्रदेश के जन सम्पर्क संचालनालय की मौजूदा दशा देखकर इस बारे में फिलहाल कुछ भी कह पाना कठिन है ।संचालनालय में सन्नाटा है ।इस सन्नाटे को तोड़ा जाना चाहिए ।यही प्रदेश के हित में है ।मीडिया को मुठ्ठी में करने का सपना ठीक नहीं है
@ राकेश अचल