राजनीति में ‘सब’ क्यों चलता है ….? @ “महाराष्ट्र प्रहसन पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की कलम से…

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राजनीति इतनी परम स्वतंत्र क्यों है भाई कि यहां ‘सब’ चलता है।सब यानी सब ,कुछ भी अनुचित नहीं,कुछ भी अस्पृश्य नहीं ,कुछ भी अग्राह्य नहीं ।बड़ी अजीब हो गयी है राजनीति ।बीते दो दिनों से देश की राजनीति में जो कुछ हुआ या हो रहा है उसे देखकर अब ये सवाल फिर से गर्म हो गया है कि राजनीति आखिर इतनी बेहया क्यों हो गयी है की इसमें सब चलने लगा है ?
दुनिया जानती है कि सत्ता यानि कुर्सी यानि तख्त कभी खाली नहीं रहता ,महाराष्ट्र में कुर्सी खाली नहीं थी। वहां राष्ट्रपति जी का शासन था लेकिन रातों-रात कुर्सी के लिए राजनीतिक दलों ने वहां जो प्रहसन किया उसे देखकर राजनीति अधम प्रतीत होने लगी ।अभी तक राजनीति को नगरवधू कहा और माना जाता था किन्तु महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ उसे देखकर तो लगने लगा कि नगरवधुओं की भी कोई मर्यादा होती है,राजनीति ने तो अपना सब कुछ गवां दिया ।ऐसे-ऐसे गठजोड़ करके दिखा दिए जिनकी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता ।जिस अजित पंवार ने जिस फड़नबीस के खिलाफ वोट मांगे थे वो ही फड़नबीस का बगलगीर बनकर खड़ा हो गया ?
देश की राजनीति में कुर्सी हासिल करने के लिए केंद्र में सत्ता की अगुवाई कर रही भाजपा की और से किया गया ये पहला अभद्र प्रयास या प्रयोग नहीं है किन्तु इस प्रयास से राजनीति में सुचिता का अंतिम अध्याय भी समाप्त हो गया ।इसके आगे अब अमर्यादित,अभद्र,अलोकतांत्रिक कुछ हो ही नहीं सकता ।भाजपा अपनी इस कलाकारी के लिए हर बार कांग्रेस राज में किये गए अमर्यादित,अभद्र और अलोकतांत्रिक प्रयोगों का हवाला देती है लेकिन इससे क्या उसके पाप कम हो सकते हैं,दाग धुल सकते हैं ?शायद नहीं ।इन प्रयोगों के बाद जनता खुद को ठगा अनुभव कर रही है किन्तु उसके हाथ में कुछ है नहीं जो वो इस अनैतिकता के लिए दण्डित कर सके ।
महाराष्ट्र में सत्ता में कौन रहे और कब तक रहे ये हमारी चिंता का विषय न पहले था और न आज है ,हमारी चिंता का विषय ये है कि राज्यपाल ने अपनी कार्यशैली से राजभवन को जिस तरह से कलंकित किया है उसका निवारण कैसे होगा ।देश में आजादी आधी रात के बाद आई थी लेकिन अब हर सत्ता भी आधी रात के बाद ही हथियाई जाएगी क्या ?क्या कोई दल सत्ता के बिना जनसेवा कर ही नहीं पायेगा ?क्या गठबंधन कुर्सी के लिए ही होंगे और कुर्सी के लिए ही टूट जायेंगे ?
,महाराष्ट्र एक उदाहरण है देश की राजनीति में आई गिरावट का ।देश ने पहले भी ऐसे अनेक अनैतिक और अप्रिय दौर देखे हैं लेकिन अब सदी भी बदल गयी है और समय भी।इसलिए अब नेताओं को भी बदलना चाहिए और राजनीति के मूल्यों को ।मेरा मानना है कि खुद देवेंद्र फड़नबीस को कहना चाहिए था कि वे ऐसे अपावन गठजोड़ की सरकार का नेतृत्व नहीं करेंगे,लेकिन इतना साहस फड़नबीस में है ही नहीं ,वे तो सत्ता की फड़ जमाने के लिए उतावले बैठे हैं ,वे किसी के भी साथ सत्ता में भागीदारी करने के लिए तैयार हैं ,वे अपने नेतृत्व के खिलाफ कैसे जा सकते हैं ?
महाराष्ट्र में सत्ता के लिए चल रहे महा प्रहसन का अभी पटाक्षेप नहीं हुआ है।अभी हमें अदालत की भूमिका भी देखना है।राज भवन की भूमिका हम देख चुके हैं ।हमें लगता है की अदालत भी इस प्रसंग में ज्यादा कुछ नहीं कहेगी।इसलिए इस प्रहसन का समापन एक बार फिर विधानसभा के भीतर होगा ।विधानसभा में पौ फटने से पहले मुख्यमंत्री बनाये गए देवेंद्र फड़नबीस या तो अटलबिहारी बाजपेयी की तरह अपना इस्तीफा देकर चलते बनेंगे या फिर भाजपा के जाकिट शाह रातों-रात उनके लिए बहुमत जुटाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा चुके होंगे ।अगर कुछ न हुआ तो कोशियारी को फिर इस्तेमाल किया जाएगा लेकिन सत्ता हाथ से नहीं जाने दी जाएगी ।
भारत की राजनीति में स्तरहीन प्रयोगों का लंबा इतिहास है ,लेकिन देश का नया इतिहास लिखने के लिए उतावले लोग राजनीति को पवित्र बनाने के लिए राजी नहीं हैं ,वे भी चाहते हैं की राजनीति बेहया थी और बेहया ही बनी रहे ।राजनीति को पुन:संस्कारित करने के लिए अब सबको मिलकर कुछ न कुछ करना चाहिए,यदि हमने ये अवसर खो दिया तो नयी सदी की राजनीति का चेहरा गयी सदी की राजनीति से भी अधिक विकृत हो जाएगा । इसके लिए सड़क से संसद तक कोशिशें होना चाहिए ।यदि ये सब न हुआ तो देश अराजकता की एक ऐसी अंधी सुरंग में चला जाएगा जहाँ से वापस लौटना आसान न होगा ।
@ राकेश अचल