न्यायमंदिर से राम मंदिर तक …! @ अयोध्या मसले पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल की समीक्षा….!

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न्यायमंदिर से राम मंदिर तक न्यायमंदिर से राम मंदिर तक


@राकेश अचल

केंद्र सरकार की हिदायत थी और बच्चों का आग्रह कि मुझे राम जन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में एक शब्द भी नहीं लिखना है इसलिए आज पूरे दिन खामोश रहा लेकिन जब माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ही अपने फैसले की समीक्षा करने की इजाजत दे दी तो मेरा मन नहीं माना ।मै संयोग से विधि का छात्र भी हूँ इसलिए छोटी से लेकर सर्वोच्च अदालत तक की गरिमा का हृदय से सम्मान करता हूँ ,न्याय प्रणाली की विसंगतियों के बावजूद न्यायालय तो न्यायालय है और आज देश के सबसे बड़े न्यायालय ने नीर-क्षीर विवेक से देश के सबसे चर्चित,संवेदनशील और कठिन मामले में सर्वमान्य निर्णय देकर एक बार फिर अपनी सर्वोच्चता की नयी नजीर कायम की है ।सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का देश ने खुले दिल से स्वागत किया।जो पक्षकार इस फैसले से मुतमईन नहीं हैं वे भी इस फैसले का सम्मान करते हैं ।न्याय प्रणाली की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए इससे बड़ी बात क्या हो सकती है ।न्यायालय ने दूध का दूध और पानी का पानी अलग कर दिखाया है,एक -एक बिंदु का विस्तृत विवेचन करते हुए सर्व सम्मति से लिखा गया फैसला अब इस तरह के असंख्य विवादों के लिए भी नजीर बनेगा ।

इस फैसले के बाद धर्म के नाम पर सियासत बंद होगी और समाज में सद्भावना का एक नया युग आरम्भ होगा ।इस फैसले पर दूसरे पक्ष से आई तल्ख टिप्पणियों को भी सहजता से लिया जाना चाहिए ।ये टिप्पणियां स्वाभाविक हैं ।विवाद से उन्मोचित भूमि पर क्या बनेगा और कैसा बनेगा ये अब भविष्य के गर्भ में है ।तय है की भगवान राम कि जो प्रतिमा जनमानस के मन मंदिर में है उससे भव्य प्रतिमा और मंदिर कोई हो नहीं सकता ,।मुझे तो चिंता यूपी के मुख़्यमंत्री श्री आदित्यनाथ योगी के उस प्रोजेक्ट की है जो उन्होंने 1500 करोड़ का बनाया था ,जिस्मने भव्य राम मंदिर के लिए अयोध्या से बाहर जमीन खरीदकर भगवान राम की सरदार पटेल से भी ऊंची प्रतिमा बनाये जाने की बात कही गयी थी ।अब इसके लिए योगी को माथा पच्ची करने की जरूरत नहीं है।केंद्र सरकार जो नया ट्रस्ट बनाएगी वो ही अब ये सब काम कर लेगा ।भूमि के स्वत्व के इस विवाद को दुर्भाग्य से 1980 में राजनीति ने हड़प लिया था ।1992 में इस विवाद को इतना गर्म किया गया की समाज में खाइयां साफ़ दिखाई दने लॉगिन । ने इस विवाद के घोड़े पर चढ़कर कुछ राजनीतिक दल दो से तीन सौ पर कर सत्ता के शीर्ष तक भी पहुंचे लेकिन विवाद हल हुआ अंतत:माननीय सर्वोच्च न्यायालय की सूझबूझ से ।देश में भूमि स्वत्व के असंख्य विवाद हैं किन्तु राम जन्मभूमि जैसा जटिल विवाद कोई नहीं था ।इस विवाद को हल करने में बहुत लंबा समय लगा किन्तु अंतत: न्याय हुआ और न सिर्फ हुआ बल्कि होते हुए दिखा ।मुझे लगता है की यदि अदालत बीच में न होती तो हमारी सरकार संख्या बल के आधार पर ये फैसला ठीक उसी तरह करने का प्रयास करती जैसे जम्मो-कश्मीर से धारा 370 हटाने का किया था ।सुप्रीमम कोर्ट के फैसले को स्तुत्य मानते हुए मैं यहां ये भी कहना चाहूंगा की अब सरकार इस मुद्दे को सदा-सर्वदा के लिए भूलकर अपना ध्यान देश की बुनियादी समस्याओं के ऊपर केंद्रित करे ।अवध में विश्वास का,क़ानून का वध होने से बच गया है ।एक पत्ता नहीं खड़का और क्या चाहिए ?इस फैसले के बाद आई प्रतिक्रियाओं से जाहिर है की भारतीय समाज वैसा नहीं है जैसा की उसे प्रचारित किया जाता रहा है ।भारतीय समाज के मूल में सौहार्द और सद्भाव सदियों से था है और सदियों तक रहेगा ,क्योंकि ये समाज मूल्यों और संस्कारों पर आधारित समाज है। राजनीति ही है जो इस समाज के मूल्यों और संस्कारों को विकृत करने का प्रयास करती रही है ।इस फैसले का स्वागत करते हुए मैं अपने आपको धन्य समझ आरहा हूँ,मुझे लग रहा था की पता नहीं कि अपने जीवनकाल मै इस फैले को पढ़-सुन पाऊंगा या नहीं,क्योंकि पक्षकारों की अनेक पीढ़ियां इसमें मर-खप गयीं ।मै रामनामी नहीं ओढ़ता,मेरे पास कोई सुमरनी भी नहीं है लेकिन मै राम को पढ़ते हुए बड़ा हुआ हूँ और आज भी राम मेरे अतिप्रिय नायक हैं ।मेरे प्रिय नायकों की फेहरिश्त बहुत लम्बी है ,वे ही मुझे आदमी को आदमी के रूप में पहचाने,उसका सम्मान करने की समझ देते हैं ।मुझे लगता है की सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद शायद ही कोई पक्ष इसके पुनरावलोकन की मांग को लेकर दोबारा जाये ।इसकी जरूरत भी नहीं है।ये पूर्णविराम का समय है ।

@ राकेश अचल