दर्द के बाद ही खुशी मिलती हैः किरण कनौजिया जांबाजी की लिख रही दास्तां हमारा समाज बेटियों को लेकर कैसी भी सोच रखता हो लेकिन मुल्क के पास कई ऐसी जांबाज बेटियां हैं जो अपने पराक्रम से हर किन्तु-परंतु को मिथ्या साबित कर रही हैं। इन्हीं जांबाज बेटियों में एक हैं ब्लेड रनर के नाम से मशहूर हो चुकी किरण कनौजिया। एक पैर नहीं तो क्या हुआ। यह बेटी आज उन लोगों के लिए नसीहत है जोकि थोड़ी सी परेशानी में हिम्मत हार बैठते हैं।

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जांबाजी की लिख रही दास्तां
हमारा समाज बेटियों को लेकर कैसी भी सोच रखता हो लेकिन मुल्क के पास कई ऐसी जांबाज बेटियां हैं जो अपने पराक्रम से हर किन्तु-परंतु को मिथ्या साबित कर रही हैं। इन्हीं जांबाज बेटियों में एक हैं ब्लेड रनर के नाम से मशहूर हो चुकी किरण कनौजिया। एक पैर नहीं तो क्या हुआ। यह बेटी आज उन लोगों के लिए नसीहत है जोकि थोड़ी सी परेशानी में हिम्मत हार बैठते हैं।
किरण को पांच साल पहले की त्रासदीपूर्ण घटना ज्यों-की-त्यों याद है। जब डॉक्टरों ने मेरे परिजनों से कहा था कि इस बेटी की नर्व क्रैश हो गई है और टांग काटनी पड़ेगी। यह घटना 24 दिसम्बर, 2011 में शाम के वक्त हुई और 25 दिसम्बर को उसका जन्मदिन था। वह हैदराबाद से फरीदाबाद आने के लिए ट्रेन में सफर कर रही थी तभी कुछ लड़कों ने उसका सामान छीनना चाहा और खींचतान में वह ट्रेन से गिर गई और उसका पैर रेलवे ट्रैक की पटरियों में फंस गया। किरण की जान बचाने की खातिर उसका एक पैर काटना पड़ा। एक पैर कट जाने के बाद किरण निराश जरूर हुई लेकिन उसने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। पैर कटने के बाद किरण की प्रतिक्रिया थी, मुझे लगा कि जन्मदिन पर फिर नया जन्म मिला है।
हिम्मती किरण ने आर्टिफिशियल यानी कृत्रिम पैर के सहारे फिर से जिन्दगी के साथ कदम से कदम से मिलाकर चलने की कोशिश शुरू कर दी और जिन्दगी को नई दिशा देने की ठान ली। जिस लड़की को चलने में परेशानी थी उसी लड़की ने मैराथन में दौड़ना शुरू कर दिया और आज वह भारत की महिला बलेड रनर के नाम से शोहरत बटोर रही है। किरण बताती हैं कि डॉक्टर कहते थे कि मैं दौड़ नहीं पाऊंगी, जिन्दगी नॉर्मल नहीं रहेगी। सब कहते थे कि अब तो घर पर ही रहना होगा। वह कहती है कि इलाज दौरान वह ऐसे लोगों से मिली जिन लोगों की टांगें ही नहीं थीं, हाथ नहीं थे। हम सब लोगों ने मिलकर मैराथन में भाग लेने की सोची। किरण ने धीरे-धीरे दौड़ना शुरू किया। पहले पांच किलोमीटर, फिर 10 किलोमीटर दौड़ में हिस्सा लिया। किरण ने बताया कि मुझे लगा कि अगर मैं पांच या 10 किलोमीटर दौड़ सकती हूं तो इससे ज्यादा दौड़ने की चुनौती भी स्वीकार कर सकती हूँ।
आखिरकार मैंने अपने आपको हाफ मैराथन के लिए चैलेंज किया यानी 21 किलोमीटर दौड़ने का निश्चय किया। मुझे इससे कोई मतलब नहीं था कि मैं कितने समय में मैराथन खत्म करती हूं। बस मुझे रेस पूरी करनी थी। हैदराबाद हाफ मैराथन मैंने साढ़े तीन घंटे में पूरी की, दिल्ली की रेस दो घण्टे 58 मिनट में और मुंबई मैराथन दो घण्टे 44 मिनट में। किरण बताती हैं कि हर किसी का कोई न कोई प्रेरणादायी होता है। मैंने विवादों में घिरे दक्षिण अफ्रीकी धावक ऑस्कर पिस्टोरियस से प्रेरणा ली। किरण बताती हैं, आर्टिफिशियल पैर लगने से इंसान शुरू में एकदम बच्चा बन जाता है। दिमाग को शुरू में पता नहीं होता कि हमारे पास कृत्रिम पैर है। सच कहें तो कृत्रिम पैर की आदत डालने में वक्त लगता है। किरण बताती हैं कि शुरू शुरू में मुझे हमेशा डर रहता कि हम गिर जाएंगे। एक-एक कदम रखना बिल्कुल बच्चों की तरह सिखाया जाता है। यह एकदम एक नई जिन्दगी की तरह हो जाता है। किरण कहती हैं कि अब वह भूल गई हैं कि उनके पास आर्टिफिशियल पैर है क्योंकि अब दिमाग ने इसे अपना लिया है।
अपनी मुश्किलों के बारे में किरण बताती हैं कि शुरू-शुरू में दौड़ना मुश्किल था। दौड़ने के लिए एक अलग क़िस्म का ब्लेड होता है। यह ब्लेड हमें सपोर्ट देता है, शरीर को आगे की ओर धकेलने में। आगे की ओर धकेलने की वजह से हम शरीर को और उठा सकते हैं। इस सब के कारण टांग पर काफी दबाव पड़ता है और ये थोड़ा दर्दनाक होता है मगर बिना दर्द के कुछ मिलता भी नहीं है। समय के साथ-साथ हमें सब कुछ सहना पड़ता है लेकिन सच कहें तो दर्द के बाद ही खुशी भी मिलती है। अब किरण लगातार मैराथन दौड़ती हैं। वह कहती हैं कि उन्हें अपने पिता और अपनी कम्पनी इंफोसिस का काफी साथ मिला। किरण बताती हैं कि कृत्रिम पैर उन्हें कम्पनी की ओर से ही मिली है।
दुर्घटना के बाद जब किरण पहली बार दफ़्तर लौटीं तो किरण के शब्दों में उनके दोस्तों की प्रतिक्रिया कुछ यूँ थी, जब मैं ऑफिस गई तो लोगों ने कहा कि तुम तो बिल्कुल नॉर्मल लग रही हो। हमें लगा कि तुम छड़ी के सहारे गिरती-लटकती आओगी, तुम्हें देखकर हमारी इच्छाशक्ति और दृढ़ हो गई है। किरण बताती हैं कि मैं जिन्दगी में शायद भूल गई थी कि मैंने जन्म क्यों लिया है और जिन्दगी का क्या मकसद है लेकिन अब मुझे जिन्दगी जीने का जज्बा मिल गया है। मैं अपने काम के साथ-साथ समाज के लिए भी कुछ कर रही हूँ। किरण से बात करने से पहले मन में कुछ झिझक थी। जिन्दगी के बुरे दौर के बारे में सवाल पूछना कभी-कभी जख्म को हरा कर देने का काम करता है। लेकिन बातचीत के क्रम में किरण ने इन सारी शंकाओं को बेबुनियाद साबित कर दिया। किरण ने एक टांग जरूर गंवाई है लेकिन जिन्दगी जीने का हौसला नहीं। अपने नाम के अनुरूप वह अपने जैसे कई लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनी हैं जो बतौर महिला ब्लेड रनर खूब नाम कमा रही हैं।