कमलनाथ की अनाथ सरकार….!!

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कमलनाथ की अनाथ सरकार
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(राकेश अचल)
जनता के तमाम जप-तप के बाद मध्यप्रदेश में बनी कांग्रेस की सरकार के मुखिया जब कमलनाथ बने थे तब लोगों ने सोचा था कि अब प्रदेश के दिन बदलेंगे ,लेकिन आठ महीने में ही न सिर्फ जनता के सपने धूळ-धूसरित हो गए बल्कि कमलनाथ की सरकार भी अनाथ नजर आने लगी ।’किंग मेकर’ से लेकर नए सिंह-शावक तक आपस में उलझते नजर आ रहे हैं और जनता ये सर्कस देखने के लिए मजबूर है ।
मेरा सौभाग्य है कि मुझे प्रदेश के अब तक के 31 में से 20 मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल देखने का अवसर मिला ,इनमें से 17 का कार्यकाल तो एक पत्रकार के रूप में देखा है इसलिए मै ये दावा करने का अधिकारी हूँ कि जैसी दुर्दशा बहुमत वाली कमलनाथ सरकार की हो रही है ऐसी तो 28 दिन वाली सुंदरलाल पटवा सरकार भी नहीं हुई थी ।प्रदेश की अब तक की 31 में से 22 सरकारें कांग्रेस की रहीं हैं इसलिए अनुभव के लिहाज से कांग्रेस एक समर्थ दल होना चाहिए लेकिन आज की कमलनाथ सरकार को देखकर लगता ही नहीं है की प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है ।पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से लेकर नौजवान वनमंत्री उमंग सिंघार तक आपस में जूझ रहे हैं और मुख्यमंत्री कमलनाथ हैं कि मौन धारण किये बैठे हैं ।वे न अपने हम उम्र दिग्विजय सिंह को समझा पा रहे हैं और न नौजवान उमंग को हड़का पा रहे हैं ।लगता है कि उनका इकबाल वनबिहार पर गया हुआ है
प्रदेश सरकार के मंत्रों और नेताओं के बीच चल रहे वाक् -युद्ध की वजह से पूरी सरकारी मशीनरी ”कोमा में है ।विकास कार्यों की गति ठिठक गयी है,सरकार और जनता के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है ।मजे की बात है कि सरकार की इस दुर्दशा में विपक्ष की कोई भूमिका अब तक नहीं है। विपक्ष की भूमिका कांग्रेस के दिग्गज स्वयं निभा रहे हैं ।मुझे लगता है कि प्रदेश सरकार की मौजूदा दुर्दशा के लिए आधे मन से मुख्यमंत्री बने कमलनाथ के साथ ही पार्टी का कमजोर ,बीमार और बूढ़ा चुका केंद्रीय नेतृत्व भी जिम्मेदार है ।अन्यथा बात इतनी न बढ़ती।कांग्रेस के नेता समाजवादियों की तरह एक-दूसरे के कपड़े फाड़ते दिखाई न देते ।
बीते एक महीने से कांग्रेस सरकार का अंतर्द्वंद बढ़ा है और अब तो ये चरम पर पहुँच चुका है। निरंतर असंतुष्ट वरिष्ठ मंत्री डॉ गोविंद सिंह ने अपने जिले में अवैध उत्खनन के मुद्दे में अपनी असहायता उजागर कर सरकार को सवालों के घेरे में खड़ा किया था।उन्होंने चिंगारी दिखाई थी लेकिन भिंड के ही दो विधायकों के इसमें शामिल होने के बाद ये आग धधकने लगी ,विधायकों ने मंत्री जी को ही लपेट लिया था ।बाद में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रदेश के मंत्रियों को एक पत्र लिखकर आग में घी डाल दिया।घी पड़ते ही आग भड़की तो मंत्री उमंग सिंघार ने दिग्विजय सिंह पर आरोपों की झड़ी लगा दी ।एक मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने भी चुटकियां लीं और अब पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद कह रहे हैं की यदि सरकार वचनपत्र से मुकरी तो वे सरकार को चैन से नहीं बैठने देंगे ।
कुल मिलाकर अब लगने लगा है कि प्रदेश की कमलनाथ सरकार अनाथ हो चली है या फिर इसे नाथने वाला कोई नहीं रह गया है।ऐसी अराजक स्थितियों में कोई सरकार कितने दिन तक चलेगी कहना कठिन नहीं है क्योंकि राज्य सरकारों का शिकार करने वाले तो पहले से जाल बिछाए बैठे हुए हैं ।आज के हालात में या तो मुख्य मंत्री श्री कमलनाथ को अपना विकराल रूप दिखाना चाहिए या फिर चुपचाप अपना पद छोड़कर अपना काम-धंधा और ईडी के चककर में आये अपने रिश्तेदारों को देखना चाहिए ।वैसे भी लोकसभा चुनावों में 29 में से 28 सीटें गँवा कर मुख्यमनत्री कमलनाथ और उन्हें किंग मेकर बनाने वाले तमाम बड़े नेता अपना रसूख समाप्त कर चुके हैं ।
मेरी नजर में आज भी कमलनाथ एक समर्थ नेता हैं किन्तु उनका सामर्थ्य या तो अब क्षीण हो रहा है या वे इसका प्रदर्शन अपने ही लोगों के खिलाफ करना नहीं चाहते।एक मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें अपनी सांवैधानिक जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटना चाहिए,यदि किसी की पीछे हटने की सलाह मुझे देना पड़े तो मै दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया से पीछे हटने को कहूंगा क्योंकि ये दोनों भी भाजपा के लम्बे कुशासन-सुशासन को बदलने में अपना खून-पसीना बहाने वालों में सबसे आगे थे ।जनता ने इन्हीं सब पर भरोसा किया था और भाजपा ने तो सिंधिया को ही अपना मुख्य प्रतिस्पर्धी मानकर-माफ करो महाराज का नारा भी दिया था ।
@ राकेश अचल