अंतर्विरोधों में उलझे मध्यप्रदेश के नेता….

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मध्य्प्रदेश का दुर्भाग्य है की यहां लम्बे समय बाद सत्ता परिवर्तन के बावजूद हालात जस-के तस हैं ।सत्तारूढ़ दल के साथ ही विपक्ष के नेता भी अंतर्विरोधों में उलझे हैं,किसी को अवाम की फ़िक्र नहीं है ।प्रदेश में विकास की गति नेताओं के अंतर्विरोधों के कारण बाधित हो रही है ,लेकिन जनता के हाथ में आहें भरने के अलावा और कुछ नहीं है ।
सत्तारूढ़ कांग्रेस पहले मुख्यमंत्री पद को लेकर आपस में उलझी रही ,फिर जैसे -तैसे ये मसला सुलझा तो अब प्रदेश कांग्रेस का मुद्दा उलझ गया ।भाजपा की तरह कांग्रेस में भी हर गट का नेता सत्ता से “एक पौंड गोश्त”पाने के लिए बेकरार है ।सत्ता के जरिये जनता की सेवा का नारा अकारथ होता दिखाई दे रहा है ।चौथेपन को पार कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह दस साल के वनवास के बाद राजधानी लौट तो आये लेकिन लोकसभा चुनावों में जनता ने या किसी साजिश ने उन्हें खारिज कर दिया ।विधानसभा चुनावोंमें प्रदेश की जनता ने जिन नेताओं को सिरमाथे लिया था उन सबको लोकसभा चुनावों में धूल छटा दी ।अब यही धूल चाटते नेता आपस में शक्ति परीक्षण में लगे हैं ।
कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व में आई शिथिलता का ही कुफल है की मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के बूढ़े कन्धों पर आठ महीने बाद भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद का बोझ है। केंद्रीय नेतृत्व अब तक कमलनाथ पर रहम खाने को तैयार नहीं है ।प्रदेश कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया कमलनाथ के कन्धों से प्रदेश अध्यक्ष का भार सम्हालने के लिए उतावले दिखाई देते हैं लेकिन ऊपर से कोई संकेत ही नहीं मिल रहा ,नतीजा ये है की न ढंग से सरकार चल पा रही है और न संगठन ।
मेरा अपना तजुर्बा है की सिंधिया खुद प्रदेश अध्यक्ष बनने के बजाय अपने किसी समर्थक को इस पद पर बैठाना चाहते हैं लेकिन दिग्विजय सिंह इस पद के लिए खुद अपनी सेवाएं देने को तत्पर हैं।उनके खेमे में कोई दूसरा नेता इस जिम्मेदारी को सम्हालने लायक बचा नहीं है। अजय सिंह और अरुण यादव पहले ही असफल प्रमाणित हो चुके हैं ।इस द्वन्द युद्द में विधायकों से लेकर मंत्री तक शामिल हो गए हैं किसी को सरकार की फ़िक्र नहीं है क्योंकि सबको यकीन है की कमलनाथ के रहते सरकार तो नहीं गिरेगी ,वे जोड़तोड़ में सिद्धहस्त हैं और अपने-आप को प्रमाणित भी कर चुके हैं ।
एक जमाने में प्रदेश में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह को प्रदेश से बेदखल किया था तब मुख्य्मंत्री पद को लेकर 72 घंटे का ड्रामा चला था लेकिन आज प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर शुरू हुआ ड्रामा बहुत लंबा खिंच गया है,यहां तक की इस ड्रामे को देखकर ऊब होने लगी है तीन दशक पहले भी तबके सिंधिया ने खुद मुख्यमंत्री न बनकर मोतीलाल बोरा को इस पद के लिए स्वीकार कर लिया था ,मुझे लगता है की आज तीन दशक बाद फिर यही सब होने वाला है।आज के सिंधिया भी दिग्विजय सिंह को स्वीकार न कर किसी तीसरे के नाम पर सहमत हो जाएंगे और खुद प्रदेशाध्यक्ष नहीं बनेंगे ।जो भी हो लेकिन अब जल्द हो जाना चाहिए ।

अब बात करते हैं विपक्ष की ।पंद्रह साल लगातार सत्ता में रही भाजपा के नेता अब प्रतिकार की राजनीयति करना भूल गए हैं ये तब है जबकि भाजपा का अपना सांगठनिक ढांचा कांग्रेस से लाख गुना बेहतर है ।प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व का चेहरा अब पंचमुखी हो चुका है ।पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अलावा गोपाल भार्गव,नरोत्तम मिश्रा,कैलाश विजयवर्गीय और खुद उमा भारती इस पंचमुखी मुखौटे में चमकती दिखाई दे रहीं हैं ।भाजपा कच्चे सूत पर करतब दिखा रही प्रदेश की कांग्रेस सरकार को न गिरा पा रही है और न लंगड़ा कर पा रही है ।भाजपा की मौजूदगी न ढंग से सड़क पर है और न विधानसभा में ।ये तब है जब पार्टी की कमान बेहद मजबूत हाथों में हैं ।
सियासी दलों की इस आपसी खींचतान का खमियाजा परदेह की जनता को भुगतना पद रहा है। गुटों में बेटी सरकार और विपक्ष अपनी नैतिक जिम्मेदारी से मुंह चुराते फिर रहे हैं ।कुल मिलाकर जनादेश की अवमानना हो रही है ।न विपक्ष अपनी मौजूदगी का अहसास करा पा रहा है और न सरकार ।लेकिन उम्मीद पर आसमान टिका है तो मध्यप्रदेश की जनता भी नाउम्मीद क्यों हो ?मुमकिन है की बहुत जल्द संकट के ये बादल छंट जाएँ !और भोपाल जंक्शन पर अटकी विकास की रेल अचानक आगे चल पड़े ।
@ राकेश अचल