दिल्ली की शीला और शीला की दिल्ली…… @ राकेश अचल

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राजनीति में बहुत कम लोग होते हैं जो अपनी अलग पहचान बना पाते हैं,श्रीमती शीला दीक्षित ऐसे ही राजनेताओं में से एक थीं।दिल्ली बनाने में अगर कुतबुद्दीन ऐबक का योगदान है तो शीला दीक्षित का भी ।दिल्ली को कुतुबमीनार दने वाले जैसे इतिहास के पन्नों में आज भी दर्ज हैं उसी तरह शीला जी भी दिल्ली में फ्लाई ओव्हरों के लये हमेशा याद की जाएंगी ।उन्होंने आधुनिक दिल्ली को जो स्वरूप दिया वो भविष्य की दिल्ली का आधार है ।वे अकेली ऐसी मुख्यमंत्री थीं जो दिल्ली का पर्याय बन गयीं थीं,हालांकि किसी ने खुलकर कभी दिल्ली इज शीला,शीला इन दिल्ली कहा नहीं,जबकि ऐसा कहा जाना चाहिए था ,क्योंकि दिल्ली को नया चेहरा उन्होंने ही दिया ।
हमारे वरिष्ठ पत्रकार साथी स्वर्गीय कीर्तिदेव शुक्ल शीला जी के पारिवारिक सदस्य थे ।मेरी पहली मुलाक़ात उन्हीं ने शीला जी से कराई थी।दूसरी बार मै स्वर्गीय माधव राव सिंधिया के माध्यम से उनसे मिला था ।उनसे मिलकर कभी ऐसा लागत ही नहीं था की वे आपसे पहली बार मिल ारहिं हैं। उनके पति विनय जी आईएएस अफसर थे लेकिन ससुर उमाशंकर दीक्षित कांग्रेस के वरिष्ठ और विश्वसनीय नेता थे।नेहरू-गांधी परिवार के निकट रहे उमाशंकर जी की राजनितिक विरासत उनके पुत्र के बजाय उनकी पुत्रवधु शीला जी ने सम्हाली और ऐसी सम्हाली की उसमें एक भी दाग नहीं लगने दिया ।
शीला जी कांग्रेस की ऐसी नेता थीं जो पहले कार्यकर्ता बनीं ,उन्होंने जेल यात्राएं की,आंदोलन किये और कांग्रेस में उन्होंने संघर्ष कर जगह बनाई और उसका मुस्तैदी से निर्वाह भी किया ।शीला जी केवल राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं एक अच्छी एक्टिविस्ट भी थीं,महिलाओं के उत्थान के लिए वे 1970 से आजीवन सक्रिय रहीं ।शीला जी के जीवन में उतर-चढ़ाव लगातार आये लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा,उनके चेहरे पर थकान और निआराशा कभी झलकी ही नहीं ।इंदिरा जी का वर्ड हस्त उन पर था ही सो उन्हें पार्टी में ज्यादा अड़चन नहीं आयी और जहाँ अड़चन आई भी तो उन्होंने उससे पार पाने की कोशिश भी की ।
शीला जी अभिजात्य वर्ग की थीं लेकिन उनके जीवन में गांधीवाद का पूरा प्रभाव था,उनका रहन-सहन कभी उनके कामकाज में आड़े नहीं आया ।शीला जी कांग्रेस में किसी भी दायित्व को सम्हालने में कभी हिचकीं नहीं।कन्नौज से संसदीय जीव्वन शुरू करने वाली शीला जी केंद्र में मंत्री रहीं,तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं,राजयपाल बनाया तो उस जिम्मेदारी को भी उन्होंने बखूबी निभाया ।और हाल ही में जब उनके बूढ़े कन्धों पर दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष का दायित्व रखा गया तो भी वे पीछे नहीं हटीं।
राजनीति से इतर शीला जी ने महिला उत्थन के लिये अथक प्रयास किये । उन्होंने महिलाओं को समाज में बराबरी का स्तर दिलाने के अभियानों में अच्छा नेतृत्व दिया । उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ की महिला स्तर समिति में भारत का प्रतिनिधित्व भी पांच वर्षों (1984 – 89) तक किया। इन्होंने उत्तर प्रदेश में अपने 82 साथियों के साथ अगस्त 1990 में 23 दिनों की जेल यात्रा की थी, जब वे महिलाओं पर समाज के अत्याचारों के विरोध में उठ खड़ी हुईं थी, तब उन्होने प्रदर्शन भी किये थे। इससे भड़के हुए लाखों राज्य के नागरिक इस अभियान से जुड़े, व जेलें भरीं। 1970 में, वे यंग विमन्स असोसियेशन की अध्यक्षा भी रहीं, जिसके दौरान, इन्होंने दिल्ली में दो बड़े महिला छात्रावास खुलवाये। यह इंदिरा गाँधी स्मारक ट्रस्ट की सचिव भी हैं। इस ट्रस्ट ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना स्थान बनाया है। यही ट्रस्ट शांति, निशस्त्रीकरण एवं विकस के लिये इंदिरा गाँधी पुरस्कार देता है, व विश्वव्यापी विषयों पर सम्मेलन आयोजित करता है। इनके संरक्षण में ही, इस ट्रस्ट ने एक पर्यावरण केन्द्र भी खोला है।
शीला जी ने हस्तकला व ग्रामीण कलाकारों व कारीगरों के उत्थान में विशेष रुचि ली । ग्रामीण रंगशाला व नाट्यशालाओं का विकास, शीला जी का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने 1978 से 1984 के बीच, कपड़ा निर्यातकर्ता संघ (गार्मेंट्स एक्स्पोर्टर्स एसोसियेशन) के कार्यपालक सचिव पद पर, तैयार कपड़ा निर्यात को एक ऊंचे स्तर पर पहुंचाया है। वे धर्म-निर्पेक्षता पर सदा अडिग रहीं । सदा ही सांप्रदायिक ताकतों का प्रत्येक स्तर से विरोध किया है। शीला जी अक्सर कहतीं थीं , कि भारत में यदि जनतंत्र को जीवित रखना है, सही व्यवहार व सत्यता के मानदंडों का पालन करना जीवन का एक अभिन्न अंग होना चाहिये।
शीला जी का निधन उस समय हुआ जब कांग्रेस को उनके अनुभव की बहुत जरूरत थी ,अथक कार्य के बावजूद जनता ने दिल्ली में उन्हें नकारा भी लेकिन वे कभी घर नहीं बैठीं ,काम करती रहीं।आम कांग्रेस नेताओं की तरह उनके भीतर भी ममत्व था,वे भी अपने पुत्र को स्थापित देखना चाहतीं थीं ,आज वे नहीं हैं लेकिन उनकी बहुत सी यादें हैं ।मेरी विनम्र श्रृद्धांजलि ।
@ राकेश अचल