आखिर सिंधिया पर संशय क्यों ? @राकेश अचल

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देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की कमान सम्हालने वाला कोई नहीं मिल रहा है ।कांग्रेस का बोझ ९१ साल के श्री मोतीलाल वोरा के कन्धों पर अकारण टिका हुआ है।संसद चल रही है लेकिन कोई प्रतिपक्ष का नेता नहीं है और कांग्रेस के निवर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी अपना उत्तराधिकारी खोजे बिना भाग खड़े हुए हैं ।ऐसे में अध्यक्ष के रूप में ऊर्जावान नेता के रूप में पार्टी के महासचिव रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया पर सबकी नजरें टिकी हैं लेकिन उनके नाम को लेकर कांग्रेस में संशय के बादल छटने का नाम ही नहीं ले रहे ।
कांग्रेस अपने जीवन के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है ।जहाँ -जहाँ कांग्रेस की सरकारें हैं वहां-वहां संकट है लेकिन कोई संकटमोचक दिखाई नहीं दे रहा ।लेकिन कांग्रेस सब कुछ छोड़कर अपने लिए नया अध्यक्ष नहीं तलाश पा रही है ।कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए गांधी परिवार के बाहर से पूर्व में सीताराम केसरी और पीव्ही नरसिम्हाराव को छोड़कर कभी किसी को मौक़ा नहीं मिला ।इंदिरा गांधी के अध्यक्ष बनने से पहले एक देवकांत बरुआ जरूर थे ,लेकिन सभी को रबर स्टाम्प माना गया ।श्रीमती सोनिया गांधी के उम्रदराज होने के बाद जैसे-तैसे राहुल गांधी को उत्तराधिकार दिया गया था लेकिन वे दो साल में ही तक गए ।राहुल के बाद उनकी बहन प्रियंका बांद्रा का नाम बचा लेकिन वे भी खुलकर सामने नहीं आयीं हालांकि वे भी पार्टी की महा सचिव हैं ।
लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो अपने पद से इस्तीफा देने की पेशकश की थी लेकिन बाक़ी कोई दूसरा आगे नहीं आया,न प्रदेशाध्यक्ष और न कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री ,खासतौर पर उन तीन राज्यों के जहां बीते साल ही कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी थी ।राहुल जब अपने इस्तीफे पर अड़ गए तब कहीं उनकी टीम के सौ से ज्यादा लोगों ने अपने इस्तीफे दिए लेकिन तब तक देर हो चुकी थी ।उनके इस्तीफों के बाद भी राहुल वापस नहीं लौटे ,हारकर श्री मोतीलाल वोरा को कार्यवाहक अध्यक्ष बना दिया गया है।
कांग्रेस के भीतर कभी इस तरह का भयंकर नेतृत्व संकट आएगा किसी ने सोचा न था ,सोचने की जरूरत भी नहीं थी क्योंकि कांग्रेस का काम गांधी परिवार से चल रहा था,अब अचानक अन्धेरा सा छा गया है ।पार्टी में अनेक नए-पुराने नेता हैं लेकिन कोई न आगे बढ़कर अध्यक्ष पद के लिए हामी भर रहा है और न गांधी परिवार इस मामले में पहल कर रहा है ।कांग्रेस में भीतर ही भीतर पहले सुशील कुमार शिंदे का नाम चला लेकिन बात फ़स हो गयी।शिंदे 78 साल के हैं इसलिए उनके नाम को किसी ने हवा नहीं दी।कांग्रेस को भाजपा के नेतृत्व की तरह ऊर्जावाननेत्रित्व की जरूरत है ,जो दिन-रात काम कर लगभग बैठ चुकी कांग्रेस को दोबारा खड़ा कर सके ।ऐसे नेताओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट का नाम सामने आता है लेकिन अभी तक किसी ने इन युवा नेताओं की पीठ पर हाथ नहीं रखा ।
कांग्रेस के महासचिव रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया गांधी परिवार के निकट हैं। उनके पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया भी एक जमाने में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के अति विश्वासपात्र माने जाते थे ।पीव्ही नरसिम्हाराव की सरकार में मंत्री रहे माधवराव सिंधिया को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा था ,लेकिन अब तक ज्योतिरादित्य के नाम पर कोई बात नहीं हो रही है ।मध्यप्रदेश में ही कांग्रेस की सरकार को दोबारा लाने में ज्योतिरादित्य ने अथक श्रम किया था लेकिन जब पार्टी सत्ता में वापस लौटी तो उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया।आज भी उन्हें पार्टी की कमान सौंपने में एक अजाना संशय दिखाई दे रहा है ।सिंधिया का अपना कोई गुट नहीं है लेकिन उनके खिलाफ अनेक गुट हैं शायद इसीलिए गांधी परिवार और शेष कांग्रेस उनके नाम पर फैसला नहीं कर पारहा है ।
पार्टी में एक बड़ा वर्ग है जो मानता है की सिंधिया में चुम्कत्व के अलावा अथक श्रम करने की क्षमता है इसलिए उन्हें राहुल गांधी का उत्तराधिकारी चुना जाना चाहिए लेकिन दिग्विजय सिंह और कमलनाथ जैसे उन्हीं के प्रदेश के नेताओं को लगता है की सिंधिया को आगे करने से पार्टी को अपेक्षित परिणाम शायद न मिलें ,लेकिन इस संशय के समर्थन में किसी के पास कोई कारण नहीं है ,बस एक अजाना भय है ।जब तक ये संशय दूर नहीं होता बात नहीं बनेगी ।सिंधिया के अलावा सचिन पायलट के पास भी एक राजनीतिक विरासत,एक चॉकलेटी लेकिन गंभीर चेहरा है लेकिन उनके साथ भी वो ही स्नाक्त है जो सिंधिया के साथ है ।
जहां तक ज्योतिरादित्य सिंधिया का सवाल है वे 2002 से अब तक अजेय रहे ,2019 में उन्हें भी पराजय का मुंह देखना पड़ा बावजूद इसके उनके आकर्षण और लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आयी।आज भी मध्यप्रदेश के 114 विधायकों में से 80 उनके लिए बिछे पड़े हैं। दीगर राज्यों में भी उनकी अपील है ।संसद में भी वे छाये रहे हैं और अब संसद के बाहर उन्हें दहाड़ने का अवसर दिया जा सकता है लेकिन पता नहीं कब कांग्रेस को सद्बुद्धि आएगी ।कांग्रेस के प्रति सिंधिया की निष्ठा भी असंदिग्ध है ।
@राकेश अचल