अतीत से सबक लेता एक प्रधानमंत्री…..! @ राकेश अचल

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भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अतीत से बहुत सारे सबक सीखे हैं और कोई माने या न माने उन्हें ज्यादातर सबक पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से सीखने को मिले ।श्रीमती गांधी के कार्यकाल में लगाया गया आपातकाल भी मोदी के लिए एक बड़ा सबक रहा और शायद इसी की बिना पर वे आपातकाल लगाए बिना भी देश में वे तमाम हालात पैदा कर पाने में कामयाब होते आये हैं जो आपातकाल के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सामने चुनौती के रूप में मौजूद थे ।
देश में जब आपातकाल लगाया गया उस समय आज के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी गबरू जबान थे।उनकी उम्र उस समय कोई 25 साल के आसपास थी ,तब उन्हें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े हुए भी कोई चार साल ही हुए थे ,संघ के नए पूर्णकालिक कार्यकर्ता थे इसलिए आपातकाल में गिरफ्तारी से बच गए लेकिन कहते हैं की उन्होंने संघ के लिए और तत्कालीन सरकार के खिलाफ भूमिगत होकर काम किया ,क्या काम किया वे ही जानते हैं,देश नहीं ।देश सिर्फ इतना जानता है की वे भाजपा से भी भाजपा के जन्म के पांच साल बाद 1985 में जुड़े उस समय उनकी उम्र 35 साल की रही होगी
मोदी जी का अभ्युदय 2001 में हुआ ,बिल्ली के भाग्य से जैसे छींका टूटता है वैसे ही 2001 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल के बीमार होने के बाद संघ ने मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री नामजद कर दिया,उसके बाद से मोदी जी ने पीछे मुद कर नहीं देखा और वे निरंतर श्रीमती इंदिरा गांधी की ही तरह अपने राजहठ से आगे बढ़ते-बढ़ते 2014 में देश के प्रधानमंत्री बन गए ।और अब ये उनका दूसरा कार्यकाल है
एक मुख्यमंत्री के रूप में 13 साल काम करने के बाद मोदी की अनुभवजन्यता असंदिग्ध थी ।उन्होंने 2014 में अपने समकालीन ही नहीं अपितु तमाम वरिष्ठ नेताओं को ठिकाने लगाते हुए पारी में अपने लिए जगह बनाई और आज वे भाजपा में शीर्ष नेता हैं ।उनकी चाल,चरित्र और चेहरा ही भाजपा का चेहरा है ।इस चेहरे पर ठीक वैसी ही दृढ़ता और अहमन्यता है जैसी किसी जमाने में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चेहरे पर देखी जाती थी ।
आपातकाल की 44 वीं सालगिरह पर मै अजाने में मोदी और श्रीमती इंदिरा गांधी की तुलना नहीं कर रहा ,ये अपने आप ही हो रहीहै,मोदी जी ने बीते पांच साल में जो सोचा सो किया ये बात अलग है की वे अपने ‘प्लान ‘ में कितने कामयाब या नाकामयाब रहे ।उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी की पीढ़ी को ठिकाने लगाया ,देश की अर्थव्यवस्था में से कालाधन बाहर करने के लिए नोटबंदी की ,जम्मू-कश्मीर में सत्ता में भागीदारी की और तोड़ी ,कांग्रेस को निर्मूल करने का अभियान छेड़ा तो छेड़ा और देश में ध्रुवीकरण के लिए वे जो कर सकते थे सो उन्हने किया ।उन्होंने सबसे पड़ा काम किया देश के मीडिया को अपना चारण बनाने का ।जो बचे रह गए की कमर तोड़ने के लिए आपाताकाल की तरह हथकंडे नहीं अपनाये बल्कि सीधे प्रहार किया,कीमत लगाईं और जो नहीं बाइक उन्हें असहाय कर दिया ।
लोकतंत्र के चेहरे पर आपातकाल का दाग लगाकर ताउम्र खलाइका रहीं श्रीमती इंदिरा गांधी की ही तरह श्री मोदी भी दूसरी बार सत्ता में वापस लौटे हैं लेकिन उनके सामने वो देश नहीं है जो श्रीमती इंदिरा गांधी के समय में था ।मोदी जी ने अपने असंख्य भक्त बनाने में कामयाबी हासिल की लेकिन वे अपने असंख्य आलोचक बनने से भी नहीं रोक सके ।आज संसद में मोदी जी सबल हैं लेकिन संसद के बाहर उनके आलोचकों की कोई कमी नहीं है ,वो भी तब जबकि श्री मोदी जी अपने आलोचकों के प्रति श्रीमती इंदिरा गांधी से भी अधिक निर्मम हैं ।मोदी जी की निर्ममता में ही ममत्व भी छिपा है ।अपने पहले कार्यकाल में बिहार में खेत रहे मोदी ने वहां के चमकदार नेता नीतीश कुमार को अपनी गोद में बैठकर उनका रंग फीका कर दिया।बंगाल में ममता बनर्जी ने मोदी को आँखें दिखाएं तो उनका गढ़ ध्वस्त करने में कोई कसार नहीं छोड़ी ।यूपी में मायावती और समाजवादियों के गठजोड़ को दरका दिखाया ।
लब्बोलुआब ये है की आज 44 साल बाद भी देश में वे सब हालात मौजूद हैं जो 1975 में थे ।1975 में अगर कुछ नहीं था तो वो था साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण,बजरंग दल और साधू-संतों की आएग उगलने वाली फ़ौज ।राम मंदिर-मस्जिद का विवाद नहीं था ।बेरोजगारी थी,निराशा थी,घुटन थी ,सो आज भी है ,आज की सियासत में अस्पृश्यता और जुड़ गयी है बहरहाल आज १९७५ की तरह ‘लोकतंत्र खतरे में है ‘ का नारा देने वाला कोई नहीं है ,क्योंकि लोकतंत्र को चुनौती देने वाली इंदिरा गांधी की कांग्रेस आज विपक्ष ें है और उसकी तबीयत भी ठीक नहीं है।कांग्रेस के बाद का विपक्ष बिखरा है ,उसके पास कोई जेपी भी नहीं है ,इसलिए जो है सो है ।जनता मोदी जी को एक और अवसर देकर अपने जख्मों पर मरहम लगाए जाने का इंतिजार कर रही है ।देखिये जनता का सपना पूरा होता है या नहीं ?क्योंकि पहले तो 21 माह में सब कुछ बदल गया था,लेकिन आज 61 माह बाद भी हालात जस के तस हैं
@ राकेश अचल