मप्र में सत्ता के ‘गर्भपात’ के लक्षण….

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मुझे कांग्रेस का समर्थक माना जाता है ये अलग बात है लेकिन अपने सूबे की सियासत के बारे में मै सदैव सचेत रहता हूं । सात समंदर पार से भी मुझे इस समय प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता के गर्भपात के लक्षण साफ़ दिखाई दे रहे हैं ।कहते हैं कि कौओं के कोसने से ढोर नहीं मरते लेकिन जब मौत सर पर मंडराने लगे तो बेचारे कौओं को दोष देने की जरूरत ही नहीं रहती,ऐसा ही मप्र की कमलनाथ सरकार के साथ हो रहा है ।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ को भले ही भाजपा से खतरा हो या न हो लेकिन कांग्रेस से ही खतरा दिखाई दे रहा है ।वे एक तरफ दिल्ली में प्रधानमंत्री से पींगें बढ़ा रहे हैं उधर सूबे में उनके ही मंत्रिमंडलीय साथी उनकी भद्द पीटने पर आमादा हो गए हैं ।कमलनाथ के लिए ‘सबका साथ,सबका विकास’करना कठिन दिखाई दे रहा है । उनकी सरकार एक तिपाई की तरह है जिसके पाए अलग-अलग लकड़ी के बने हैं ,इनमें से कब,कौन पाया कमजोर पड़ जाए कहा नहीं जा सकता ।
डेढ़ दशक की लम्बी प्रतीक्षा के बाद सत्ता में वापस लौटी कांग्रेस की सरकार छह माह में ही लड़खड़ाती दिख रही है जबकि उसे इन छह महीनों में चलकर दिखाना था ।बीते छह माह में सरकार ने सिर्फ दो ही काम किये हैं ,एक पूरी सरकारी मशीनरी का कायाकल्प और दूसरे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की समाप्ति ।नैतिक रूप से दोनों के लिए मुख्यमंत्री ही जिम्मेदार है और वास्तव में सत्ता की तिपाई के तीनों पाए ,यानि कमलनाथ के अलावा दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी ।चूंकि सिंह और सिंधिया भी लोकसभा चुनाव में खेत हो गए इसलिए उनका खून माफ़ किया जा सकता है किन्तु बेचारे कमलनाथ क्या करें ?
मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ जी के पास एकमात्र विकल्प ये है कि वे अपनी [लंगड़ी-लूली यानि जैसी भी है ]सरकार चलाकर नहीं दौड़ा कर दिखाएँ ।कांग्रेस की पुरानी सरकारें सचिवालयों से निकलकर जनता के दरवाजे तक जाती रहीं हैं लेकिन कमलनाथ सरकार ने इस बारे में अभी तक सोचा तक नहीं है ।’आपकी सरकार,आपके द्वार’ जैसे प्रयोग अतीत की बातें हो गयीं हैं।मुख्य सचिव भोपाल से बाहर नहीं निकल रहे और पुलिस महानिदेशक की मौजूदगी प्रदेश की क़ानून और व्यवस्था को कहीं रेखांकित नहीं कर रही कमलनाथ जी और उनकी नौकरशाही को नया कुछ सूझ ही नहीं रहा है ।कमलनाथ सरकार के भूखे-प्यासे मंत्री अभी भी तबादलों में उलझे हुए हैं ।कमलनाथ शायद नहीं जानते कि सरकार मशीनरी की अदला-बदली से नहीं मुख्यमंत्री के अपने इकबाल से चलती है जो अब तक बुलंद नहीं हो पाया है ।
कमलनाथ सरकार का चलना बहुत जरूरी है ,प्रदेश की जनता ने जनादेश इसीलिए कांग्रेस को दिया था,अब यदि कांग्रेस अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों की वजह से सरकार चलाने में विफल होती है तो ये जनादेश का अपमान होगा ।इस बात में कोई संदेह नहीं कि कमलनाथ की सरकार को अपदस्थ करना भाजपा के लिए आसान नहीं है लेकिन इस बात में संदेह है कमलनाथ अपने दीगर सहोदरों को नाथने में कामयाब हो सकते हैं या नहीं !मुख्यमंत्री को अब कम से कम दो साल के तबादलों पर सख्ती से पाबंदी लगा देना चाहिए और अनुशासनहीन मंत्रियो को निर्ममता के साथ सबक सिखा देना चाहिए,लेकिन इसके लिए उसे पार्टी हाईकमान के सहयोग की जरूरत पड़ेगी ,और कांग्रेस का हाईकमान भाजपा के हाईकमान जैसा नहीं है ।उसकी करवट का अंदाजा भी किसी को नहीं होता इसलिए संकट तो है ।
प्रदेश में जनादेश का सम्मान हो,कांग्रेस की सरकार चले ये भाजपा को छोड़ हर कोई चाहता है और जो नहीं चाहता वो प्रदेश का हितैषी कतई नहीं हो सकता ,इसलिए अब ये कांग्रेस और उसके नेताओं को तय करना है कि प्रदेश में कांग्रेस की चले या चलती बने ?जनता अपना निर्णंय छह माह पहले सुना चुकी है ।अब उसे परिणाम चाहिए,बिजली,पानी,स्वास्थ्य,शिक्षा,सड़क,सुरक्षा उसकी पहली जरूरत है ,जो भी इस काम में आड़े आ रहा हो उसे मुख्यमंत्री जी हटाएँ ,अन्यथा जनता भले ही चुप रहे सत्ता के आदी लोग चुप नहीं बैठेंगे ।
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@राकेश अचल