क्या “रामनामी” है हमारी सरकार …? @राकेश अचल

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सत्रहवीं लोकसभा के लिए चुने गय्ये सदस्यों के शपथ विधि के सी की गयी नारेबाजी से एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ है की -क्या हमारी नई सरकार “रामनामी”सरकार है या एक महान गणतंत्र की धर्मनिरपेक्ष सरकार ?।सवाल खुद सरकारी पार्टी के सांसदों की नारेबाजी से उपजे हैं इसलिए जबाब भी सरकार और सरकारी पार्टी की और से आना चाहिए ।
देश की संसद के लिए कोई भी सांसद धर्म,जाति पंथ के नाम पर नहीं चुना जाता ।इस आधार पर वोट मांगने की भी मनाही है ,चुनाव आयोग की नजरें बचाकर कोई ऐसा करता भी है तो भी संसद में आकर उसे विधिसम्मत शपथ ही लेना पड़ती है ।क्योंकि अंतत:हर सदस्य संविधान से ही बंधा है ।शपथ विधि के बाद पहले कभी ऐसा नहीं हुआ की सदस्यों ने अपने आराध्य के नारे लगाकर अपनी धार्मिक आस्थाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन किया हो ।
हैदराबाद से एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी के शपथ ग्रहण में बीजेपी सांसदों ने जय श्रीराम के नारे लगाए। इसके जवाब में ओवैसी ने जय भीम, अल्लाह-हू-अकबर और जय हिंद का नारा लगाया। ओवैसी ने यह भी कहा कि मुझे देखकर इन्हें राम की याद आती है, लेकिन काश इन्हें बच्चों की मौत की भी याद आ जाती।दुर्भाग्य ये की सदन के वरिष्ठ सदस्यों या अस्थाई सभापति ने किसी को ऐसा करने से रोका नहीं और ये नारे हमेशा के लिए सदन की कार्रवाई में दर्ज हो गए
संसद में पहले भी नव निर्वाचित सदस्य अपनी-अपनी भाषा में सपथ लेकर लोगों को चौंकाते रहे हैं लेकिन इस बार शपथ ग्रहण में कुछ सांसदों का अलग ही अंदाज नजर आया। बीजेपी सांसद प्रज्ञा ठाकुर ने शपथ ग्रहण के बाद जहां भारत माता की जय का नारा लगाया तो पंजाब के संगरूर से आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया। केंद्रीय मंत्री और पेशे से सर्जन डॉक्टर हर्षवर्धन ने संस्कृत में शपथ ली तो केरल से कांग्रेस सांसद के सुरेश ने हिंदी में शपथ लेकर सबको चौंका दिया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अंग्रेजी में शपथ ली।
सदन में राम और अल्लाह के नाम पर नारेबाजी दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि सदन लोकतंत्र का मंदिर है यहां संविधान की आराधना होती है राम या अल्लाह की नहीं ,ऐसा होना भी नहीं चाहिए लेकिन जैसे-जैसे सदन से अनुभवी सदस्यों की संख्या घाट रही है उसी गति से नयी बातें देखने में आने लगीं हैं ।सदन की उच्च परम्पराओं से लगता है की किसी का कोई लेना देना नहीं है ।बहुमत से सरकार में आई पार्टी के इरादे नेक नहीं लगते ।ये पार्टी पहले से राम का नाम लेकर बंगाल में बखेड़ा खड़ा किये हुए है और अब बात संसद तक आ पहुंची है ,इसे सख्ती से रोका जाना चाहिए ।
राम और अल्लाह व्यक्तिगत आस्था का आधार हो सकते हैं लेकिन लोकतंत्र तो संविधान से ही चलेगा ।सरकारों का काम अल्लाह-ईश्वर की आराधना करना-कराना नहीं है ।देश के विधिवेत्ताओं को इस विषय पर अपना मौन तोड़ना चाहिए।मै स्वयं भगवान राम का अनुयायी हूँ लेकिन मै उनका इस्तेमाल नारेबाजी के लिए कभी नहीं करता और न चाहता हूँ कि कोई अन्य रामभक्त भी ऐसा करे ।देश में 1980 से पहले भी धार्मिक आधार पर राजनीत करने वाले लोग थे लेकिन किसी ने मंदिर-मस्जिद को अपना सियासी एजेंडा नहीं बनाया था ,लेकिन अब तो बात लगातार आगे बढ़ती जा रही है ।
बहरहाल रामनामी ओढ़कर सियासत करने वाले सबको साथ लेकर सबका विकास करने की बात तो करते हैं लेकिन क्या ऐसा होना मुमकिन है ?अगर धर्म की चादरें ओढ़कर सरकारें और सरकारी पार्टियां काम करने लगीं तो बहुत जल्द आप देश में लोकतंत्र का एक नया स्वरूप देखेंगे जो किसी भी तरह से आजादी के बाद पाले-पोसे गए लोकतंत्र से मेल नहीं खायेगा ।मेरी चिंता मैंने जाहिर कर दी,आपकी आप जाने, क्योंकि लोकतंत्र में सब कुछ स्वतंत्र है ।
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@ राकेश अचल