जिंदगियां बदलने वाली ‘परी मां’ प्रमिला बसोई….

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स्वतंत्र भारत में पहली बार 78 महिलाएं सांसद चुनी गईं
जिंदगियां बदलने वाली ‘परी मां’ प्रमिला बसोई
यह फिल्मी कहानी-सी लगती है कि किसी महिला की शादी पांच साल में कर दी जाये, वह तीसरी कक्षा से आगे न पढ़ सके, परिवार के हिस्से में जीविका का साधन एक एकड़ से कम जमीन हो, परिवार की मासिक आय दस-बारह हजार हो और वह अपनी प्रेरक सोच के चलते सबसे बड़े लोकतंत्र की सांसद चुनी जाये। ओडिशा की बहुचर्चित अस्का सीट से सांसद चुनी गई प्रमिला बसोई इस कहानी की हकीकत है। सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव इस मायने में खास रहा कि स्वतंत्र भारत में पहली बार 78 महिलाएं सांसद चुनी गईं। हालांकि यह संख्या उनके वास्तविक हक से काफी कम है। ओडिशा ने 33 फीसदी महिलाओं को संसद में भेजकर देश की मुख्यधारा के राजनेताओं को आईना दिखाया है, जिनमें ओडिशा आदिवासी क्षेत्र से आने वाली सबसे कम उम्र की महिला सांसद चंद्राणी मुर्मू भी शामिल है।
कभी आंगनवाड़ी में खाना बनाने का काम करने वाली प्रमिला को लगा कि इससे परिवार का गुजारा नहीं होने वाला। उन्होंने महिलाओं को प्रेरित करने के लिये स्वयं सहायता समूह बनाकर नई पहल की। उनके प्रयासों से सैकड़ों परिवारों की जिंदगी बदल गयी। उन्होंने छोटी जोत की खेती करने वाली महिलाओं को नकदी फसल मसलन मक्का, मूंगफली व मौसमी सब्जियां बोने को प्रेरित किया। इससे उनकी आमदनी में खासी वृद्धि हुई। कालांतर वह ओडिशा बीजू जनता दल की बहुप्रचारित महिला स्वयं सहायता समूह के ‘मिशन शक्ति’ का प्रतिनिधि चेहरा बनायी गई। इस योजना के बारे में राज्य सरकार का दावा है कि इससे सत्तर लाख महिलाओं को फायदा हुआ है।
बेहद साधारण से पहनावे वाली इस भारतीय महिला के चेहरे पर दमकती बिंदी, चटख सिंदूर तथा नाक में फूली एक अलग आभा देती है। प्रमिला बसोई सत्तर साल की उम्र में भी बेहद सक्रिय हैं। उनके पति चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे। एक बेटा दिलीप चाय की दुकान करता है, दूसरा रंजन गाड़ियों की मरम्मत का काम करता है। दो बेटियों की शादी हो चुकी है। टिन की छत वाले मकान में रहने वाला परिवार दस-बारह हजार की आमदनी में जीवनयापन करता है।
प्रमिला की प्रेरणा से अपनी गृहस्थी चलाने वाली महिलाएं उन्हें खूब आदर देती हैं और उन्हें परी मां के नाम से बुलाती हैं। जमीन से जुड़ी प्रमिला ने महिलाओं को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। नि:संदेह उनके सांसद बनने में बीजद के सुप्रीमो नवीन पटनायक की बड़ी भूमिका है। प्रमिला ने दो लाख वोटों के अंतर से जीत हासिल की। जब प्रमिला ने धनाढ्य प्रत्याशियों और भाजपा की उम्मीदवार को हराया तो नवीन पटनायक ने कहा कि यह महिला शक्ति से जुड़ी लाखों महिलाओं के लिये एक उपहार है।
वाकई यह कमाल की बात है कि कम पढ़ी-लिखी होने के बावजूद प्रमिला ने स्वयं सहायता समूहों को कुशल नेतृत्व दिया है। उनमें एक गुण यह भी है कि वह समय के सवालों पर तुरंत गीत रच देती हैं। फिर गाकर महिलाओं को प्रेरित भी करती हैं।
मजेदार बात यह भी है कि उन्हें न तो अंग्रेजी आती है और न ही हिंदी। फिर भी आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं। वह विश्वास के साथ कहती हैं कि वह संसद में अपनी मातृभाषा में ही बात करेंगी और महिलाओं के मुद्दे उठाती रहेंगी। यही आत्मविश्वास प्रमिला को अन्य महिलाओं से अलग करता है।
नि:संदेह पितृसत्ता की सीमाओं को लांघते हुए उन्होंने महिला सशक्तीकरण की दिशा में जमीनी स्तर पर कामयाबी पायी है। आज जब संसद में करोड़पति सांसदों का वर्चस्व है तो प्रमिला ने चुनाव जीतकर निम्न मध्यवर्गीय लोगों की उम्मीदों को पंख दिये हैं। उन्होंने लाखों लड़कियों व महिलाओं में विश्वास जगाया है कि वे मेहनत व लगन से अपने सपनों को पूरा कर सकती हैं। वे स्वयं सहायता समूहों के जरिये परिवार का भरण-पोषण सम्मानजक ढंग से कर सकती हैं। यह भी कि काम कितना भी छोटा हो, उसे सीढ़ी बनाकर आगे बढ़ जाओ।
दरअसल, प्रमिला की प्राथमिकता घर-परिवार में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाने और स्वरोजगार पर बल देने की रही है। इसके अलावा वह पंद्रह वर्ष से समाज सेवा में सक्रिय रही हैं। क्षेत्र के ग्रामीण इलाके में महिलाओं के स्वास्थ्य, स्वच्छता व कुपोषण से जूझने के लिये अभियान चलाती रही हैं। प्रमिला ने अपने गांव को खुले में शौच से मुक्त करने के लिये भी अभियान चलाया। अपने गांव के निकट स्थित पहाड़ी में मोर व अन्य वन्यजीवों को बचाने के लिये भी प्रमिला ने पहल की। पर्यावरण संरक्षण के अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका के लिये उन्हें प्रकृति बंधु व प्रकृति मित्र सम्मान भी दिये गये।
नि:संदेह, प्रमिला को संसद की दहलीज तक पहुंचाने में मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की बड़ी भूमिका रही है मगर इस सफलता में प्रमिला का सामाजिक योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जिसके जरिये उन्होंने धनबल की राजनीति को धता बताते हुए एक नई प्रेरक मिसाल पेश की है।