गुब्बारा और आलपिन…. @ राकेश अचल

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दुनिया जानती है कि महाकार हाथी एक हाथ के अंकुश से और एक बड़ा गुब्बारा छोटी सी आलपिन से डरता है .ठीक ऐसा ही काशी के तेज बहादुर से लोग दर गए.लोकतंत्र के महायज्ञ में जोर आजमाइश करने के लिए कमर कसकर खड़े तेज बहादुर यादव का नामांकन पत्र जिला निर्वाचन अधिकारी ने खारिज कर दिया .चूंकि ये उनके अधिकार क्षेत्र की बात है और इसे केवल केंचुआ में ही चुनौती दी जा सकती है ,इसलिए ज्यादा कुछ कहना फिजूल ही होगा .वापस गुब्बारे और आलपिन के रिश्ते पर लौटते हैं. गुब्बारा रबर का होता है और उसमें हवा भरना पड़ती है.बिना हवा के गुब्बारे का कोई मोल नहीं होता .हवा भरा गुब्बारा आसमान में शान से उड़ सकता है ,बिना हवा का गुब्बारा पिचका पड़ा रहता है. हवा में अठखेलियां करने वाले फोले हुए गुब्बारे को हमेशा अपनी हवा निकलने का डर सताता रहता है इसलिए गुब्बारा हर उस चीज से आतंकित रहता है जो उसकी हवा निकाल सकती हो .मसलन नुकीला पत्थर या आलपिन या कील .ये सब चीजें देखने में बेहद छोटी होती हैं किन्तु इन सबके पास गुब्बारे की हवा निकालने की अकूत ताकत होती है .
गुब्बारों की फितरत हमारे नेताओं से बहुत मिलती जुलती है.ये पल में फूल कर गुब्बारा हो जाते हैं और पल में कोई नुकीली चीज के चुभते ही पिचक कर जमीन पर आ गिरते हैं .फूले हुए गुब्बारे अपनी हिफाजत के लिए क़ानून के हथौड़े रखते हैं जो हर नुकीली चीज को मौथरा करने का काम करते हैं .वे काशी के जिला निर्वाचन अधिकारी जैसे भी हो सकते हैं जो केवल गुब्बारों की हिफाजत के लिए ही बने हैं .काशी की फिजा में आजकल गर्म हवा का गुब्बारा उड़ता है .गर्म हवा का गुब्बारा आम गुब्बारों से कहीं ज्यादा नाजुक होता है और उसे नुकीली चीजों से ज्यादा डर लगता है ,और फिर ये नुकीली चीज किसी तेज बहादुर यादव जैसी हो तो डर चार गुना हो जाता है क्योंकि उसके पीछे साइकल,झाड़ू और हाथी खड़े नजर आते हैं .
फिलहाल क़ानून के हथौड़े ने काशी के नुकीले तेज बहादुर को मौथरा कर दिया है.गर्म हवा के गुब्बारे को पिचकने से बचने के लिए ये आवश्यक था .देश की अस्मिता के लिए ये आवश्यक था.माँ गंगा के लिए इसकी जरूरत थी .काशी का गर्म हवा का गुब्बारा हर युग में इसी तरह नुकीली चीजों से डरता आया है,मात भी खाता आया है ,लेकिन फौरी तौर पर उसका डर कम हो जाता है .तेज बहदुर की मौजूदगी से गर्म हवा का गुब्बारा हलकान हो गया था .इसीलिए पूरी ताकत से तेज बहादुर को काशी के आसमान में उड़ने से रोका गया .यूं भी लोकतंत्र में छोटी चीजों के लिए कोई स्थान नहीं होता .
हकीकत ये है की गुब्बारे में हवा जन्म-जन्म के लिए भरी नहीं रहती,उसे पांच-दस साल में निकलना ही पड़ता है.किस्मत वाले ही होते हैं जो इस हवा के सहारे पांच से पंद्रह साल तक उड़ान भरते रहते हैं .हमारे सूबे में सिब्बो भैया का गुब्बारा पंद्रह साल उड़ा ,उसे पंचर करने के लये पता नहीं कितनी नुकीली चीजों को अपनी सामूहिक ताकत दिखाना पड़ी थी लेकिन दुर्भाग्य देखिये की हमारे सूबे के इस गुब्बारे को भी अंतत:पंचर कर ही दिया गया .
मैंने कहा न की हर गुब्बारे की हवा एक न एक दी निकलती जरूर है ,इसलिए गुब्बारे को अपने आप पर अधिक गुमान नहीं करना चाहिए.गुब्बारे में उसका अपना कुछ भीं होता सिवाय हवा के हवा अजर-अमर है .हवा का कोई मुकाबला नहीं ,हवा का रुख जो पहचान लेता है वो कभी पंचर नहीं होता इसलिए सावधान गुब्बारों तुम्हें तो एक न एक दिन पंचर होना ही है ,भले ही तुम चाहे जितना फूल लो .
@ राकेश अचल