गाली-गलौच से निजात कैसे मिले ? @ राकेश अचल

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विश्व गुरु भारत का नागरिक होने के बावजूद मेरा सिर शर्म से झुका हुआ है और इसकी वजह हैं हमारे देश के वे महान नेता जो आम चुनाव में गाली-गलौच पर उतर आये हैं.इन दिनों मै अमरीका में हूँ और यहां रहने वाले भारतवंशियों को इन सवालों का कोई उत्तर नहीं दे पा रहा की हमारे नेता इतने अधिक असभ्य क्यों हैं ,और कब से हैं ?
सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दलों को अपनी बात मतदाताओं तक पहुंचानेकी छूट है लेकिन वे इसके बजाय गाली-गलौच पर उतर आएं इसकी छूट उन्हें किस क़ानून के तहत मिली हुई है ये हमें नहीं पता .हमारा चुनाव आयोग पहले से नख-दन्त विहीन है ,बेचारे को जब देश की सबसे बड़ी अदालत हड़काती है तब उसे होश आता है और वो दोषियों के खिलाफ छुटपुट कार्रवाई करता है लेकिन दोषी भी इतनी मोटी चमड़ी के हैं की केंद्रीय चुनाव आयोग के हर कदम का तोड़ खोज लेते हैं .
भारत पूर्व में विश्व मानचित्र पर जितना प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण था उतना शायद अब नहीं है लेकिन हमारे रहनुमा दावा करते हैं की हम दुनिया में अपना डंका बजा चुके हैं ,ये बात और है की हमें अब तक बात करने की तमीज नहीं आयी है .बद्तमीज नेता किसी एक दल की सम्पत्ति नहीं हैं,हर दल के पास एक से बढ़कर एक बद्तमीज नेता हैं.बद्तमीज ही नहीं बदतमीजियों पर पर्दा डालने वाले नेता भी हैं .चुनाव आयोग भी जाने-अनजाने ये काम करता है.जब जिसकी ढपली हाथ में होती है बजा उठता है .
भारत में जन प्रतिनिधित्व क़ानून में जितने भी प्रावधान हैं वे सब मिलकर भी भारत के बद्तमीज नेताओं को तमीज नहीं सिखा सकते .ये काम राजनीतिक दलों के अनुषांगिक संगठनों का है लेकिन आज तक वे भी तमीज की जगह अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को बदतमीजी सिखाने में व्यस्त हैं .जो जितना ज्यादा बद्तमीज नेता उसका उतना ज्यादा रसूख है .अगर आप सत्ता में है तो किसी को भी माँ की गाली दे सकते हैं और यदि सत्ता के बाहर हैं तो किसी को भी जूतों से मारने की धमकी दे सकते हैं. चुनाव में सरे आम शराब बांटने की बात करना तो जैसे कोई गुनाह है ही नहीं .
मुझे लगता है की भारत को बद्तमीज नेताओं से मुक्ति दिलाने के लिए अगली सरकार को जन प्रतिनिधित्व क़ानून में संशोधन कर चुनाव प्रचार का काम भी खुद सम्हालने की व्यवस्था करना पड़ेगी .बेहूदा और बेहिसाब मंहगे चुनाव प्रचार से बेहतर है की चुनाव आयोग ही विभिन्न राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पात्र मतदाता पर्चियों के साथ मतदाता के घर तक पहुंचाए और तमाम रोड शो तथा रैलियों पर पाबंदी लगाए ,अधिक से अधिक सरकारी टीवी चैनल पर पहले की तरह अपना पक्ष रखने के लिए आधा घंटे का समय राजनीतिक दलों को दे दे .चुनावी रैलियों के उलटे-सीधे प्रसारणों पर पाबंदी और बेमतलब की छद्म बहसों और सर्वेक्षणों पर रोक लगाकर राजनीति को बद्तमीज होने से बचाया जा सकता है .
चुनाव आयोग को ये अधिकार देना चाहिए की वो हर मतदाता तक हर राजनीतिक दल का एजेंडा पहुंचने का प्रबंध करेगा और उसके एवज में राजनीतिक दलों से ही सेवा शुल्क वसूल करेगा .मेरे ख्याल से ऐसा करना शायद आज के चुनाव खर्च के मुकाबले कुछ सस्ता पड़े ,लेकिन ऐसा करना आसान नहीं है.जिस तरह तमाम राजनीतिक दल आज भी महिला विधेयक जैसे मुद्दों पर एक राय नहीं हो सकें हैं वैसे ही शायद ही वे चुनावों को पवित्र बनाने के लिए तैयार न हों ,क्योंकि जो सुविधा उनके पास आज है वो नया क़ानून बनने के बाद बंद हो जाएगी .
भारत के सम्मान को मिट्टी में मिलते हुए देखने और नयी पीढ़ी को और अधिक निर्लल्ज व्यवस्था सौंपने से बेहतर है की हम सब मिलकर कुछ नया करें अन्यथा आज मंचों से गालियां सुनाई दे रहीं हैं कल ये ही गालियां और धमकियां चुनाव घोषणापत्रों का अभिन्न अंग भी बन सकतीं हैं .बदतमीजी खतरे के निशाँ को छू चुकी है यदि तत्काल इंतजाम न किये गए तो हालात बेकाबू हो जायेंगे और हमारा वो लोकतंत्र जिस पर हम गर्व करते हैं मवाली तंत्र में तब्दील हो जाएगा.यदि आप सच्चे भारीतय हैं और अपने देश से प्रेम करते हैं तो इस विषय पर मौन तोड़िये और बदतमीजी के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी मुहीम शुरू कीजिये,जहा हैं वहीं से.इसके लिए किसी नेता या दल की जरूरत नहीं है.
@ राकेश अचल