कलाकारों पर आश्रित होती सियासत…. @ राकेश अचल

70

**********************************
भारत की सियासत को घुन लगने लगी है.किसी भी राजनितिक दल के पास आज की तारीख में कोई ऐसा नेता नहीं है जिसे सर्वमान्य रूप से देश अपना ‘हीरो’ स्वीकार कर ले .हालात ऐसे बन गए हैं की अब लोकसभा के प्रत्यक्ष चुनाव तक में नायकों और गायकों की जरूरत महसूस की जाने लगी है .
अतीत में देश की राजनीति में नायकों और गायकों यानि कलाकारों और बुद्धिजीवियों को राजनीति में बनाये रखने के लिए राजयसभा में भेजा जाता था ,लेकिन आठवें दशक में ये लोग सीधे चुनाव मैदान में उतारे जाने लगे.कांग्रेस का ये प्रयोग अब हरेक सियासी दल की जरूरत बन गया है .अब सिनेमा और टीवी के कलाकार राजनीति की मुख्यधारा में सक्रिय नजर आने लगे हैं .बिना इनके राजनीति सूनी-सूनी दिखाई देती है .
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर देश के मैजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक इन कलाकारों के भरोसे हैं नेहरू जी के समय में कलाकार राजयसभा तक सीमित थे किन्तु राजीव गांधी के समय में इन सिने कलाकारों ने राजनीति की मुख्यधारा में कदम रखे तो फिर ये सिलसिला थमा ही नहीं .अमिताभ बच्चन से लेकर सुनील दत्त,हेमामालनी ,ज्या पर्दा,जया बच्चन जैसी मशहूर अभिनेत्रियां तक इस फेहरिश्त में शामिल हो गयीं .
लोकप्रियता के मामले में लगातार हासिये पर जा रहे नेताओं को अब चुनाव प्रचार के लिए इन सिने कलाकारों की जरूरत पड़ती ही है.अब हर दल के पास सिने कलाकार स्टार प्रचारक के रूप में मौजूद हैं. भाजपा ने स्वप्न सुंदरी हेमामालिनी और स्मृति ईरानी से लेकर नायक शत्रुघन सिन्हा और खलनायक विनोद खन्ना तक को मौक़ा दिया ,मौक़ा ही नहीं दिया अपितु मंत्री तक बनाया .सिने कलाकार चुनाव हारें या जीतें लेकिन आते सबके काम हैं
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस ने अमिताभ बच्चन और सुनील दत्त का इस्तेमाल किया था ,गोविंदा जैसे अभिनेता भी सांसद बनाकर इतिहास में दर्ज हो गए राजयसभा में तो तमाम नाम-चीन्ह अदाकार राजनीति की सेवा कर चुके हैं.दिलीप कुमार और बैजयंतिमाला से लेकर आज की रेखा तक राजयसभा की सदस्य रह चुकी हैं ,इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है.आपत्तिजनक है तो सिर्फ इतना की अब सियासत के पास खुद का कोई हीरो नहीं है जिसे की आदर्श माना जा सके .
जिस देश की सियासत नेशनल हीरो के मामले में कंगाल होती है उस देश में राजनीति का पतन तेजी से होता है .कल तक भाजपा के पास अटल बिहारी बाजपेयी थे ,आज कोई नहीं है.कांग्रेस के पास तो इंदिरा और राजीव गांधी के बाद कोई हीरो पैदा ही नहीं हुआ .समाजवादी पार्टी के पास जाया बच्चन आज हैं,मुमकिन है की कल न हों क्योंकि अदाकारों को छाँटकर सियासत में लाने वाले अमर सिंह अब सपा के पास नहीं किसी और राजनितिक दल के पास हैं .
भारत में पहले केवल दक्षिण की राजनीति के केंद्र में अदाकार होते थे ,आज भी इक्का-दुक्का हैं किन्तु जयललिता के बाद वहां भी अब एक शून्य है ,जो नायक/खलनायक सियासत में किस्मत आजमाना चाहते हैं उनका भी कोई बड़ा आधार नहीं है .उन्हें किसी न किसी राष्ट्रीय दल का सहारा लेना पड़ रहा है .राजनीति में हीरो के अदृश्य होने की एकमात्र वजह भ्र्ष्टाचार का बढ़ता असर है .अपवाद छोड़कर किसी भी दल के पास ऐसा कोई नेता नहीं है जो दूध का धुला हो .अब तो भाजपा से खड़े गए शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस के मित्र हैं और कांग्रेस से खदेड़े गए दुसरे अभिनेता भाजपा के ख़ास .दुर्भाग्य तो ये है की अब सपना चौधरी जैसी नर्तकियां तक राजनीति की जरूरत बन गयीं हैं .
देश की राजनीति को अदाकारों से मुक्त कराने का ये सही समय है. देश के मतदाताओं को चाहिए की जो भी दल सिने कलाकारों को चुनाव में खड़ा करें वे उन्हें खारिज कर दें अन्यथा मथुरा जलेगा और हेमामालिनी शूटिंग में व्यस्त नजर आएंगीं और दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष कहीं बिरहा गाते दिखाई देंगे .अब मर्जी है आपकी,क्योंकि देश है आपका .
@राकेश अचल