दिग्गी राजा हैं ,अभिमन्यु नहीं….!!! – राकेश अचल

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दिग्गी राजा हैं ,अभिमन्यु नहीं
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भाजपा मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लोकसभा में जाने से रोकने को तो आतुर है लेकिन अब तक भाजपा भोपाल सीट से कोई मजबूत प्रत्याशी तय नहीं कर पायी है।
आम धारणा है कि कांग्रेस ने दिग्गी राजा को भोपाल से जानबूझकर प्रत्याशी बनाया गया है।दिग्विजय की जीत से कहीं ज्यादा दिलचस्पी उन्हे हराने में है।दिग्गी राजा भले ही एक दशक मप्र के मुख्यमंत्री रहे लेकिन वे कहीं से भी चुनाव जीतने की हैसियत में नजर नहीं आए किंतु उनका आत्मविश्वास हमेशा हारकर भी जीता।इस बार भी उनका आत्मविश्वास ही भाजपा के लिए चुनौती है।
दिग्विजय को चुनावी चक्रव्यूह में फंसाने में लगे भाजपा और कांग्रेस के नेता भूल गये हैं कि दिग्गी को चक्रव्यूह रचने और उसे तोड़ने में महारत हासिल है ।वे एक तरफ भाजपा के प्रिय बंटाधार हैं तो दूसरी तरफ भाजपा के अघोषित यार भी।ऐसे में उनसे कौन लोहा लेगा ?।सुश्री उमा भारती ?शिवराज सिंह चौहान या और कोई दिग्गज ? शायद कोई नहीं।
मेरा अपना अनुभव कहता है कि भाजपा पूरा कस-बल लगाकर भी भोपाल को खरसिया नहीं बना सकती।आपको याद होगा कि खरसिया विधानसभा उपचुनाव दिग्गी के गुरू अर्जुन सिह के लिए वाटरलू साबित हुआ था।मै राजा दिग्विजय सिंह को औरों से कम जानता हूं लेकिन मुझे पता है कि दिग्गी जितने उदार हैं उतने ही क्रूर भी।वे यदि अपने पर आ गये तो उनसे बचना आसान नहीं।
दिग्गी को भोपाल से चुनाव लड़ाने के पीछे भले ही साजिश हो या कोई योजना किंतु इतना तो तय है कि वे कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए सियासी बीजगणित का एक अनुत्तरित सवाल जरूर हैं।वे जीते तो भी सुर्खी में रहेंगे और हारे तो भी सुर्खियां उन्ही को मिलेंगी।कहते हैं कि भाजपा पर दिग्गी राजा के एक नहीं अनेक घोषित-अघोषित अहसान हैं इसलिए भाजपा भी उन्हे उनके राजनीतिक जीवन का अंतिम चक्रव्यूह तोड़ने में मदद करेगी
दिग्गी की हार-जीत से राजनीति में कोई भूचाल तो नहीं आएगा ,हां प्रदेश में कांग्रेस की दशा और दिशा जरूर बदल जाएगी।दिग्गी राजा 40 साल से राजनीति में प्रासंगिक बने हैं।वे कभी किचन केबिनेट में होते हें तो कभी हासिए पर किंतु परिदृष्य से ओझल कभी नहीं होते।पार्टी नेतृत्व की नयी पीढी दिग्विजय के बिना भले ही आगे बढ रही है लेकिन दिग्गी जिस लोहे के बने हैं उसमें जंग नहीं लगती।
@-राकेश अचल