लालजी के लिए स्यापा अब व्यर्थ …….????

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लालजी के लिए स्यापा अब व्यर्थ
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नयी लोकसभा में भाजपा के संस्थापक लालकृष्ण आडवाणी आपको नजर नहीं आएंगे ,क्योंकि अब उन्हीं की पार्टी ने उन्हें लोकसभा के लिए चुनाव न लड़ाने का फीअसला किया है. ये आडवाणी जी के सक्रिय राजनीतिक जीवन का समापन काल है .आडवाणी जी को प्रत्याशी न बनाये जाने को लेकर भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना शुरू हो गयी है ,किन्तु इसमें कोई दम नहीं है .
लाल जी इस समय 92 साल के हैं ,दूसरे देशों में उनकी उम्र का शायद ही कोई सांसद हो ?आडवाणी जी का संसदीय जीवन बहुत लंबा है ,साथ ही रोचक भी .करांची [पाकिस्तान]में जन्में लालजी वर्ष 1951 में जनसंघ की स्थापना से लेकर सन 1957 तक पार्टी के सचिव रहे। वर्ष 1973 से 1977 तक आडवाणी ने भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष का दायित्व संभाला। वर्ष 1980 में दोहरी सदस्य्ता के मुद्दे पर जब जनतादल का विघटन हुआ और भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई तब से 1986 तक लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के महासचिव रहे। इसके बाद 1986 से 1991 तक पार्टी के अध्यक्ष रहे ।
राजनीति में सक्रिय आज की पीढ़ी को शायद पता नहीं होगा की वे लालकृष्ण आडवाणी ही थे जिन्होंने भाजपा को रामरथी बनाकर शून्य से शिखर तक पहुंचाया .वर्ष 1990 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली। हालांकि आडवाणी को बीच में ही गिरफ़्तार कर लिया गया पर इस यात्रा के बाद आडवाणी का राजनीतिक कद और बड़ा हो गया।[1] 1990 की रथयात्रा ने लालकृष्ण आडवाणी की लोकप्रियता को चरम पर पहुँचा दिया था। वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जिन लोगों को अभियुक्त बनाया गया है उनमें आडवाणी का नाम भी शामिल है।

लालकृष्ण आडवाणी तीन बार भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद पर रह चुके हैं। आडवाणी चार बार राज्यसभा के और सात बार लोकसभा के सदस्य रहे। वर्तमान में भी वो गुजरात के गांधीनगर संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के सांसद हैं। वर्ष 1977 से 1979 तक पहली बार केंद्रीय सरकार में कैबिनेट मंत्री की हैसियत से लालकृष्ण आडवाणी ने दायित्व संभाला। आडवाणी इस दौरान सूचना प्रसारण मंत्री रहे।आडवाणी ने अभी तक के राजनीतिक जीवन में सत्ता का जो सर्वोच्च पद संभाला है वह है एनडीए शासनकाल के दौरान उपप्रधानमंत्री का था । लालकृष्ण आडवाणी वर्ष 1999 में एनडीए की सरकार बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेत़ृत्व में केंद्रीय गृहमंत्री बने और फिर इसी सरकार में उन्हें 29 जून 2002 को उपप्रधानमंत्री पद का दायित्व भी सौंपा गया।लेकिन उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना अंतत:अधूरा ही रहा ,२०१४ में जब उनके पास अंतिम अवसर था तब ान मौके पर उनके स्थान पर नरेंद्र मोदी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चला और बाद में मोदी ही प्रधानमंत्री बने
लालजी ने 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ा और जीता भी लेकिन वे राजनीति से सन्यास लेने की घोषणा करने से वे लगातार कतराते रहे और मौजूदा नेतृत्व उन्हें लगातार पार्श्व में धकेलता गया .बीते पांच साल में भी उन्हें समझ नहीं आया की उन्हें वानप्रस्थ में छल्ले जाना चाहिए और इसका नतीजा ये है की अब औपचारिक रूप से उन्हें लोकसभा के लिए टिकिट न देने का फैसला पार्टी ने कर दिया और मै समझता हूँ की ठीक ही किया .क्योंकि किसी भी नेता को अंतिम सांस तक महत्वाकांक्षाओं में लिपटे रहने का विशेषाधिकार नहीं है .जो लोग स्वेच्छा से राजनीति से बाहर गए उन्हें खूब सम्मान मिला
जय प्रकाश नारायण के बाद वो दूसरे जननायक बने लेकिन उन्होंने हिन्दू आंदोलन का नेतृत्व किया और पहली बार बीजेपी की सरकार बनावाई। पिछले कुछ समय से वे अपनी मौलिकता लगातार खोते हुए नज़र आ रहे थे । जिस आक्रामकता के लिए वो जाने जाते थे, उस छवि के ठीक विपरीत वो समझौतावादी नज़रआने लगे थे । हिन्दुओं में नई चेतना का सूत्रपात करने वाले आडवाणी में लोग नब्बे के दशक का आडवाणी ढूंढ रहे थे । आडवाणी जी को सुर्ख़ियों में रहना खूब आता था,वे लिखकर,बोलकर और यहां तक की मौन रहकर भी सुर्खियां बटोरते रहे किन्तु नरेंद्र मोदी के उद्भव ने उनकी राजनितिक आभा पर विराम लगा दिया .
राजनितिक दलों को भाजपा की ही तरह ये सोचना चाहिए की राजनीति में अंतत:सेवानिवृत्ति की वी सीमा क्या हो ?राजनीति में ज्यादा से ज्यादा 70 साल सक्रिय रहना ठीक है उसके बाद नयी पीढ़ी को अवसर मिलना चाहिए.राजनीति के अलावा जितने भी क्षेत्र हैं उनमें कलाओं को छोड़ सभी में निवृत्ति की वी सीमा है लेकिन राजनीति मरते दम तक न छोड़ने की चीज बनी हुई है .राजनीति सेवा के नाम पर की जाती है किन्तु होता इसका उलटा है .लालजी शतायु हों ऐसी कामना करते हुए सक्रिय राजनीति से उनकी विदाई का स्वागत किया जाना चाहिए .वे अब मार्गदर्शक की भूमिका में ही फब सकते हैं वो भी तब जब महात्वाकांक्षाओं को तिरोहित कर दें और राजनीति में दखल देना बंद कर दें .

@ राकेश अचल

(लेखक बरिष्ठ ख्यातिनाम पत्रकार है)