असल मुख्यमंत्री का सवाल …..? – राकेश अचल

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असल मुख्यमंत्री का सवाल
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मध्यप्रदेश में आखिर कितने मुख्यमंत्री हैं ये यक्ष प्रश्न बार-बार उठने लगा है और इसकी वजह भी है .हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रदेश के दो मंत्रियों द्वारा विधानसभा में दिए गए जबाब के बाद जिस तरह से अपनी नाराजगी जताई उससे एक बार फिर पूछा जाने लगा है की आखिर सूबे में कितने मुख्यमंत्री है?
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ही ये स्थितियां बनाईं है की लोग सवाल करने लगे हैं. कमलनाथ जी कारपोरेट सांस्कृति के मुख्यमंत्री हैं,वे दिग्विजय सिंह या शिवराज सिंह की तरह काम करने के आदी नहीं हैं और न ही उनके संस्कारों में वो सब शामिल है जो पुराने मुख्यमंत्रियों में रही है .शिवराज सिंह और दिग्विजय सिंह अथक पदयात्री है. शिवराज तो एक जमाने में पांव-पांव वाले भैया के नाम से ही जाने जाते थे और दिग्विजय सिंह ने हाल ही में साढ़े तीन हजार किमी की नर्मदा परिक्रमा क्र नयी पीढ़ी के सामने एक आदर्श प्रस्तुत किया है .
एक हकीकत ये है की इस समय दिग्विजय सिंह परोक्ष रूप से बहुत ज्यादा व्यस्त नहीं हैं इसलिए उनके पास सरकार की निगरानी के लिए पर्याप्त समय है और ये उनका हक भी बनता है ,वे अपने इसी हक का इस्तेमाल भी कर रहे हैं. कायदे से गलती करने वाले मंत्रियों को मुख्यमंत्री कमलनाथ को नाथना चाहिए था लेकिन वे चूक गए .कमलनाथ का काम दिग्विजय सिंह को करना पड़ा,वे यदि ऐसा न करते तो पूरी सरकार विपक्ष के निशाने पर होती .
प्रदेश के गृह मंत्री बाला बच्चन ने मंदसौर गोलीकांड पर प्रशासन द्वारा दिया गया जबाब पढ़कर गलती की ,इस गलती से बचा जा सकता था,ऐसी ही गलती नर्मदा वृक्षारोपण घोटाले के बारे में वन मंत्री उमंग सिंघार से भी हुई .कांग्रेस ने इन दोनों ही मुद्दों पर पूर्ववर्ती शिवराज सरकार को कटघरे में खड़ा किया था ,ऐसे में कोई भी नयी सरकार उन्हें क्लीनचिट कैसे दे सकती है ?
एक हकीकत ये है की कमलनाथ सरकार में अनेक मंत्री नए हैं और उनके पास अनुभवों की कमी है इसलिए उनसे ऐसी गलतियां होती ही रहेंगी.गलती तो स्थानीय निकाय मंत्री जयवर्धन ने भी की लेकिन उन्हें डाट नहीं पड़ी ,उनकी गलती विपक्ष की पकड़ में भी नहीं आयी ,बहरहाल सवाल ये ही है की प्रदेश में आखिर कितने मुख्यमंत्री हैं ?सर्वविदित है की मुख्य मंत्री तो कमलनाथ ही है किन्तु पर्दे के पीछे से दिग्विजय सिंह भी मुख्यमंत्री की भूमका निभा रहे हैं .पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास दिग्विजय सिंह जैसी भूमिका निभाने के लिए न समय है और न वे इस भूमिका में आना चाहते हैं ,सिंधिया भी चूंकि कारपोरेट संस्कृति के निकट हैं इसलिए वे मुख्यमंत्री कमलनाथ की कार्यशैली को समझते हैं और अपने ढंग से अपना काम निकाल लेते हैं .
कांग्रेस की सरकार अविवादित रूप से पूरे पांच साल चले इसके लिए आवश्यक है की मुख्यमंत्री अपनी भूमिका का निवाह करें और पूर्व मुख्यमंत्री अपनी भूमिका समझें .अनावश्यक हस्तक्षेप आज नहीं तो कल विवादों को जन्म देगा ही ..लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता की मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ही दिग्विजय सिंह को अघोषित रूप से सरकार पर निगरानी रखने और समय-समय पर विपक्ष की भूमिका का निर्वाह करने के अधिकार दिए हों ताकि समय रहते सरकार की गलतियों को सुधारा जा सके.
कांग्रेस की सरकार के लिए सतर्कता अहम इसलिए भी है क्योंकि सर पर आम चुनाव हैं और यदि इस आम चुनाव में कांग्रेस ने अपेक्षित नतीजे न दिए तो हाईकमान के तेवर बदल सकते हैं .कमलनाथ के लिए आनन-फानन में कारपोरेट संस्कृति से बाहर आकर आम आदमी का मुख्यमत्री बनने में समय लगेगा ,और यही समय संक्रमणकाल है .इस संक्रमणकाल में से यदि कमलनाथ सरकार ठीक-ठाक बचकर निकल गयी तो आगे का सफर आसान हो जाएगा ,अन्यथा मुश्किलें तो आना ही हैं .
सरकारें चलाने का कांग्रेसी अंदाज भाजपा से एकदम अलग है .दिग्विजय सिंह जैसे नामों को छोड़ दिया जाए तो प्रदेश में जितने भी मुख्यमंत्री कांग्रेस के बने हैं वे आभिजात्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं जबकि भाजपा के जितने भी मुख्यमंत्री बने हैं वे सामन्य वर्गों से आते रहे हैं ,इसलिए कांग्रेस और भाजपा की सरकारों के कामकाज की तुलना करना बेमानी है .कांग्रेस की सरकार अपनी संस्कृति के अनुरूप काम करेगी ,लेकिन्लोक्प्रिय सरकार बनने के लिए मुख्यमंत्री को कवायद तो करना पड़ेगी,नए मंत्रियों का कार्यसंस्कृति समझने के साथ कार्यकर्ताओं और आमजनों से व्यवहार करना सिखाना होगा .
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@ राकेश अचल