दोस्ती की निशानी है , दतिया का यह महल….!!!

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दोस्ती की निशानी है , दतिया का यह महल।
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मध्य काल में सलीम और वीरसिंह बुन्देला जैसी दोस्ती की दूसरी मिशाल देखने को नही मिलती है। और दतिया का वीरसिंह जू देव महल उसी दोस्ती की अमर निशानी है। यह महल मध्य काल में बुन्देलखण्ड में निर्मित इमारतों में स्थापत्य कला की दृष्टि से से सर्व श्रेष्ठ इमारत है।
इस इमारत से मेरी पहिचान और लगाव 25 वर्ष से भी ज्यादा समय से है। सन अस्सी के दशक में आठवी कक्षा में दतिया में जब एडमीशन हुआ तब पहली बार इस इमारत को देखा था।
गगन चुम्बी यह इमारत ऊँची पहाड़ी पर सीना ताने दतिया नगर की निगेहबानी करती सी नज़र आई थी। उन दिनों हम ठंडी सड़क दतिया में स्थित गुलाब बाग मे बिजली घर परिसर में रहते थे जहाँ से इस महल को देखना रोज रोज की बात थी।
इस महल को देख कर ऐसा लगता जैसे यह इमारत हमे बुला रही हो। तब हम न इसका नाम जानते थे और न इसका इतिहास।
इस महल में एक मंज़िल से दूसरी मंजिल पर आने जाने के इतने रास्ते थे कि अक्सर भूल जाया करते थे इस कारण इसे स्थानीय लोग भूल भुलैया कहा करते है। लेकिन इस महल के प्रति मेरा आकर्षण तब भी उतना ही था जितना आज है।
ओरछा के राजा मधुकर शाह के बाद ओरछा का राज्य मुगलों की सहायता से राम शाह को प्राप्त हुआ। मधुकर शाह के दूसरे पुत्र वीरसिंह बड़ोनी की जागीर पर आ गये।
महत्वाकांक्षी वीरसिंह इससे संतुष्ट नही थे। उन्होंने आस पास के मुगल इलाको पर हमला करना शुरू किया इस नृत्य से बे मुगल सम्राट अकबर के कोप भाजन बन गए।
इसी समय अकबर से असंतुष्ट सलीम इलाहाबाद में ठहरा हुआ था । अपनी भावी महत्वाकांक्षाओं के पूर्ति के लिए सलीम से मिलेने हेतु इलाहाबाद गया। सलीम ने उसका स्वागत किया और दोनो में मित्रता हो गई।
अपनी मित्रता को निभाने के लिए उसने दक्षिण से लौट रहे मुगल सेनापति अबुल फजल पर घात लगा कर आंतरी में हमला कर उसकी हत्या कर दी तथा उसका सर काट कर सलीम के पास भेज दिया।
अबुल फज़ल का कटा सर देख कर सलीम बहुत खुस हुआ , पर इस घटना से अकबर बहुत नाराज़ हो गया । उसने वीरसिंह के दमन के लिए सेनायें भेजी। पर कुछ दिन बाद ही अकबर की मृत्यु हो गई और सलीम जहँगीर के नाम से मुगल सम्राट बना। जिससे वीरसिंह की उन्नति के द्वार खुल गए।
कहते है कि दतिया के पश्चिम में पहाड़ी पर जहाँ सलीम से वीरसिंह बुन्देला की भेंट हुई थी । वीरसिंह ने उसी स्थान पर इस महल की नींव बाद में रखी

*रूपेश उपाध्याय*

(लेखक शाशन में वरिष्ठ प्रशाशनिक अधिकारी होकर ेेतीहसिक धरोहरो के संरक्षण हेतु सदैव क्रियाशील है)