ढांढस बंधाते चुनावी सर्वे – @राकेश अचल

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ढांढस बंधाते चुनावी सर्वे
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राजनीति में एक युवती प्रियंका के आने के साथ ही चुनावी सर्वे भी आ गए ,इन चुनावी सर्वे से अचानक बदहवास हुए राजनीतिक दलों को ढांढस मिलता है.ये चुनावी सर्वे कितने सटीक होते हैं ये फिलहाल चर्चा का विषय नहीं है .चर्चा का विषय ये है की चुनावी सर्वे 2019 में एक बार फिर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनवा रहे हैं .
हाल के दशकों में चुनावी सर्वे का विज्ञान तेजी से विकसित हुआ है.ये विज्ञान सियासत की दशा और दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाने की कोशिश भी करता है और इसके लिए बाकायदा सर्वे करने वाली कंपनियों को पारश्रमिक भी मिलता है.चुनावी सर्वे कराना कोई राष्ट्रभक्ति का काम नहीं है ,इससे पूँजी और पेट दोनों जुड़े हैं
हाल में आये सी वोटर के सर्वे कहते हैं की होने वाले लोकसभा चुनाव में यूपीए को स्पष्ट बहुमत मिले ना मिले लेकिन 237 सीटें तो मिल ही जाएंगी लेकिन युवाओं के हाथों वाली कांग्रेस के नेतृत्व वाला एनडीए 167 सीटों पर सिमित जाएगा लेकिन 143 सीटें अन्य के हाथ में होंगी .सर्वेयर मानते हैं की लोकसभा चुनाव में यूपीए को 33 सीटों का घाटा होगा .सर्वे मानता है की भाजपा को सबसे ज्यादा 48 सीटों का नुक्सान तो अकेले उत्तर प्रदेश में होगा .
सर्वे के अपने आधार होते हैं और मै उन्हें निराधार कहने का साहस नहीं रखता लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ की जब भाजपा सत्तारूढ़ होते हुए अकेले यूपी में 48 सीटें गँवायेगी तो सत्ताच्युत होने के बाद मप्र,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसके हाथ से 16 नहीं कम से कम 26 सीटें निकल सकतीं हैं .सर्वे ये मानने को राजी नहीं है की यदि यूपी में सपा-बसपा गठबंधन 80 में से 51 सीटें जीत सकता है तो दीगर राज्यों में ऐसे ही भाजपा विरोधी छोटे गठबंधन बढ़त हासिल क्यों नहीं कर सकते.मसलन बिहार का महागठबंधन .
हाल ही में भाजपा ने जिन तीन राज्यों में सत्ता गंवाई है वहां से 2014 में भाजपा को 65 सीटें मिली थीं ,सर्वे कहता है की अब भी भाजपा को 46 सीटें मिल जाएँगी ,लेकिन कैसे ,ये सर्वेयर नहीं जानते .मेरा मन्ना है की इन तीन राज्यों में भी भाजपा यदि 30 सीटें भी हासिल कर ले तो बड़ी बात है .दरअसल इन तीन राज्यों में भाजपा के पास अब टूटा हुआ मनोबल है और इसके सहारे 46 सीटें जीती नहीं जा सकतीं .इन राज्यों में सत्ता जाने के बाद से भाजपा कार्यकर्ता हताश है .
देश के बड़े राज्य बंगाल,महाराष्ट्र के अलावा तेलंगाना,और आंध्र में भाजपा सहयोगी दलों के सहारे खड़ी है,उसकी अपनी स्थिति इन राज्यों में निर्णायक नहीं है.सहयोगी दल यदि आँखें फेर लें तो भाजपा की मुश्किल और बढ़ सकती है .लोकसभा चुनाव के बाद जो दल किसी मोर्चे में नहीं है वे ही निर्णायक होंगे और इन दलों का रुख अंतिम चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ही स्पष्ट होता है .
बहरहाल देश के समाचार माध्यम और माउथपीस बने टीवी चैनल प्रियंका के आगमन और चुनाव सर्वे के भंवर में उलझे हुए हैं ,उनके पास बहस के लिए कोई मुद्दा नहीं है इन चैनलों पर राष्ट्रीय गालवाद्य का वादन चल रहा है .लोग इसे कितना सुन और गन रहे हैं इससे किसी को कोई मतलब नहीं है .मतलब होना भी नहीं चाहिए क्योंकि िनमने से कोई भी आम जनता का प्रतिनिधित्व तो करता नहीं है.
@ राकेश अचल