“कमलनाथ की सनाथ सरकार” – पहले ही कौर में अंतर्कलह की मक्खी…@ राकेश अचल

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कमलनाथ की सनाथ सरकार
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पंद्रह साल की लड़ाई और फिर मिली घटघटे की जीत के बाद मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ को अपनी सरकार बनाने में पूरे बढ़ दिन लग गए .कमलनाथ ने चुनाव परिणाम आने के पांच दिन बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.कांग्रेस है कमान ने ये पांच दिन कमलनाथ के नाम पर सर्वानुमति बनाने में खर्च किये क्योंकि चुनाव से पहले कोई चेहरा जनता या विधायकदल के सामने नहीं रखा गया था .कमलनाथ दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की सहमति से मुख्यमंत्री बने .
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कमलनाथ को अपना मंत्रिमंडल बनाने में भी आठ दिन का समय लगा .तीनों गुटों को साधने में लगे इस समय ने कांग्रेस में गुटबाजी के उस चेहरे को उभार दिया जो चुनाव के समय किसी तरह छिपा लिया गया था ,जैसे-तैसे कमलनाथ ने २५ दिसंबर को २८ मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई तो पार्टी के ही दिग्विजय सिंह समर्थक दो विधायक केपी सिंह और ऐदल सिंह कंषाना के समर्थक सड़कों पर आ गए.निर्दलीय और सपा विधायकों ने भी कमलनाथ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया .
शपथ ग्रहण के बाद मंत्रियों को विभागों का वितरण करने में मुख्यमंत्री कमलनाथ को पसीना आ गया ,विभागों का वितरण करने में पूरे पांच दिन लगे .भोपाल से दिल्ली तक भाग-दौड़ करना पड़ी तब कहीं जाकर बात बनी ,लेकिन अंतत:बात बन गयी .अब कमलनाथ के सामने चुनौती है की वे नए साल का आगाज पूरी मुस्तैदी से कांग्रस के वचनपत्र पर अम्ल करने के साथ करें क्योंकि उनके पास काम करने के लिए सीमित समय है .आम चुनाव सर पर हैं और जनता भी उतावली है .
कमलनाथ की पलटन में सभी तरह के लोग हैं.सक्षम भी और अक्षम भी .इसी पलटन के सहारे उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा खींची गयी लोकप्रियता की लकीर से लम्बी लकीर खींचना है .इस काम के लिए साथ दिन का समय बहुत कम है ,इसी सीमित समय में मुख्यमंत्री को खजाने की दशा सुधारना है ,वचनपत्र पर अम्ल शुरू करना है और आम चुनाव की तैयारी करना है.ये सब भी तब करना है जब कमलनाथ के पहले कौर में ही कलह की मख्खी आ चुकी है .
मुख्यमंत्री के रूप में कमलनाथ की सबसे बड़ी चुनौती अपने आपको कठपुतली बनने से रोकने की है.पूर्व मुख्यमत्री दिग्विजय पूरी ताकत से सक्रिय यहीं और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी पहली बार अपना रुख राज्य की राजनीति को लेकर मुखर बनाया है ऐसे में कमलनाथ के लिए मनमाने ढंग से काम करना आसान नहीं है.सरकार चलने के लिए कमलनाथ को प्रधानमंत्री के जुमले-‘सबका साथ,सबका विकास’अमल में लाना होगा ,अन्यथा वे कभी भी गच्चा खा सकते हैं
कमलनाथ के लिए संतोष की बात है की उन्हें फिलहाल विधानसभामें ‘फ्लोर टैस्ट ‘से नहीं गुजरना लेकिन बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी ?किसी भी दिन ये मौक़ा उनके सामने आ सकता है ,क्योंकि संख्या बल में विपक्ष और सत्ता पक्ष में बहुत सीमित अंतर् है ,मुझे लगता है की यदि आम चुनाव में भी कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया तो शायद कमलनाथ की राह थोड़ी आसान होजाये लेकिन फिलवक्त तो उनकी राह में कांटे ही कांटे हैं
कमलनाथ प्रदेश के पहले तो नहीं हाँ सुकुमार मुख्यमंत्री जरूर हैं,उनके पास न दिग्विजय जैसा कठोर मेहनत करने का अनुभव है और न ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा चॉकलेटी चेहरा. उम्र भी उनके आड़े आ रही है लेकिन कमलनाथ को जान्ने वाले कहते हैं की वे हर चुनौती का सामना करने में समर्थ हैं क्योंकि उनके पास इच्छाशक्ति बहुत प्रबल है ,वे समन्वय में दक्ष हैं और अहंकार से दूर हैं .उनके पास संसदीय जीवन का चार दशक का लंबा अनुभव है और वे वक्त की नब्ज पहचानते हैं .उम्मीद की जाना चाहिए की कमलनाथ बिना दलदल फैलाये प्रदेश में कांग्रेस की जमीन को और मजबूत कर पाएंगे .फिलहाल कमलनाथ के प्रति सद्भावनाओं के प्रदर्शन और उन्हें शुभकामनाएं ही दी जा सकती हैं .आप चने तो सहानुभूति का प्रदर्शन भी कर सकते हैं
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@ राकेश अचल