अजेय महाकाली शक्तिस्थल ,गड़रौली

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महाकाली शक्ति स्थल गड़रौली मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश के केंद्र बिंदु शिवपुरी में पिछोर तहसील में महाकाली का अद्भुत शक्ति स्थल मौजूद है जहाँ प्रचीन काल से तंत्र साधना की देवी विराजी है।समुद्र तल से 567 फिट की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर विशेष साधना का केंद्र रहा है।परिजात के जंगलों के बीचों बीच माँ काली के साथ भैरव जी विराजमान है यहाँ माइ अपनी चौश्ठ योगनियों के साथ साक्षात विराजमान है
जिसका अनुभव दर्शन मात्र से हो जाता है।स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पास के गांव में चलने वाली गौड़ा खदान माँ की ही देन है जो आज तक निरन्तर चालू है। नव दुर्गा के समय यहां कई साधक विशेष साधना करने आते है और माता का आशिर्वाद पाते हैं।गड़रौली स्थित काली माता मंदिर के कई चमत्कार देखने को मिलते है।जिसमें माई की ब्रह्म मुहूर्त काल की आरती नाग स्वरूप उनके सेवक करने आते हैं।
इस मंदिर मंदिर के निर्माण की कथा भी बड़ी चमत्कारिक रही है। महामाया की प्रेरणा से क्षत्रिय गौर वंश के जागीरदार प्रताप सिंह जिन्हें स्वप्न में कई बार इस शक्ति स्थल के दर्शन होते थे। उन्होंने यहां आकर भगवती के लिए मंदिर निर्माण का कार्य शुरू किया। परन्तु उनके आगे मंदिर निर्माण के लिये पत्थरों की समस्या आन पडी। इसी चिंता में एक रात्रि वे अपने शिष्यों के साथ अपनी धूनी के पास बैठकर विचार कर रहे थे। कोई रास्ता नजर न आने पर थके व निढाल बाबा सोचते-सोचते शिष्यों सहित गहरी निद्रा में सो गये तथा स्वप्न में उन्हें महाकाली के दर्शन हुए वे दिव्य मुस्कान के साथ बाबा को स्वप्न में ही अपने साथ उस स्थान पर ले गयी जहां पत्थरों का खजाना था। यह स्थान महाकाली मंदिर के निकट पारिजात(हारश्रिंगार) वृक्षोंके बीच घना वन था। इस स्वप्न को देखते ही बाबा की नींद भंग हुई उन्होंने सभी परिवार जन को जगाया स्वप्न का वर्णन कर रातों-रात पत्थरों को इकट्ठा कर उस स्थान की ओर चल पड़े जिसे बाबा ने स्वप्न में देखा था। वहां पहुंचकर रात्रि में ही खुदाई का कार्य आरम्भ किया गया थोडी ही खुदान के बाद यहां अद्धभुत पत्थरों की खान निकल आयी। कहते हैं कि पूरा मंदिर में अभी भी वही पत्थर माई के स्वरूप में विराजित है।मन्दिर निर्माण होने के बाद पत्थर की खान स्वत: ही समाप्त हो गयी। आश्चर्य की बात तो यह है इस पहाड़ पर नौ फिट से भी लम्बे शमी ,परिजात के व्रक्ष स्थित हैं।
रुद्रयामल के अनुसार जहां माँ बिजयासन में विराजमान होती है वहां पारिजात का जंगल स्वतः उतपन्न हो जाता है
स्थानीय निवासियों के अनुसार अजेय काली के नाम से पूर्व में इस मंदिर को जाना जाता था।
पीताम्बरा पीठ के संस्थापक पूज्य स्वामीजी महाराज ने भी यहां कई दिनों तक साधनारत होकर स्थान को पुनः जाग्रत किया था
पहले यहां एक शिलालेख मौजूद था ।जिसके अनुसार गोरखनाथ जी के शिष्य मछिंदरनाथ ने भी यहां साधना करके माता को प्रसन्न किया था ।पर वह किसी के द्वारा हटा दिया गया