me -too , टूटती चुप्पियों का अभियान ….. @ राकेश अचल

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हस्तक्षेप
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# me -too , टूटती चुप्पियों का अभियान
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सोशल मीडिया पर देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित महापुरुषों के कुकर्मों को अनावृत करने के ताजा ” मीटू”अभियान के कारण केंद्र के एक अकबर मंत्री की कुर्सी पर बन आई है .एक साइन अभिनेत्री द्वारा साहस दिखाकर शुरू किये गए इस अभियान के कारण हमारे पुरुष प्रधान समाज का एक विकृत चेहरा सामने आ रहा है .
किसी भी क्षेत्र में महिलाओं से हर एक नयी सीढ़ी चढ़ने के लिए उसकी कीमत मांगी जाती है. ये हमारे देश का [दु]चरित्र है. कुछ महिलायें इस मांग का प्रतिकार करतीं हैं और कुछ समर्पण .सबके साहस का अपना-अपना स्तर होता है बहुत सी ऐसी महिलायें भी हैं जिहोने अपनी -अस्मिता से समझौता किये बिना अपना मुकाम हासिल किया .
चारित्रिक पतन के गड़े हुए मुर्दे अब उन लोगों के लिए मुसीबत बन रहे हैं जो कहीं न कहीं शीर्ष पर है.नाना पाटेकर जैसे नाना पुरुष इस अभियान के घेरे में हैं.महिलाएं यदि तनु श्री दत्ता जैसा साहस दिखाएँ तो इस अभियान का घेरा और व्यापक हो सकता है पंचायत से लेकर महापंचायत स्तर तक ये सब होता आय्या लेकिन इसका प्रतिकार न होने से ये बीमारी असाध्य ही नहीं हो गयी बल्कि इसे अघोषित रूप से अंगीकार कर लिया गया .
“मी- टू” के जाल में उलझे लोगों में से कुछ के खिलाफ कार्रवाई होगी तो कुछ बच भी निकलेंगे लेकिन ये समस्या का समाधान नहीं है ,असाध्य बीमारी का इलाज होना ही चाहिए.कोई क़ानून इसे नहीं रोक सकता,ये नैतिकता और अनैतिकता के बीच झूलती एक मकड़ी जैसी समस्या है .जो जाल काटेगा वो बच जाएगा अन्यथा जाल में उलझ कर हमेशा के लिए मारा जाएगा .हर सामाजिक बुराई का इलाज क़ानून के पास होता भी नहीं है,ऐसी बुराइयों के खिलाफ समाज को ही आगे आना पड़ता है,जो समाज ऎसी बुराइयों पर पर्दा डालने की कोशिश करता है उसे भी इस अपराध की सजा कालांतर में भुगतना पड़ती है .हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा सुनाये गए कुछ फैसले भी ऐसी बीमारियों को संरक्षित कर्त दिखाई देते हैं
सवाल ये है कि दशकों पहले हुए किसी असामाजिक और अनैतिक कृत्य के लिए हमारे क़ानून कार्रवाई की इजाजत देते हैं और क्या दशकों तक मौन रहने वाले प्रतिवादियों को कानून का संरक्षण मिलना चाहिए ?ऐसे सवाल उठाने को इस अभियान की मुखालफत नहीं समझना चाहिए ,बल्कि व्यापक दृष्टि से इसकी विवेचना की जाना चाहिए .एक-दो नाना ,आलोक या अकबर के दण्डित होने से ये समस्या समाप्त होने वाली नहीं है .पूरे महिला समाज को इसके खिलाफ खड़े होकर संघर्ष करना होगा ,ये राजनीति का नहीं समाज का मुद्दा है ये भी ध्यान में रखने की जरूरत है .
कला,संस्कृति,पत्रकारिता ,सिनेमा ,धर्म,और राजनीति के अलावा शायद ही ऐसा कोई क्षेत्र होगा जहां नारी से अवसरों की कीमत न मांगी जाती हो ?और दुर्भाग्य ये है कि हर क्षेत्र में महिलायें ये कीमत अदा कर आगे बढ़ती आयीं हैं,अब इस पर पूर्ण विराम लगना चाहिए .पुरुष प्रधान समाज में ये प्रतिकार और पाबंदी आसान नहीं है ,कोई क़ानून इसे नहीं रोक पायेगा ,केवल और क्वेवल जागरूकता और प्रतिकार ही इसका इलाज कर सकता है .मै मी टू अभियान के प्रति अपना समर्थन जताते हुए कहना चाहता हूँ की प्रतिकार में समय नहीं लगना चाहिए ,जो हो तत्काल हो जिससे आरोपी को पर्याप्त सजा मिल सके .किसी अकबर का इस्तीफा या किसी नाना का जेल जाना इसका इलाज कदापि नहीं हो सकता .इसका इलाज है दुराचारियों का बहिष्कार और क़ानून के मुताबिक़ सजा .हालांकि ये दोनों ही काम दुष्कर हैं लेकिन असभव नहीं.
@ राकेश अचल