वाह सौरभ वाह……! सोलह साल की उम्र में स्वर्ण पर निशाना….!

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वाह सौरभ वाह
सोलह साल की उम्र में स्वर्ण पर निशाना
सिर्फ एक साल पहले शूटिंग शुरू करना और ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट को हरा एशियाई खेलों में चैंपियन बनना निश्चय ही कौतूहल जगाने वाला है। महज सोलह साल के जूनियर खिलाड़ी का सीनियर इंटरनेशनल में यह प्रदर्शन नई उम्मीद जगाता है। उ.प्र. में मेरठ के गांव कलीना के रहने वाले सौरभ चौधरी की कामयाबी वाकई उदीयमान खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने वाली है। इंडोनेशिया में खेले जा रहे अट्ठारहवें एशियन गेम्स दस मीटर एअर पिस्टल स्पर्धा में 240.7 अंक हासिल करने वाले सौरभ की सफलता की महक पूरे देश ने महसूस की। जिससे यह संदेश गया कि गैर परंपरागत खेलों में भारतीयों की सफलता की अपार संभावनाएं हैं। यह सफलता इसलिये भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व चैंपियन और ओलंपिक में स्वर्ण जीतने वाले जापान के तोमोयूकी मत्सूदा के मुकाबले सौरभ कुल 24 शॉट में से बाइस शॉट तक पीछे थे। आखिरी दो शॉट में न केवल उन्होंने मत्सूदा पर बढ़त ली बल्कि मुश्किल हालात में देश की झोली में स्वर्ण पदक डाल दिया।
दरअसल, हम अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में ऐसी सफलताओं से भावविभोर होकर खिलाड़ी को सिर-आंखों पर बिठा लेते हैं। उस पर इनामों की बरसात भी होने लगती है। मगर वे इस मुकाम तक कैसे पहुंचे और किन हालात से गुजरे, हमारा ध्यान उस ओर नहीं जाता। दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले सौरभ के पास सात महीने पहले तक अपनी पिस्तौल भी नहीं थी कि जमकर अभ्यास कर पाते। उनके किसान पिता जगमोहन ने कर्ज लेकर सात महीने पहले बेटे को पिस्टल दिलाई। साथ ही बेटे के लिये घर में अभ्यास के लिये एक अस्थायी रेंज भी बनाई। इसी पिस्तौल से ही सौरभ ने सोने पर निशाना साधा। निश्चित रूप से इस खेल में कड़े अभ्यास व एकाग्रता से ही लक्ष्य हासिल किये जा सकते हैं। यही वजह है कि ट्रायल में सौरभ ने जीतू राय जैसे अनुभवी खिलाड़ी को पीछे छोड़कर एशियाई खेलों के लिये अपनी जगह पक्की की और चयनकर्ताओं का निर्णय निशाने पर बैठा।
कहावत है कि होनहार बिरवान के होत चिकने पात। इससे पहले जर्मनी में हुए जूनियर वर्ल्ड कप में सौरभ ने नया विश्व रिकॉर्ड बनाया था। कुल 243.7 अंक हासिल करके उसने स्वर्ण पदक भी जीता था। इतना ही नहीं, उसका चयन यूथ ओलपिंक के लिये हो चुका है। अक्तूबर में होने वाले इन खेलों में सौरभ का चयन एशियन यूथ क्वालिफाई स्पर्धा के जरिये हुआ, जिसने उसकी एशियाई खेलों में भाग लेने की राह भी तय की। उसने चयनकर्ताओं के विश्वास को सही साबित किया। उम्मीद की जा रही है कि एकाग्रता व अभ्यास के इस खेल में सौरभ लंबी रेस का खिलाड़ी साबित होगा। इस मुकाबले में विश्व चैंपियन व ओलपिंक चैंपियनों को हराना इस बात का प्रतीक है कि उसने मजबूत इरादों से अपने लक्ष्य पर सटीक निशाना साधा है। जो उसके जज्बे, कड़ी मेहनत व दृढ़ इच्छाशक्ति का ही परिचायक है। ये मुकाम उसने तमाम दिक्कतों से पार पाते हुए हासिल किया।
दरअसल, सौरभ की यह राह इतनी भी आसान नहीं रही। उसके पिता उसके इस खेल के पक्ष में नहीं थे। उनकी आशंका थी कि कहीं इससे उसकी पढ़ाई में व्यवधान न आ जाये। पिस्टल चलाने में महारथ हासिल करने के बाद भटक न जाये। जब पिता ने इस खेल में आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दी तो उसने खाना तक छोड़ दिया। आखिरकार पांच दिन बाद पिता को बेटे की जिद के आगे झुकना पड़ा। वही जिद आज देश का गौरव बनकर सामने आई है। खेल के प्रति सौरभ का जुनून इस हद तक था कि वह घर पर लगातार तब तक अभ्यास करता रहता, जब तक कि थक कर चूर नहीं हो जाता। यहां तक कि अपने कमरे में उसने तमाम लक्ष्य निशाने के लिये लगा रखे थे। वह भी तब जब परिवार व स्कूल का पढ़ाई के लिये बराबर दबाव रहता था। आसपास अभ्यास की सुविधा न होने की वजह से वह घर से चालीस किलोमीटर दूर अभ्यास के लिये जाता, वहां भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। सबसे बड़ी बात यह है कि उसने जूनियर कैंप के लिये चयन होने के बाद नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के पदाधिकारियों से आग्रह करके सीनियरों के साथ मुकाबला करने में सफलता हासिल की।
सौरभ की जीत पर सारा देश प्रफुल्लित है। उ.प्र. के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उसे पचास लाख का इनाम देने की घोषणा की है तथा प्रदेश सरकार उसे राजपत्रित पद पर नौकरी भी देगी। सवाल यह है कि सरकारें तब क्यों ध्यान नहीं देतीं जब सौरभ जैसी प्रतिभाएं अपना मुकाम तलाशने के लिये छटपटाती रहती हैं। उन्हें अभ्यास तक के लिये सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। बेहतर हो देश-प्रदेश में ऐसी प्रतिभाओं को तलाश कर निखारा जाये तो देश को कई सौरभ मिल सकते हैं।