अंतर्कलह का द्वंद

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*अंतर्कलह की शुरुआत।
महज आजादी की वर्षगांठ मनाये देश को अभी चंद घण्टे ही हुए हो लेकिन अंतर्कलह की की सुगबुगाहट पूरे देश में महसूस की जा सकती है।आज देश में जहाँ लोग आपसी मतभेद मिटाने की बात करते हो वहीं कहीं न कहीं संविधान की अन्यत्र फैली लताएं इन्हें जकड़ ही लेती हैं।हम हिंदू, मुस्लिम,सिख,ईसाई आपस मे है भाई भाई का गीत बड़े ही मधुर आवाज में सुनना पसंद करते हो पर धरातल पर स्थिति बिल्कुल विपरीत ही है।आरक्षण जैसे मुद्दे पर सरकार मुँह में दही जमाकर बैठी है चारों ओर सवर्णों, दलितों जैसे शब्दों का बिगुल बज चुका है।सरकार अपने वोट बैंक की राजनीति को चमकाने के लिये समाज के दो धडों को आमने सामने ला रही है।एक नए विध्वंश की तैयारी का ढांचा आज नही तो कल निश्चित रूप से इस अतुल्य,सम्रद्ध,वैभवशाली देश के सामने देखने को मिलेगा।