महिलाओ की NONE STOP”फुल मस्ती” रस्म “खोइया…!” देखिये, मस्ती भरा VIDEO

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महिलाओ की “फुल मस्ती” रस्म “खोइया…!”
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(बृजेश सिंह तोमर)
सम्भव है कि अधिकांश शहरी लोग वैवाहिक आयोजनों में महिलाओ द्वारा की जाने बाली रस्म “खोइया” से परिचित न हो किन्तु कई ग्रामीण क्षेत्रो में यह मजेदार रस्म आज भी जारी है…!
दरअसल,”खोइया” ग्रामीण क्षेत्रो में विवाह समारोहो में महिलाओं की “फूल मस्ती” रस्म है जो गाँव के पुरुषों की गैर मौजूदगी में होती थी।होता ये था कि लड़के की शादी में सम्पूर्ण गाँव के पुरुष बारात में चले जाते थे ओर फिर शुरू होती थी महिलाओ की फुल मस्ती..! कुछ महिलाएं पुरुषों का,डकैतों का,पुलिस बालो का भेष बना लेती थी।सबसे पहले वहाँ छद्म शादी का आयोजन होता था जिसमे चढ़ावा,बारात अगबानी,वरमाला,फेरे,दहेज जैसी रस्मे होती थी जिसमे वर-बधू के अलावा महिलाएं ही पंडित ओर नाऊ भी बनती थी।चूंकि कार्यक्रम पूरी रात जागने का होता था इसलिए फिर शुरू होता था हुल्लड़…!
नाचने,गाने के साथ साथ गाँव से निकलने बाले लोगो को महिलाओ की यह टोली “मूसल”(लकड़ी का बना विशेष अस्त्र जो वैसे तो दाल,मसाले कूटने के काम आता था किंतु खोइया में वह बंदूक का काम करता था)अड़ाकर लूट लेती थी।हालांकि इस लूट में लूटने बाले पुरुष भी न केबल हँसते-हँसते लूटते थे बल्कि महिला गैंग को पैसा भी देकर जाते थे।महिलाओ की मस्ती गैंग के पुलिस वर्दी बाले सदस्य नकली पिस्तौल अड़ाकर भी अड़ी डाल लेते थे।और तो ओर यदि गाँव मे यदि किसी के घर कोई मेहमान रुका हो तो फिर उसकी तो खैर ही नही।हुड़दंगी महिलाओ की यह टोली डकैत गैंग या पुलिस के रूप में अचानक से उस पर भी धावा बोलकर अपने इशारों पर नचा लेती थी।

महिलाओ का यह हुल्लड़ सारी रात चलता था और आस पास गाँव के पुरुष वहाँ से गुजरने के लिए अपने रास्ते बदल लेते है। इस दौरान हुड़दंगी महिलाओ की इस टोली की “डायलॉग डिलेवरी” भी जबरदस्त होती थी जो डराती भी थी और हँसाती भी थी।महत्वपूर्ण यह भी था कि खोइया की इस रस्म का लोग बुरा भी नही मानते थे और खुलकर आनंद लेते थे। ओर तो ओर गांव में भी इस रस्म के “शक्तिशाली किरदार” की अलग ही बकत होती थी ओर रिश्तेदारियों में से भी “विशेषज्ञ” को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता था।

 

“खोइया” की इस रस्म के पीछे महिलाओ का मानना है कि यह राजा राम-सीता के विवाह के समय से शुरू हुई।
इस रस्म से भली भांति परिचित कुछ महिलाओ का मानना है कि यह रस्म इसलिए करते है कि विवाह समारोह में बारात जाने के बाद ऊपरी चक्कर,अलाये-बलाये,भूत-प्रेत जैसी बाधाये यही उलझ कर रह जाये और वहाँ विवाह निर्विघ्न सम्पन्न हो जाये। कुछ लोगो का यह भी तर्क है कि पुरुषों के बारात में चले जाने से गाँव खाली हो जाता था जिसके चलते चोर,डकैतों से सुरक्षा की दृष्टि से गाँव की सारी महिलाएं एक जुट होकर लाठी डंडों से लैस बैठती थी और रात भर जगार के लिए मस्ती करती थी।
बहरहाल,आधुकनिकता ,औपचारिकता ओर दिखावे भरे वैवाहिक आयोजनों में भले यह मस्ती भरी महिलाओ की रस्म लुप्तप्राय हो गयी हो किन्तु कई क्षेत्रों में यह आज भी महिलाओ की फुल मस्ती की प्रमुख रस्म है….!