“संघी भाई प्रणब दा से सीखें ……” @ विशेष आलेख – राकेश अचल

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संघी भाई प्रणब दा से सीखें
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का कार्यकर्ता चाहे छोटा हो या बड़ा उसे पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी से सीख लेना चाहिए,क्योंकि जो सीख उन्होंने आज संघ मुख्यालय में दी है वो सीख संघ के कार्यवाह भी अपने स्वयंसेवकों को नहीं दे सकते .मुखर्जी का संघ के न्यौते पर संघ मुख्यालय जाना और वहां बोलना संकीर्ण सियासत करने वालों के मुंह पर एक तमाचा है .
संघ संस्कार देता है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती लेकिन संघ कैसे संस्कार देता है इसका प्रमाण हमारे माननीय प्रधानमंत्री शिर नरेंद्र दामोदर मोदी हैं. प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद मोदी जी महात्मा गांधी की समाधि को छोड़ किसी भी पूर्व राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करने नहीं गए ,शायद यही संघ की दीक्षा हो की नफरत करो तो पूरे मन से करो और सियासत में जिसे एक बार अछूत कह दो उसे जीवन पर्यन्त अछूत ही कहते रहो भले ऐसा करने पर दुनिया हंसती रहे .
पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रवाद के नाम पर देश में अपनी मान्यताएं थोपने का प्रयास करने वाले संघ के स्वयं सेवकों और सत्तारूढ़ भाजपा के शीर्ष नेताओं को साफ़-साफ़ समझा दिया की असल राष्ट्रवाद क्या होता है और कैसा होता है .मुखर्जी ने बिना संकोच देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नाम का जिक्र किया जिन्हें पूरा संघ और भाजपा खलनायक और अछूत मानता है .
मुखर्जी का भाषण सुनते हुए संघी भाई बड़े असहज दिखाई दे रहे थे, उन्हें उम्मीद्द थी की पूर्व राष्ट्रपति शायद दुसरे नेताओं की तरह मुँहदेखी बात करें लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं क्या,जो कहा खरा-खरा कहा और बेफिक्री से कहा ,वे अगर ऐसा न करते तो उनकी बनी-बनाई छवि धूमिल हो जाती .मुखर्जी इस देश के उन राजनेताओं और राष्ट्र पुरुषों में से एक हैं जो देश के नव निर्माण के पहले से लेकर आज तक के दौर के साक्षी रहे हैं,बल्कि आप कह सकते हैं की देश को बनाने में उनकी भी सक्रिय भूमिका रही है .
दुर्भाग्य कहिये या सौभाग्य की भाजपा के और संघ के पास महारथी तो अनेक हैं लेकिन मुखर्जी जैसा निडर एक भी नहीं है. भाजपा में मुखर्जी की उम्र के नेता वैराग्य में धकेल दिए गए हैं,उनमें भाजपा नेतृत्व को हटकने का साहस है ही नहीं,और जिनमें था उन्हें धकिया दिया गया .कांग्रेस में ऐसे अनेक नेता हैं जो आज भी सच को सच कहने का माद्दा रखते हैं ,भले ही उन्हें इसका चाहे जो खामियाजा भुगतना पड़े या मुख्यधारा से हटना पड़े .
हम उम्मीद कर सकते हैं की पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के समभाषण के बाद संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को राष्ट्रवाद,और सहिष्णुता का सही अर्थ समझ आ जाएगा .यदि नहीं आएगा तो उनका अपना दुर्भाग्य होगा .म मुखर्जी की विद्व्ता के कायल आरम्भ से रहे हैं .बीते पांच दशक से उनके सार्वजनिक जीवन में ऐसे अनेक अवसर आये जब लगा की वे अब बदले और तब बदले लेकिन वे कभी नहीं बदले,जो कल थे वो ही आज भी हैं.ईश्वर उन्हें लम्बे समय तक देशसेवा का अवसर मुहैया कराये .
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@ राकेश अचल