उपचुनाव के नतीजे और जन -गण-मन …..- आलेख – राकेश अचल

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उपचुनाव के नतीजे और जन -गण-मन
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देश के दस राज्यों में लोकसभा और विधानसभा की अनेक सीटों के लिए हुए उप चुनाव के नतीजे देश के सामने हैं किन्तु मै इन नतीजों को लेकर भाजपा को गरियाने और दूसरे दलों की जय-जय करने वाला नहीं हूँ .ये उप चुनाव केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए ”अलार्म” की तरह हैं .भाजपा को जितनी सीटें जीतना चाहिए थीं उतनी उसे नहीं मिलीं लेकिन इसका अर्थ ये बिलकुल नहीं है की भाजपा एकदम कमजोर हो गयी है या भाजपा के कर्णधार प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और पार्टी प्रमुख श्री अमित शाह का जादू समाप्त हो गया है .
लोकसभा की चार सीटों के लिए जिन राज्यों में उपचुनाव हुए उनमें से सभी जगह भाजपा सत्ता में है.उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की महाबली सरकार है लेकिन भाजपा कैराना की सीट हार गयी .महाराष्ट्र में भाजपा की ही सरकार है लेकिन उसे महाराष्ट्र में भी असफलता का सामना करना पड़ा .नगालैंड अपवाद रहा जहां भाजपा की सहयोगी एनडीपी-पीडीए के उम्मीदवार ने अपेक्षित परिणाम दिए .अब इन परिणामों को आप सत्ता-प्रतिष्ठान विरोधी जनादेश कहें या कुछ और ये आपकी मर्जी है ,क्योंकि जो हकीकत है सो है .
हैरानी के परिणाम राज्यों से आये हैं यूपी में सपा ने ,बिहार में राजद ने भाजपा को पराजित किया.केवल उत्तरराखंड में सत्तारूढ़ भाजपा के प्रत्याशी के हिस्से में जीत आयी,अन्यथा जो जहा सत्तारूढ़ था वो वहां जीता केरल में माकपा,पंजाब में कांग्रेस,पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ,मेघालय और कर्नाटक में कांग्रेस की जीत रेखांकित करने लायक है .इन नतीजों से जाहिर है की केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए चुनौती नहीं बन पायी है,उलटे राज्यों में क्षेत्रीय दल भाजपा को आँखें दिखाते नजर आ रहे हैं ,
कटुता की राजनीति के दौर में महाराष्ट्र की पलूस-कडेगाव विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के विश्‍वजीत कदम ने निर्विरोध जीत एक सुखद अहसास है . यह सीट विश्‍वजीत के पिता और वरिष्‍ठ कांग्रेस नेता पतंगराव कदम के निधन से खाली हुई थी. यहां पर पहले बीजेपी ने कांग्रेस प्रत्याशी विश्वजीत कदम के खिलाफ संग्राम सिंह देशमुख को उतारा था, लेकिन आखिरी वक्त उन्होंने नामांकन वापस ले लिया.भाजपा ने ऐसा ही औदार्य 1998 में ग्वालियर लोकसभा सीट के लिए हुए एक चुनाव में माधवराव सिंधिया के लिए अपना प्रत्याशी हटा कर पेश किया था
इन उपचुनावों को 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले एक बड़े संदेश के तौर पर देखा जा रहा था. क्योंकि काफी सीटों पर बीजेपी के खिलाफ विपक्ष एकजुट था.मुमकिन है की इसमें डैम भी हो लेकिन मेरा मानना है की भाजपा अपनी नींव की खसकती ईंटों को सम्हालने के लिए नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करेगी और विपक्ष की कथित एकता की चुनौती का डटकर सामना करेगी .भाजपा उपचुनाव के नतीजों से आतंकित या भयभीत हो गयी हो ऐसा मानने वाले मेरे ख्याल से गलती पर हैं. भाजपा में सत्ता को बचाये रखने के वे तमाम तत्व मौजूद हैं जो किसी समय कांग्रेस की विशेषता माने जाते थे,वैसे भी आज भाजपा कांग्रेस की ”बी’ टीम की तरह ही व्यवहार कर रही है .
लोकसभा और विधानसभा के इन उपचुनावों के नतीजों को लेकर भाजपा की और से जो प्रतिक्रिया आना थी वो ही आयी है ,भाजपा के सभी नेता सुरक्षात्मक खेलते नजर आ रहे हैंउनकी आक्रामकता फिलहाल अवकाश पार गयी लगती है .
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@ राकेश अचल