कामयाबी ने खोले पहचान के रास्ते ! बनारस की बिटिया पूनम यादव की कहानी उसी की जुबानी

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कामयाबी ने खोले पहचान के रास्ते
बनारस की बिटिया पूनम यादव की कहानी उसी की जुबानी
श्रीप्रकाश शुक्ला
कहते हैं सफलता हासिल करने के लिए जुनून और दृढ़-इच्छाशक्ति के साथ परिजनों खासकर माता-पिता का सहयोग बहुत जरूरी होता है। बनारस की भारोत्तोलक पूनम यादव को ही लें, इस बेटी को गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों की स्वर्णिम सफलता से पहले काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। तकनीकी रूप से कमजोर इस शक्तिशाली बेटी का आखिर पावर काम आया और वह बनारस ही नहीं सारे मुल्क की लाड़ली बन गई। पूनम यादव कहती हैं कि जैसे-जैसे खेल में मुझे सफलता हासिल हुई, वैसे ही वैसे मुझे पहचान मिली और परिवार के हालात भी सुधरते चले गए।
मैंने सबसे पहले अपने पिता के सभी कर्ज उतारे। इसके बाद जब नौकरी मिल गई, तो घर के बाकी बचे काम भी पूरे किए। आज परिवार जिस स्थिति में है, उसके पीछे खेल ही है। अब मेरे पापा की यही ख्वाहिश है कि वह बनारस में एक जिम खोलें और गरीब बच्चों को वहां ट्रेनिंग मिले। उनका सपना है कि एशियन गेम्स और ओलम्पिक में मुझे कामयाबी मिले। जब मैंने गोल्ड कोस्ट में गोल्ड मेडल जीता, तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई। जब मैं इस जीत के बाद बनारस पहुंची, तो तमाम लोग एयरपोर्ट पर आए थे। बहुत से लोगों के हाथ में तिरंगा था। लोग ढोल बजा रहे थे। यह सब देखकर बहुत खुशी होती है। लगता है कि हम सभी ने बचपन में जो संघर्ष किए और पापा ने जो मेहनत की, उसका अच्छा नतीजा मिला है।
अभी भी सब कुछ बिल्कुल ताजा लगता है। मैंने उस दिन को भी सामान्य तरीके से ही लिया। किसी भी तरह के तनाव में आने की बजाय मैंने अपनी तैयारी पर जोर दिया। मुझे लग रहा था कि जितनी तैयारी मैंने की है, उसके हिसाब से अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश करूंगी। फाइनल में फिजी और इंग्लैंड के वेटलिफ्टर्स से मेरी टक्कर थी। मेरे दिमाग में बस एक ही बात थी कि जिसने ज्यादा मेहनत की होगी, उसे ही गोल्ड मेडल मिलेगा। मैंने अपनी तैयारी ढंग से की थी। कोच साहब भी कह रहे थे कि तुम्हारा गोल्ड मेडल लगेगा। जब मैं पहली बार में पूरा वेट नहीं उठा पाई थी, तो मैंने पापा के गुरूजी को याद किया। मेरे मुंह से ओम्-ओम् निकला। फिर जब तक मैंने सही तरीके से वेट उठा नहीं लिया, मैं मन ही मन ओम्-ओम् बोल रही थी। मैं कह सकती हूं कि गोल्ड कोस्ट मेरे लिए लकी रहा है। यहीं पर कॉमनवेल्थ चैम्पियनशिप में मैंने सिल्वर मेडल भी जीता था।
2014 से लेकर अब तक इंडिया कैंप में जो मेहनत की थी, उसका फल मिला। गोल्ड कोस्ट में जब मुझे गोल्ड मेडल मिला और भारतीय तिरंगा ऊपर जा रहा था और हमारा राष्ट्रीयगान जन-गण-मन अधिनायक बजा, तो मुझे अपने भारतीय होने पर बहुत गर्व महसूस हुआ। तमाम देशों के झंडों के बीच अपना तिरंगा ऊपर जा रहा हो, इससे अच्छा भला और क्या हो सकता है। सच कहूं तो वह मेरे लिए बहुत बड़ा दिन था। जब गले में गोल्ड मेडल पहनाया गया, तो बचपन के सभी संघर्ष याद आ गए।

मेडल जीतने के बाद मेरे पास वहां मीडिया के लोग भी आए। उन्होंने मुझसे मेरी कामयाबी पर काफी सारी बातें कीं। सबसे पहले तो मैंने अपने घर को फोन किया। घर वालों से बात की। सभी की खुशी का ठिकाना नहीं था। मुझे वह वक्त भी याद है, जब मेरे घर वालों के पास इतने भी पैसे नहीं होते थे कि मेरी कामयाबी पर वे आस-पड़ोस में मिठाई बांट सकें। लेकिन पिछले कुछ समय में वक्त बदला है। इस बदलाव के पीछे पूरे परिवार का संघर्ष है। यह कामयाबी अकेली मेरी नहीं बल्कि पूरे परिवार की है क्योंकि सब ने इसके लिए पसीना बहाया है। मेरी बहन शशि ने बहुत मेहनत की है। पापा का संघर्ष तो सबसे आगे है। इस मेडल ने मेरे अंदर यह हौसला भरा कि पैसे से सब कुछ नहीं होता है। असली सवाल मेहनत और लगन का है।
आज मेरी मेहनत और लगन का नतीजा ही है कि 2011 से लेकर अब तक मेरे प्रति लोगों का नजरिया बदला है। पूरी जिन्दगी ही बदल गई है। मैं जिस तरह के छोटे से गांव से निकली, वहां से कम ही लोग अपनी बेटियों को खेलों में भेजते हैं। मैं अब सबसे यही कहती हूं कि बच्चों को पूरा मौका देना चाहिए। उनमें अच्छा करने की चाहत होनी चाहिए। लगन और जुनून होना चाहिए। पैसे की जरूरत पड़ती है, लेकिन पैसे के साथ-साथ इन सारी बातों का भी होना बहुत जरूरी है क्योंकि बहुत सारे लोग हमारे आस-पास ऐसे हैं, जिनके पास पैसे तो बहुत हैं लेकिन वे अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर पाते हैं।
इन दिनों मैं पटियाला में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्स्प में हूं। यहां सुबह-शाम प्रैक्टिस चल रही है। दरअसल अभी मेरे कंधे और घुटने ठीक नहीं हैं। दोनों में अभी दर्द है। इसीलिए मैं फिलहाल सिर्फ अपनी फिटनेस पर मेहनत कर रही हूं। हमारे खेल में शरीर पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। एक बार शरीर फिट हो जाए, फिर तय होगा कि आगे मुझे क्या करना है। कॉमनवेल्थ खेलों के बाद एशियाई खेल और ओलम्पिक में खेलना सभी का सपना होता है लेकिन फिलहाल जब तक मेरा शरीर फिट नहीं हो जाता, कुछ भी कहना मुश्किल है। मैं मेहनत कर रही हूं, पसीना बहा रही हूं, एक बार फिर अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश कर रही हूं। मेरा काम है मेहनत करना। आगे जो भगवान की मर्जी।