भाप्रसे के अधिकारी की मध्यप्रदेश जनसंपर्क में नियुक्ति पर सवाल …….! @आलेख – राकेश अचल

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भाप्रसे के अधिकारी की नियुक्ति पर सवाल
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मध्यप्रदेश सरकार द्वारा भापुसे के उदीयमान अधिकारी आशुतोष प्रताप सिंह सिंह को मध्यप्रदेश जनसम्पर्क का संचालक नियुक्त किये जाने पर प्रेस जगत के साथ दुसरे हलकों में भी सवाल खड़े किये किये जा रहे हैं .कुछ सवालों में जिज्ञासा है तो कुछ में गुस्सा,कुछस्वाल आलोचनात्मक हैं तो कुछ तटस्थ .लेकिन सवाल हैं और बने ही रहेंगे .
आशुतोष प्रताप सिंह को जनसम्पर्क विभाग में लेने के पीछे क्या विवशता या आवश्यकता थी ये सरकार के अलावा कोई नहीं जानता .भापुसे के अनेक अफसर प्रतिनियुक्ति पर दूसरे विभागों में पदस्थ किये जाते रहे हैं.कुछ तो विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रार भी बने और कुछ खेल संचालक भी लेकिन जनसम्पर्क के 62 साल के इतिहास में ये पहला अवसर है जब भापुसे के किस अधिकारी को तैनात किया गया है. अपवाद स्वरूप मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में मध्य्प्रदेश पुलिस के एक अदने से अफसर को अवश्य जनसम्पर्क में लाया गया था
आशुतोष प्रताप सिंह की मेधा पार कोई सवालिया निशान नहीं है ,वे परवीन हैं,व्य्वहारकुशल हैं और लोकप्रिय भी हैं लेकिन सवाल ये है की भारत सरकार जब भापुसे के एक अधिकारी को दो साल का कठोर प्रषिक्षण देकर जिस काम के लिए तैयार करती है उससे वो काम न लिया जाकर एक ऐसा काम क्यों लिया जा रहा है जिसका की उसके पास न कोई प्रशिक्षण है और न अनुभव .भापुसे के एक अफसर को प्रशिक्षण के दौरान दौड़ना.पीटी करना,बाधाएं पार करना गोली चलाना परेड करना सिखाया जाता है. भापुसे का अफसर 16 किमी लम्बी दौड़ लगा सकता है 45 किमी की क्रास कंट्री दौड़ पूरी कर सकता है लेकिन एक खबर के साथ कैसे न्याय कर सकता है ये केवल सरकार जान सकती है .
जनसम्पर्क का वास्ता अति विद्वान और साधारण पढ़े-लिखे पत्रकारों से पड़ता है .वे भापुसे के किसी अफसर जितने प्रतिभाशाली भी शायद नहीं होते ,उन्हें गोली चलाना नहीं आता ,वे कलम चला सकते हैं या गाल बजा सकते हैं,ज्यादा से ज्यादा सरकार से विज्ञापन मांग सकते हैं ,उन्हें भापुसे के अफसरों से शायद ढंग से बात करना भी नहीं आती हो ऐसे में भापुसे का एक अफसर उनके लिए कितना उपयोगी होगा ये सवाल है .
कलम और कलमकारों से जुड़े विभाग में भापुसे की आमद से संचालनालय के किसी पुलिस थाने में बदलने की आशंका तो बिलकुल नहीं है किन्तु ये तय है की इससे या तो संवादहीनता बाधित होगी या फिर नयी उलझने पैदा होंगी .अब ये आशुतोष प्रताप सिंह पर है की वे सरकार के फैसले को कैसे युक्तियुक्त प्रमाणित करते हैं ,क्योंकि कभी कभी तो पुलिस का प्रशिक्षण उन्हें परेशान करेगा .
बहरहाल ये एक प्रयोग है ,भले ही मजबूरी में किया गया प्रयोग है लेकिन इसके परिणामों की प्रतीक्षा करना चाहिए,जल्दबाजी में कोई भी प्रतिक्रिया पूर्वाग्रही मानी जाएगी .वैसे जनसम्पर्क संचालनालय प्रयोगशाला का ही पर्यायवाची है. यहां फर्जी अंकसूचियों के सहारे लोग चतुर्थ श्रेणी से भर्ती होकर प्रथम श्रेणी तक पहुँच गए हैं ,आशुतोष इन्हें भी देखें तो मुमकिन है की संचालनालय का चेहरा शायद बदल जाये,अन्यथा उन्हें विधानसभा चुनाव के बाद फिर किसी जिले में क़ानून और व्यवस्था तो सम्हलना ही है.
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@राकेश अचल