कब उबरेगा हिंसक मानसिकता से बंगाल ? @ राकेश अचल

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कब उबरेगा हिंसक मानसिकता से बंगाल ?
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पंचायत चुनावों में हुई हिंसा में बनगाल ने एक बार फिर अपनी खूनी और बर्बर मानसिकता का प्रमाण दे दिया.यहां हुई हिंसा में हालांकि 73 फीसदी मतदान हुआ लेकिन १२ लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़े और सैकड़ों लोग घायल हो गए ,ये सब तब हुआ जबकि प्रदेश में सुश्री ममता बनर्जी की संवेदनशील सरकार है .
पश्चिम बंगाल युगों से हिंसा का प्रतीक रहा है,यहां चाहे वामपंथियों की सरकार रही हो या किसी और दल की .बिना हिंसा के यहां लगता है की सियासत हो ही नहीं पाती .राज्य को एक सुसंस्कृत राज्य माना जाता है यहां साक्षरता की दर हो या लिंगानुपात दुसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर है फिर भी सियासत खून आलूदा ही बनी हुई है .चाहे पंचाट के चुनाव हों चाहे विधानसभा के बिना हिंसा के तो हो ही नहीं सकते .आम चुनावों में हिंसा अवश्यम्भावी है .बंगाल में कांग्रेस ने आजादी के बाद से तीन दशक तक राज्य किया और आपातकाल के बाद जब राज्य की सत्ता गंवाई तो फिर लौट कर सत्ता में नहीं आयी,यहां 23 साल तक मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के ज्योति बासु मुख्यमंत्री रहे और एक दशक तक बुद्धदेव भट्टाचार्य .२०११ से यहां कांग्रेस का उत्पाद तृण मूल कांग्रेस सत्ता में है ,लेकिन राज्य में केवल सत्ता बदली है सत्ता का चरित्र नहीं बदला.यहां किसी भी दल की सरकार रही हो किन्तु हिंसा को कोई नहीं रोक पाया .
पंचायत चुनाव में व्यापक सुरक्षा इंतजाम किये जाने तथा पश्चिम बंगाल और पड़ोसी राज्यों से ६०हजार से अधिक सुरक्षाकर्मी तैनात किये जाने के बावजूद उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, पूर्वी मिदनापुर, बर्दवान, नदिया, मुर्शिदाबाद और दक्षिणी दिनाजपुर जिलों में हिंसक झड़प हुई.राज्य की पुलिस भी अब हिंसा की अभ्यस्त होने के साथ ही परम संतोषी हो गयी है. सूबे के पुलिस महानिदेशक सुरजीत कर पुरकायस्थ इसी बात से संतुष्ट हैं कि इस पंचायत चुनाव में जितने लोग की जान गयी है, वह पिछले पंचायत चुनाव में मारे गये लोगों की संख्या से कम है. पिछले चुनाव में 25 लोगों की मौत हो गई थी. इस हिंसा में 3 पुलिसकर्मी घायल हो गए और 70 लोगों को इस हिंसा में गिरफ्तार किया गया है
चुनावों के दौरान हिंसा मुख्यत: मतदान केंद्रों पर होती है .. विपक्षी दलों ने सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस पर आतंक का राज कायम करने और लोकतंत्र को नष्ट करने का आरोप लगाया.
माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा, ‘पहले तो, उन्होंने लोगों को नामांकन पत्र दाखिल नहीं करने दिया. फिर, नामांकन के बाद तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों को नाम वापस लेने के लिए धमकी देने लगी. जिन लोगों ने नाम वापस नहीं लिया, उन पर हमला किया गया. यह कुछ नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पूरी तरह नष्ट करना है.’
भाकपा नेता डी राजा ने कहा कि यह चुनाव का महज ढकोसला है तथा ममता बनर्जी सरकार को पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र को बचाने के लिए कदम उठाना चाहिए था. हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने कहा कि पिछले वाम शासन की तुलना में यह कम है. पार्टी नेता डेरेक ओब्रायन ने ट्वीट किया, ‘बंगाल के सभी नये नवेले विशेषज्ञों के लिए राज्य में पंचायत चुनाव का इतिहास है. माकपा शासन में 1990 के दशक में चुनाव हिंसा में 400 की मौत. 2003 में 40 की मौत. हर मौत त्रासदी है. हां, कुछ दर्जन घटनाएं हुई हैं.
सवाल ये है की राज्य के लोग हिंसा की मानसिकता से उबर क्यों नहीं पा रहे ?क्या राजसत्ता पर काबिज रहने के लिए केवल हिंसा ही पहला और आखरी हथियार है क्या एक महिला मुख्यमंत्री भी हिंसा की भयावहता से राज्य को मुक्ति नहीं दिला सकती ?गांधी के भारत में खून से सनी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं होना चाहिए ,लेकिन दुर्भाग्य है की कोई भी राज्य इससे अछूता नहीं है .राज्य में हिंसक चुनावों से निबटने के लिए चिनाव आयोग को अलग से शोध कराना चाहिए और एक नाट्य रणनीति बनाना चाहिए .पश्चिम बंगाल की राजनीति जिस दिन हिंसा मुक्त हो जाएगी उस दिन देश में एक नए युग का सूत्रपात होगा ,ऐसी मेरी मान्यता है .मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी राज्य में हाल में ही हुई चुनावी हिंसा के लिए अकेली जिम्मेदार हैं ,उन्हें स्वयं आत्म्वलोकन करना चाहिए .
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@ राकेश अचल