देश की पहली महिला कमांडो ट्रेनर “डा. सीमा राव ” * *20 हजार से अधिक जवानों को दे चुकी हैं कमांडो ट्रेनिंग

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कमांडो शब्द सुनते ही सबसे पहले पुरुष छवि ही दिमाग में आती है लेकिन डा. सीमा राव इसका अपवाद हैं या कहें कि अपवाद से एक कदम आगे। सीमा राव देश की पहली महिला कमांडो ट्रेनर हैं जो पिछले दो दशक से सेना के जवानों को निःशुल्क ट्रेनिंग दे रही हैं। सीमा दुनिया की उन 10 महिलाओं में से एक हैं जिन्हें ब्रूस ली द्वारा ईजाद की गई अनोखी मार्शल आर्ट जीत कुन डो का प्रशिक्षण हासिल है। इसके अलावा भारतीय सेना और सुरक्षा बलों को ट्रेनिंग देने वाली सीमा को मार्शल आर्ट्स में ब्लैक बेल्ट भी हासिल है। सीमा का व्यक्तित्व बहुआयामी है। वह डॉक्टर हैं और एक लेखिका भी। इनकी आधा दर्जन से ज्यादा किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। बावजूद सीमा की सबसे बड़ी खासियत इनका देशसेवा का फौलादी जज्बा है। वह अब तक सुरक्षा बलों के 20 हजार से अधिक जवानों को कमांडो ट्रेनिंग दे चुकी हैं, वह भी निःशुल्क।
कमांडो प्रशिक्षण देते हुए डा. सीमा राव को दो दशक से अधिक का समय हो चुका है। इस दौरान वह दो बार गंभीर रूप से जख्मी भी हुईं। एक बार छह हफ्तों के लिए याददाश्त चली गई तो दूसरी बार कमर टूटने पर छह महीने अस्पताल में रहना पड़ा लेकिन इस जांबाज बेटी ने कभी हार नहीं मानी। इस महिला कमांडो ट्रेनर का यह सबसे अलग और चुनौती भरा सफर अपने पिता के देशभक्ति के संस्कारों से शुरू हुआ माना जा सकता है। सीमा के पिता प्रोफेसर रमाकांत सिनारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने गोवा को पुर्तगालियों से आजाद कराने में बड़ी अहम भूमिका निभाई थी। स्वतंत्रता संग्राम के किस्से सुनकर बड़ी हुई सीमा के मन में उसी समय से देश के लिए कुछ अलग करने का जज्बा पैदा हो चुका था पर उन्हें पता नहीं था कि इसके लिए कौन-सा क्षेत्र चुना जाए।
सीमा जब हायर सेकेण्डरी में पढ़ रही थीं उस दौरान उनकी दीपक राव से मुलाकात हुई। दीपक तब मार्शल आर्ट्स सीख रहे थे और उन्होंने सीमा का इस विधा से परिचय करवाया। इस तरह सीमा को अपनी पढ़ाई के साथ-साथ एक अलहदा शौक भी मिल गया। बाद में उन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई की फिर उसके बाद क्राइसिस मैनेजमेंट में एमबीए की डिग्री हासिल की। 1996 में सीमा और उनके पति ने मिलकर आर्मी, नैवी, सीमा सुरक्षा बल और एनएसजी के प्रमुख के सामने कमांडोज को निःशुल्क मार्शल आर्ट्स और कॉम्बैट ट्रेनिंग देने का प्रस्ताव रखा जो सबको काफी पसंद आया और उन्होंने ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू करवा दिए। सीमा इससे संतुष्ट नहीं थीं। सीमा कुछ हटकर करना चाहती थीं। यहां उन्हें एक बार फिर दीपक का साथ मिला। तब तक सीमा की दीपक से शादी हो चुकी थी और दीपक सेना में शामिल हो चुके थे। अपने अधूरे सपने को साकार करने के लिए आखिरकार सीमा ने अपने पति मेजर दीपक के साथ वह रास्ता चुन लिया जिस पर शायद वे हमेशा चलना चाहती थीं। अपने पति के साथ मिलकर सीमा ने देश की लगभग हर शीर्ष यूनिट को प्रशिक्षित किया है। इनमें एनएसजी कमांडो, मार्कोस (नैवी के कमांडो), गरुड़ (एयर फोर्स कमांडो) से लेकर पैरा कमांडो, बीएसएफ के कमांडोज भी शामिल हैं। सीमा अब तक नेशनल पुलिस एकेडमी, आर्मी ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी के अधिकारियों से लेकर देश के कई शहरों में पुलिस के त्वरित प्रतिक्रिया दस्तों को प्रशिक्षण दे चुकी हैं।


दिलचस्प बात है कि मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग देने वाली सीमा का व्यक्तित्व यहीं तक सीमित नहीं है। कॉम्बैट शूटिंग इंस्ट्रक्टर, फायर फाइटर, रॉक क्लाइम्बिंग में एचएमआई (हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टीट्यूट) मेडलिस्ट होने के साथ-साथ वे मिसेज इंडिया वर्ल्ड की फाइनलिस्ट भी रह चुकी हैं। एक लेखिका के तौर पर सीमा ने आठ किताबें भी लिखी हैं। दीपक के साथ मिलकर उन्होंने कमांडो मैन्युअल ऑफ अनआर्म्ड कॉम्बैट शीर्षक से एक किताब लिखी है जो एफबीआई से लेकर इंटरपोल और यूएन के पुस्तकालयों तक में जगह बना चुकी है। अपने काम के प्रति सीमा इतनी अधिक समर्पित हैं कि कमांडोज के प्रशिक्षण में रुकावट न आए इस ख्याल से उन्होंने खुद मां बनने का विचार छोड़ कर एक बेटी को गोद लिया है। सीमा के इस चुनौती भरे सफर को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर मान्यता मिली है। वर्ल्ड पीस कांग्रेस में उन्हें वर्ल्ड पीस अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। साथ ही सीमा को यूएस प्रेसीडेंट वॉलेंटियर सर्विस अवॉर्ड भी मिल चुका है।
भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों का एक महिला से कमांडो प्रशिक्षण लेना विचित्र लगने वाली बात है। इस बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए सीमा कहती हैं, कई बार ऐसे जवानों से सामना होता है जिनके लिए एक महिला से ट्रेनिंग लेना बेहद असहज और गले न उतरने वाली बात होती है लेकिन मैंने हमेशा ही अपनी काबिलियत से अपने कमांडोज का भरोसा जीता है। मैं हमेशा अपने ट्रेनीज का सम्मान पाने में सफल हुई हूं। सीमा कहती हैं कि परंपरागत सामाजिक बाधाओं से इतर भी मेरा कमांडो ट्रेनर के रूप में सफर बहुत आसान नहीं रहा।


डा. सीमा राव को अपने कमांडोज की तरह हरदम मुस्तैद रहना पड़ता है। यही वजह रही कि एक ट्रेनिंग प्रोग्राम में होने के कारण वे अपने पिता के अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हो सकी थीं। प्रशिक्षण के दौरान उनके शरीर में कई बार फ्रेक्चर हुए लेकिन वे इस काम से कभी पीछे नहीं हटीं। यहां तक कि सीमा को एक बार सिर पर गंभीर चोट भी लगी थी। कई महीनों के इलाज के बाद आखिरकार उन्होंने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य हासिल किया और फिर अपने काम में जुट गईं। अपने काम के बारे में सीमा दृढ़ता से कहती हैं। यह आसान नहीं है, न कभी आसान होगा लेकिन कौन चाहता है कि आसान हो। शायद यही वो जज्बा है जिसने सीमा के सपने को साकार किया और वे लगातार वैसा काम कर पा रही हैं, जैसा चाहती थीं।