रेत के प्रेत सब दूर एक जैसे …. (राकेश अचल) * ( भिंड में पत्रकार की हत्या पर विशेष..)

1948

रेत के प्रेत सब दूर एक जैसे
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(राकेश अचल)
पूरे भारत में रेत नदियों से मुफ्त में मिलने वाला सोना है,इसे पाने की लत जिसे एक बार लग गयी वो इसे पाने के लिए कुछ भी कर गुजर सकता है .नदियों से निकलने वाली रेत ने अंगूठा छाप लोगों को करोड़पति बना दिया है. अब देश में जहां-जहां नदियां हैं वहां-वहां की सियासत और हुकूमत रेत के इर्द-गिर्द ही घूमती है .सबसे बड़ी बात ये है की रेत अब बेरहम हो चुकी है ,इसे कुछ भी नहीं दिखाई देता .


मध्यप्रदेश के भिंड में एक पत्रकार को रेत माफिया ने ट्रक से कुचल कर मार दिया तो एक बार फिर ेरत के प्रेत पर चर्चा गर्म हो गयी .रेत ही क्या जमीन के अंदर से निकलने वाला हर अवयव पाने के लिए मची होड़ ने लोगों को माफिया और हत्यारा बना दिया है. इस कारोबार की आड़ में जो भी आता है कुचल दिया जाता है,फिर चाहे वो बंदूकधारी हो या कलमधारी .पुलिस वाला हो या समाजसेवी .
कोई एक दशक पहले की बात है,मै चंबल के दूरी घड़ियाल अभ्यारण्य की रिपोर्टिंग के लिए गया था ,वहीं अचानक मुरैना जिले का पुलिस बल अचानक जमा हुआ तो उत्सुकता बढ़ी,पुलिस,एसएएफ और वन विभाग के अमले में मेरा परिचित एक पुलिस अधिकारी भी था,उससे पूछताछ की तो पता चला की देश की सबसे बड़ी अदालत के निर्देश पर ये टास्कफोर्स रेत माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने जा रहा है ,सो आप भी चलिए ,जोरदार खबर मिलेगी .
खबर का लालच किसे नहीं होता,?मै अपने साथी संजय त्रिपाठी के साथ टास्कफोर्स में शामिल हो गया. मीलों के सफर के बाद हमें रास्ता साफ़ मिला .रेत माफिया को टास्कफोर्स के आने की भनक पहले ही मिल गयी थी .दूर-दूर तक न कोई ट्रेक्टर ट्राली नजर आ रही थी और न रत से भरा कोई ट्रक .हम निराश होने लगे ,लेकिन पुलिस अफसर ने कहा-बड़ी अदालत का निर्देश है इसलिए कार्रवाई तो करके ही लौटेंगे .
टास्कफोर्स में कोई डेढ़ सौ सशस्त्र जवान और एक दर्जन से अधिक अधिकारी थे ,पत्रकार अकेले हम. एक घंटे के सफर के बाद हमें सड़क किनारे एक ट्रक खड़ा दिखाई दिया ,टास्कफोर्स को देखकर ट्रक चालक ट्रक छोड़कर भाग गया.मुमकिन है भगाया गया हो. टास्क फ़ोर्स ने पंचनामा बनाकर ट्रक की जप्ती बनाई और ट्रक को घसीट कर अपने साथ लेकर वापस हो लिया .टास्कफोर्स का टास्क शायद इतना ही था .सांप भी मर रहा था और लाठी भी नहीं टूट रही थी .


टास्कफोर्स आते समय जिस तरह निर्बाध गया था लौटते समय उसी रास्ते का मंजर बदला हुआ था. गाँवों में रास्ते भर खाली ट्रेक्टर ट्रालियों आदी-तिरछी कर रास्ता बाधित कर दिया गया था. अनुभवी अफसर भांप गए की दाल में काला है .वे अपने वाहनों से उत्तर गए और हाथ में पिस्तौल लेकर रास्ता साफ़ करने का आग्रह करने लगे.सिपाहियों को बंदूके लोड करने के निर्देश दे दिए गए,हमने भी अपना कैमरा आन कर लिया .पुलिस की चेतावनी के बावजूद रास्ता साफ़ नहीं हुआ उलटे पुलिस बल पर चौतरफा पथराव शुरू हो गया .हम जिस जीप में सवार थे उसमें वन विभाग के सिपाही थे हमने उनसे हथियार चमकने को कहा लेकिन वे जीप से कूद कर भाग गए .
एक सीएसपी एसएस चहल और एक इंस्पेक्टर एसके दुबे जान हथेली पर रखकर पथराव कर रही भीड़ का मुकाबला करते आगे बढे लेकिन हमला रुका नहीं उलटे देशी तमंचों से फायर शुरू हो गए .पुलिस ने भी जबाबी फायर किये लेकिन हवा में रेत कारोबारी पीछे नहीं हेट,उलटे उनमें से कुछ ने हमने निशाने पर ले लिया .हम दोनों जीपों की आड़ लेते हुए आगे बढ़ रहे थे. टास्कफोर्स बिखर चुका था .सबको अपनी जान की पड़ी थी .


मैंने फॉरीइम्दाद के लिए मुरैना पुलिस कंट्रोल रूम फोन लगाया लेकिन किसी ने उठाया नहीं,हारकर मैंने अपने परिचित ग्वालियर रेंज के आईजी सर्वजीत सिंह को सूचना दी,उनके निर्देश पर मुरैना से जब तक अतिरिक्त फ़ोर्स रवाना हुआ ,तब तक आधा दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो चुके थे.इंस्पेक्टर एसके दुबे के सर पर ईंट से वार किया गया था,हम उन्हें घायल अवस्था में जैसे-तैसे बचाकर सुरक्षित स्थान पर ले गए .अकेले चहल जान हथेली पर रखकर हमलावरों से लोहा लेते रहे .
कोई 45 मिनिट बाद जब मुरैना से अतिरिक्त फ़ोर्स आया तब तक टास्कफोर्स की हिम्मत पास्ट हो चुकी थी,अतिरिक्त फ़ोर्स के आते ही पूरा गाँव पुरुषविहीन हो गया,घरों में केवल महिलाएं बचीं. पूरे रास्ते में ईंट-पत्थर बिखरे हुए थे ,घायलों को फौरन अस्पताल रवाना किया गया. हम दोनों रिपोर्टरों की साँसें भी उखड़ी हुई थीं लेकिन सिवाय धैर्य रखने के कोई उपाय नहीं था. हमारा नसीब था की उस दिन हम या दुसरे पुलिस वालों में से कोई शहीद नहीं हुआ अन्यथा रेत माफिया ने तो जान लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी .
मुरैना में जो हुआ वो भिंड में भी होता है,दूसरे जिलों में भी होता है. खनन माफिया निरंकुश है .एक आईपीएस एनके सिंह इसी माफिया की भेंट चढ़ चुके हैं.वन विभाग और पुलिस के अनेक मैदानी कर्मचारियों की हत्या के प्रयास किये जा चुके हैं. पत्रकार भी अब इस फेहरिश्त में शामिल हो गए हैं ,लेकिन रेत माफिया की मुश्कें नहीं कासी जा रहीं.सत्ता में कोई भी हो रेत माफिया को कोई फर्क नहीं पड़ता ,क्योंकि हर सरकार में उनके शुभचिंतक होते हैं ,संरक्षक होते हैं .
चंबल में रेत के कारोबार ने खेती की ऐसी-तैसी कर दी है. रेत माफिया रेत के भंडारण के लिए उपजाऊ खेत मुंहमांगे दामों पर किराये से ले लेते हैं और वहां रेत के खुले गोदाम बना लेते हैं ,लेकिन कोई कुछ नहीं कर सकता .जिसे जान देना है वो दे लेकिन ये अजेय हैं और शायद अजेय ही रहेंगे .कोई अदालत,कोई सरकार,कोई पुलिस,कोई टास्क फ़ोर्स रेत माफिया का कुछ नहीं बिगाड़ सकता .

@ राकेश अचल