विश्व जल दिवस – ” पानी बिना न ऊबरे,मोती,मानस,चून ….” -* राकेश अचल

1869

विश्व जल दिवस
****************
पानी बिना न ऊबरे,मोती,मानस,चून
***********************************************************
गाँव के पोखर से लेकर विश्व के हर बड़े शहर में जल संकट गहरा होता जा रहा है ,हम लगातार ‘डे-जीरो’की और बढ़ रहे हैं. अगर हम फौरन न चेते तो वो दिन दूर नहीं जब आपके घर में लगे नलों की टोंटियों से पानी की जगह केवल सीटियां बजती सुनाईं देंगीं .पानी के लिए हम जमीन को चाहे जितना हेगड़े तक खोद डालें लेकिन जब पानी होगा ही नहीं तो मिलेगा कैसे .?
दुनिया में वो दिन दूर नहीं है जब सचमुच डूब मरने के लिए चुल्लू भर पानी नसीब नहीं होगा .दुनिया के दुसरे देशों को छोड़िये आप तो अपने मुल्क की चिंता कीजिये .भारत के बेंगलुरू शहर को दुनिया के उन 200 शहरों की सूची में शुमार कर लिया गया है जिन्हें डे-जीरो की फेहरिश्त में शामिल किया गया है.गहराते जल संकट का असल कारण पर्कृति से खिलवाड़ के साथ ही अराजक शहरीकरण और जल की बर्बादी है .लगता है की हमारी लाजरवाही से धरती ही नहीं अब आसमान भी हमसे रूठता दिखाई डे रहा है. एक तरफ भू-जल स्तर गिर रहा है तो दूसरी और आसमान ने भी अब कम पानी बरसाना शुरू कर दिया है .
प्रकृति की नाराजगी का सबसे बुरा असर हमारे उन प्राकृतिक जल संसाधनों पर पड़ रहा है जो युगों से हमारे पारम्परिक जल स्रोत थे ,हमारी नदियाँ,तालाब और कुएं-बाबड़ी बेमौत मारे जा चुके हैं .पोखरों का पता नहीं है ..मेंढकों और मछलियों की तमाम प्रजातियां जल संकट के कारण जीवन संघर्ष में हार गयीं .
जल संकट का सबसे बड़ा भुग्तभोगी दक्षिण अफ्रीका का शहर कैपटाउन है.इस शहर में पानी कुछ ही दिनों के लिए शेष है .पर्यावरण के क्षेत्र में कार्यरत संस्था सेंटर फॉर सांइस (सीएसई) की मदद से प्रकाशित पत्रिका डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के शहर बेंगलुरु में 79 प्रतिशत जलाशय अनियोजित शहरीकरण और अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुके हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जलाशय के खत्म होने के लिए शहर के कुल क्षेत्रफल में 1973 की तुलना में निर्माणाधीन क्षेत्र में 77 प्रतिशत इजाफे का अहम योगदान है. बेंगलुरु का भूमि जल स्तर पिछले दो दशक में 10-12 मीटर से गिरकर 76-91 मीटर तक जा पहुंचा है.
साथ ही शहर में बोर-वेल की संख्या बढ़कर 4.5 लाख हो गई है.
द वॉटर गैप’ रिपोर्ट के मुताबिक युगांडा, नाइजर, मोजांबिक, भारत औऱ पाकिस्तान लिस्ट में उन देशों में शामिल हैं जहां पर सबसे ज्यादा जलसंकट मंडरा रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन देशों में कई फीसदी लोगों को साफ पानी पीना नसीब नहीं हो पा रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 16.3 करोड़ लोग साफ पानी के लिए तरस रहे हैं. बता दें कि पिछले साल इसी रिपोर्ट में यह आंकड़ा 6 करोड़ 30 लाख लोगों का था. यानि की महज एक साल में इस आंकड़े में कई गुणा इजाफा हो गया है.
द वॉटर गैप’ रिपोर्ट के मुताबिक युगांडा, नाइजर, मोजांबिक, भारत औऱ पाकिस्तान लिस्ट में उन देशों में शामिल हैं जहां पर सबसे ज्यादा जलसंकट मंडरा रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन देशों में कई फीसदी लोगों को साफ पानी पीना नसीब नहीं हो पा रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 16.3 करोड़ लोग साफ पानी के लिए तरस रहे हैं. बता दें कि पिछले साल इसी रिपोर्ट में यह आंकड़ा 6 करोड़ 30 लाख लोगों का था. यानि की महज एक साल में इस आंकड़े में कई गुणा इजाफा हो गया है.
मुश्किल ये है की लोग जलसंकट की भयावहता को गंभीरता से नहीं ले रहे . लोग नहीं जानते की जिंदा रहने के लिए साफ-स्वच्छ पानी बेहद जरूरी है। आप खाने के बिना 1 महीने तक जिंदा रह सकते हैं लेकिन पानी के बिना एक हफ्ते से ज्यादा नहीं जी सकते।लेकिन पानी की मितव्यता किसी की प्राथमिकता में नहीं है .आज से तीस वर्ष पहले अपने शहर ग्वालियर के जलसंकट को लेकर जब हम लोगों ने चंबल से पानी लाने के लिए पदयात्रा की थी तब हमारा मजाक बनाया गया था लेकिन आज उसी सझहर के लोग चंबल की और टाक रहे हैं जबकि अब चंबल भी जबाब देती नजर आ रही है .
जल संकट से निबटने के लिए जल के संयमित इस्तेमाल के अलावा कुछ ऐसी तकनीक का ईजाद भी समय की जरूरत है जिससे जल का इस्तेमाल और अपव्यय दोनों रुक सकें .अभी हमारे देश में जहां एक बड़ा हिस्सा पीने के पानी के लिए परेशान है वही एक हिस्से की आबादी अकेले शौच बहाने में ही अकूत पानी बहा देती है .जल संकट अब विज्ञान की परीक्षा भी लेगा .इसलिए आएये जागिये,पानी बचाइए,क्योंकि पानी बिना सब सूना है.पानी के बिना मोटी,मनुष्य और अन्न सब की आव जाती रहेगी .
**
@राकेश अचल