आलेख – @कर्नाटक,कांग्रेस अधिवेशन औऱ लिंगायत…. — डॉ अजय खेमरिया

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        कांग्रेस अधिवेशन में घोषणा की गई कि 2019 में हर कीमत पर नरेंद्र मोदी को सत्ता से बाहर किया जाएगा,उधर कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायतों/वीरशैव को हिन्दू धर्म से अलग कर अल्पसंख्यक दर्जा देने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेज दी , धार्मिक रूप से लोगो खासकर हिंदुओ को बांटने का यह निर्णय सिर्फ इसलिये लिया गया ताकि अगले 2 महीनों में होने वाले कर्नाटक विधानसभा चुनाव में राज्य की 17 फीसदी लिंगायत बिरादरी के वोट लिये जा सके। कर्नाटक में लिंगायत अभी अगड़ी जाति में गिने जाते है और सामाजिक ,आर्थिक रूप से बेहद सम्पन्न है,अगर कांग्रेस सरकार के इस फैसले पर मान लीजिये अमल हो जाता है तो कर्नाटक की 17 फीसदी आबादी अल्पसंख्यक हो जाएगी वह उन सुविधाओं की हकदार भी होगी जो मायनोरटी के लिये प्रावधित है,चूंकि लिंगायत हजारों साल से हिन्दू धर्मालबी है और अगर उन्हें इस तरह माइनॉरिटी स्टेटस दे दिया गया तो कल महाराष्ट्र में मराठा,हरियाण में जाट, राजस्थान में गुर्जर औऱ राजपूत,उड़ीसा, झारखण्ड में वनवासी,तमिलनाडु में द्रविड़,गुजरात मे पटेल भी इसी तर्ज पर अपने को अलग दर्जे की मांग कर सकते है तब ये कांग्रेस का खेल देश की एकता और अखंडता के लिये कितना आत्मघाती होगा इसकी कल्पना भी राहुल गांधी और उनके कर्नाटक के सीएम ने की है??

अभी हाल ही में राहुल गांधी ने कहा था कि उनकी पार्टी देश को जोड़ने में यकीन रखती है लेकिन उनकी कर्नाटक सरकार का यह कदम हिंदुओं को विभाजित करने वाला खतरनाक खेल है जिसका एकमेव लक्ष्य विधानसभा का चुनाव जीतना है कर्नाटक का लिंगायत समाज परम्परागत रूप से बीजेपी का समर्थक है और पार्टी ने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में येदुयुरप्पा को घोषित कर रखा है जो खुद लिंगायत जाति से आते है जाहिर है राज्य के 17 फीसदी लिंगायत वोटरों के लालच में यह खतरनाक खेल खेला जा रहा है जो अंततः भारत की एकता और अखंडता के लिये एक त्रासदी से कम साबित नही होगा,हो सकता है कर्नाटक की कांग्रेस सरकार इस लिंगायत कार्ड से अपनी सत्ता बचाये रखने में कामयाब हो जाये लेकिन प्रश्न जो इसके बाद देश के सामने अवश्यंभावी है उनका समाधान क्या कॉन्ग्रेस के पास होगा?

संसदीय लोकतंत्र में सरकारें आती, जाती रहती है कभी इस देश मे कांग्रेस का एक छत्र राज था राज्यो के मुख्यमंत्रीयों की हैसियत संजय गांधी के दरबार मे चपरासियों सी होती थी,आज कांग्रेस देश के 67 फीसदी इलाके से सत्ता से बाहर है ,सत्ता सबका लक्ष्य है लेकिन देश की कीमत पर सत्ता का वरण नेहरू,शास्त्री,इंदिरा,संजय ने कभी नही किया यह भी एक प्रमाणिक तथ्य है लेकिन लगता है आज की कांग्रेस वैचारिक रूप से अबतक के सबसे कृपण औऱ दारिद्र्य के दौर से गुजर रही है,एक तरफ तो उसके मुखिया कहते है कि वह जनेऊधारी हिन्दू है,मन्दिर,मन्दिर,जाते है भजन कीर्तन में भाग लेते है तिलक लगाकर सभाएं करते है ताकि देश के करोड़ो हिंदुओं के बीच उनकी स्वीकार्यता स्थापित हो लेकिन उनके सबसे चहेते मुख्यमंत्री सिद्धारमैया जब हिंदुयों को विभाजित करने वाली लिंगायत सिफारिश केंन्द्र को भेजते है तो वह चुप बने रहते है क्यों शायद उन्हें अपनी सरकार हिन्दुओ से अधिक जरूरी है,लेकिन राहुल गांधी को ये समझना होगा कि कांग्रेस की ये मौजूदा चुनावी दुर्गति इसलिये भी हुई है क्योंकि देश में बहुसंख्यक धारणा यही है कि ये पार्टी हिन्दुओ की विरोधी है,2014 में करारी हार के बाद बनी ए के एंटोनी कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यही कहा था कि एक जनधारणा निर्मित हो चुकी है की कांग्रेस मुस्लिमपरस्त पार्टी है ऒर हिंदुओ को इस स्टैंड से घृणा हो रही है। एंटोनी रिपोर्ट पर 4 साल तक कोई कदम नही उठाया गया लेकिन जब गुजरात मे राहुल गांधी ने मंदिर मन्दिर जाकर माथा टेका औऱ उनके प्रवक्ताओं ने उन्हें मय प्रमाण के जनेऊधारी हिंदू साबित किया तब लगा कि एंटोनी कमेटी पर राहुल अमल कर रहे है पर लगता है जिस वैचारिकी के साथ इन्दिरा गांधी राजनीति किया करती थी उसका अब पूरी तरह से कांग्रेस के परकोटे में से पतन हो चुका है,मोदी जेपी से बड़ी ताकत नही है जब कांग्रेस जेपी की आंधी के बाद भी खड़ी हो सकती है तो क्या आज मूल आत्मविश्वास इस पार्टी का गायब हो चुका है

कर्नाटक प्रसंग तो यही साबित करता है कि सिर्फ एक राज्य की सत्ता बचाने के लिये इस पार्टी ने ऐसा कदम उठा लिया है जो भविष्य में न सिर्फ काँग्रेस की राजनीति बल्कि देश की सेहत के लिये भी एक आत्मघाती राजनीति का सबब साबित होगा यह तय है।

*(डॉ अजय खेमरिया)*