*पुलिस🙏🏻* *बढ़ता तनाव आत्महत्या का कारण तो नही*…..???

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*🙏🏻पुलिस🙏🏻*
*बढ़ता तनाव आत्महत्या का कारण तो नही*…..???

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मध्यप्रदेश पुलिस में बढ़ते तनाव के कारण फ़ासी लगा कर *आत्महत्या* करने का सिलसिला चल रहा है, दो माह पूर्व अशोकनगर में शहर की कोतवाली के पास टावर पर रस्सी का फन्दा बना कर ए एस आई सतीश सिंह रघुवंशी ने फाँसी लगा कर मौत को गले लगाया था, तो पिछले हफ्ते शाजापुर में प्रधान आरक्षक ने भी फाँसी लगाई थी ओर इसी क्रम में होली के दिन सुबह पाँच बजे रायसेन के कलेक्टर परिसर में टीन सेड पर ए एस आई प्रकाश मरावी ने फाँसी लगाकर सिस्टम पर ही तमाम सवाल खड़े कर दिए है। मृतक श्री मरावी पुलिस अधीक्षक के निवास पर तैनात होना बताया जा रहा है। हालांकि उक्त घटना की भी जाँच के आदेश दिए है किन्तु सवाल यह सामने आ रहा है की आमजन को सुरक्षा देने वाली मध्यप्रदेश पुलिस स्वयं ही अवसाद में इस हद तक घिरी है की आत्महत्या जेसे कदम उठाना पड़ने के मामले नित नए सामने आ रहे है। धार में अपने थाने में गोली मारकर एक सहायक उपनिरीक्षक सुसाइड कर चुका हे जबलपुर में भी आरछक सुसाइड कर चुका हे ग्वालियर ओर भिंड दतिया भी अछूूता नही है। इसके पहले भी पुलिस कर्मी आत्महत्या करते रहे है। झाबुआ गुना टीकमगढ़ छतरपुर में पुलिस कर्मियों की हत्या किस ओर इशारा करती हे
यह केसा सुशासन है??,, कहा है शासन का आनन्द मंत्रालय,, या ये सब सिर्फ औपचारिकता बन कर रह गया।कहा गए प्रदेश के मुख्यमंत्री के सुशाशन के दावे,वादे..!
अवसाद से घिरकर निरंतर आत्महत्या करने के मामलों में कुछ यक्ष प्रश्न भी उभरकर सामने आ रहे है।सम्पूर्ण भारत में सबसे ज़्यादा म प्र पुलिस के जवान सुसाइड ,प्रताड़ना के शिकार है,ऐसा क्यों…?
क्या पुलिस महकमे में कर्मचारी पर क्षमता से अधिक काम का दवाब है…..?
क्या कर्मचारी कार्य के दबाब के कारण अपने पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति नही कर पा रहा है…..?
क्या ऑफ़िसर द्वारा नेताओ अथबा अन्य दबाब में अपने अधीनस्थ कर्मियों को अनावश्यक यातनाये दी जा रही है….?
क्या आमजन को सुरक्षा मुहैया कराने वाली पुलिस खुद अपनी सुरक्षा के लिए मोहताज है…!
या फिर सरकार की नितियो के आगे पुलिस के सर झुक रहे हे…?

इस समूचे एपिसोड में महज़ संयोग हो या कुछ और किन्तु एक बात ओर सामने आई है कि पुलिस महकमे के प्रदेश के मुखिया के इस कार्यकाल में पुलिस कर्मियों की आत्महत्या या पुलिस की आम जनता द्वारा पिटाई के आंकड़े भी अव्वल रहे है। पुलिसकर्मियों के प्रति इस असम्मान ने भी उनके ह्रदय को वेदना पहुचाई जिसकी परिणीति किसी न किसी आत्मघाती कदम के रूप में सामने आई है।
जिले के तमाम आलाधिकारी भ्रस्टाचार में आकंठ डूबकर मलाइमार थानों पर चहेतों की पोस्टिंग, कर्मचारियो पर अनावश्यक दबाब, कान के कच्चे होकर बेबजह चुगलखोरों के कहने पर किसी मातहत को प्रताड़ित करने,नेताओ की जीहुजूरी ओर उनके कहे अनुसार थाने चलाने में मशगूल हो गये है।यहाँ तक कि कई मर्तबा तो थाने के अदने से कर्मचारी के स्थानांतरण को भी बड़ा इश्यू बना लिया जाता है जो किसी भी लिहाज़ से उचित नही है।
दलालो से घिरे नेता अपनी पूरी कर्तव्यपरायणता सिपाही- दरोग़ा को थाने से हटाने में लगा देते है।कई मर्तबा तो यदि कोई ईमानदार ऑफ़िसर इनकी मनमानी नही होने देता तो विधानसभा तक मे प्रश्न लगाकर इन कर्मचरियों को परेशान किया जाता हे। शिवराज युग में इस तरह में मामले बहुतायत में सामने आये जिनमे विधायको ने बेबजूद मुद्दों पर निजी स्वार्थपूर्ति अथवा अपने छुटभैया मंडली के कहने पर इस प्रकार के दबाब बनाये जिनमे ग्वालियर-चम्बल संभाग तो शायद आंकड़ो की दृष्टि से अव्वल रहा है। यहाँ के कई उम्र दराज विधायक तो सिर्फ़ ओर सिर्फ़ कर्मचारियों को निजी स्वार्थ ओर उन पर दबाव बनाने में ही अपनी बिधायकी जाया कर रहे हे ।
पुलिस महकमे से जुड़े सूत्र दबी जुबान में यह बात स्वीकारते है कि छोटे कर्मचारी १००% अवसाद में जीवन बिता रहे हे ओर मुख्यमंत्री की छवि कर्मचारी विरोधी होने की बना रहे हे। प्रदेश के मुखिया डीजी पुलिश सरल स्वभाव के है जिनकी बात नेताओ के मुह लगे तमाम अफसर मानते ही नही है। नतीजतन अधीनस्थ अमला प्रताड़ना का शिकार होकर भी अपनी बात उच्चाधिकारियों के समक्ष नही रख पाता और स्वाभिमान से समझौता न कर पाने की स्थिति में कई मर्तबा गलत निर्णय लेने को बाध्य हो जाता है।आज भी ऐसे तमाम उदाहरण है जिनमे प्रदेश के तमाम ऐसे अफसर जो बड़ी से बड़ी घटनाओं को अपनी दक्षता के बलबूते चुटकियों में हल कर प्रदेश में ख्याति बटोर चुके थे,ओर आज किसी न किसी दूषित राजनीति या आला अफसर की बेरुखी के कारण लाइन में पड़े हुए है। प्रदेशभर के मामा अपने से दुगनी उम्र के भाँजे विधायकों पर सोध करे जो अपने कार्यालय में हज़ारों पत्र होम मिनिस्टर को अदला बदली के लिए लिखते हे।सोचनीय तथ्य है कि अगर पुलिस कर्मियों की मॉनिटरिंग विधायक करेंगे तो फिर जिले के पुलिस अधीक्षक क्या सिर्फ योग क्रिया करेंगे…..!!
विषय छोटा नही,बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा बहुत महत्वपूर्ण है जिस पर प्रदेश सरकार को चिंतन-मनन करना अत्यंत आवश्यक है। आम जन को सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराकर खुद अवसाद में रहने वाली पुलिस क्या ऐसे हालातों में निष्ठा के साथ अपने कार्य को अंजाम दे सकती है ….?
क्या चंद समय के राजनीतिक कार्यकाल में आने वाले श्वेत खद्दर वस्त्रधारी लोग हमारी देश की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी को निजी स्वार्थ के लिए इस प्रकार प्रभावित कर सकते हैं….?
क्या जिले को अपराधविहीन करने का मंसूबा पाले बैठे जिले की आला अफसर ऐसे दबाव के हालातों में निष्पक्ष पुलिसिंग कर सकते है….?
क्या पुलिस थानो के कर्मचारी इतने दवावों के उपरांत अपने पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन कर सकता है ….??
क्या काबिल पुलिस अफसर-कर्मियों की निष्ठा,समर्पण,योग्यता की अनदेखी उन्हें साइड लाइन में डालकर की जानी चाहिए….?
शायद नहीं …..!!!
निष्पक्ष पुलिसिंग के लिए प्रदेश की सरकार को इस विषय पर यह चिंतन -मनन-शोध करने की महती आवश्यकता है।यदि खाकी वर्दी ही अवसाद में घिरी रही तो प्रदेश की आवाम को सुरक्षा कैसे मुहैय्या होगी…..!!!

@ बृजेश तोमर @