मध्यप्रदेश के उपचुनाव — “न तुम जीते,न हम हारे ….” @ राकेश अचल

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मध्यप्रदेश के उपचुनाव
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न तुम जीते,न हम हारे
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मध्यप्रदेश विधानसभा की मुंगावली और कोलारस सीट के लिए हुए उप चुनाव में प्रदेश की सरकार सारे घोड़े छोड़ने के बाद भी जीत नहीं पायी लेकिन इन दोनों सीटों को बचाये रखने के लिए कांग्रेस को भी अपना खून-पसीना एक करना पड़ा .कहने को ये सीटें कांग्रेस और भाजपा की हार-जीत से जुड़ी हैं लेकिन हकीकत ये है की भाजपा ये दोनों सीटें हार कर भी अपने आप को हारा हुआ मानने को राजी नहीं यही और कांग्रेस ये दोनों सीटें जीत कर उतनी खुश नहीः है जितना की उसे होना चाहिए था .
पूरा प्रदेश जानता है की ये दोनों उप चुनाव किसी पार्टी की प्रतिष्ठा से नहीं अपितु दो नेताओं की निजी प्रतिष्ठा से जुड़े थे.एक और स्थानीय कांग्रस सांसद श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया थे तो दूसरी तरफ मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान थे .दोनों ने एक -दुसरे पर कितने प्रहार किये इसकी गिनती करना कठिन है .शिवराज सिंह ने अपनी प्रतिष्ठा बचने के लिए जहां अपनी पूरी कैबिनेट और सरकारी मशीनरी को मोर्चे पर तैनात कर रखा था वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपनी निजी फौज के अलावा कांग्रेस के असंख्य कार्यकर्ताओं के बूते मोर्चे पर डटे थे .
कोलारस और मुंगावली में सरकार का मुकाबला करने में सिंधिया और कांग्रेस को हालांकि पसीना आ गया लेकिन कांग्रेस के लिए संतोष की बात ये हो सकती है की उसने न केवल मुख्यमंत्री को बल्कि पूरी सरकार को पराजित करने में कामयाबी हासिल कर ली .
चुनाव नतीजे आने के बाद भाजपा के पास मुंह छिपाने के लिए एक ही ढाल है की इन उपचुनाव में उसके वोट बढ़े .भाजपा इस हार को हार मानने के लिए किसी भी सूरत में राजी ही नहीं है.जबकि भाजपा ने कांटे से काँटा निकालने की देशी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ उनकी सगी बुआ मंत्री श्रीमती यशोधरा राजे और उनकी दादी की भाभी मंत्री श्रीमती माया सिंह को मैदान में उतार दिया था .इस कोशिश में भाजपा के दोनों कांटें कांग्रेस का काँटा निकालते-निकालते खुद ही टूट गए .
भाजपा बार-बार भूल जाती है की उसकी जड़ों में सिंधिया की अनुकम्पा का रक्त आज भी प्रवाहित हो रहा है और इसी से उऋण होने के लिए भाजपा एक बार लोकसभा चुनाव में ग्वालियर से कांग्रेस से बाहर आकर चुनाव लड़ने वाले माधवराव सिंधिया के खिलाफ अपना प्रत्याशी मैदान से हटा चुकी है .आज भी इसी अहसान के चलते भाजपा मध्य्प्रदेश में यशोधरा राजे और माया सिंह से निर्वाह कर रही है.राजस्थान में भी सिंधिया परिवार की बेटी बसुंधरा राजे मुख्यमंत्री हैं .
कोलारस और मुंगावली खोने के बाद भाजपा के लिए उपचुनाव में होने वाली ये लगातार चौथी पराजय है. इससे पहले भाजपा चित्रकूट और अटेर विधानसभा उप चुनावों में हार का सामना कर चुकी है .बावजूद इसके भाजपा और मुख्यमंत्री पता नहीं क्यों आठ माह बाद प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर परेशान नजर नहीं आती .जबकि हकीकत ये है की मध्यप्रदेश में भाजपा को सत्तारूढ़ करने वाली सु श्री उमाभारती के बाद शिवराज सिंह चौहान की दशा कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जैसी हो चली है .किसी को बहुत हैरानी नहीं होना चाहिए जो अगले चुनाव में कांग्रेस शिवराज सिंह चौहान के लिए वही जुमला इस्तेमाल करे जो कभी भाजपा दिग्विजय सिंह के लिए किया करती थी .
विधानसभा के उप चुनाव भले ही विधानसभा के आम चुनाव के लिए सेमीफाइनल न हों लेकिन ये बात जाहिर है की भाजपा के लिए 2018 के विधानसभा चुनाव उतने आसान तो नहीं होने वाले जितने वो समझ कर बैठी है .बुन्देल खंड में कहते हैं की -‘मुंह दूर के थापड़ “जो है सब सामने आने ही वाला है.फिलहाल जो जीता वो ही सिकंदर कहा जाएगा और जो हारा वो चुकंदर .गुना के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी इस दोहरी जीत के बाद अपने फ़ौज-फांटे को नए सिरे से तैयार करना पडेगा ,क्योंकि अगला आम चुनाव भी विधानसभा चुनाव के फौरन बाद लड़ा जाना है.
@ राकेश अचल