/ मप्र: ये ‘कमल के फूल’ कुम्हलाने लगे हैं..! ०डॉ राकेश पाठक

1345

// मप्र: ये ‘कमल के फूल’ कुम्हलाने लगे हैं..!

०डॉ राकेश पाठक

लगातार पन्द्रह साल राज करने वाली पार्टी बीजपी की जमीन खिसकना जारी है। आज कोलारस और मुंगावली के नतीजों से जनता ने कह दिया है कि —

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कमल के फूल कुम्हलाने लगे हैं…।

इस साल के नवम्बर महीने में मप्र विधानसभा के चुनाव तय हैं।बीजपी लगातार तीसरा कार्यकाल पूरा कर रही है ।कांग्रेस हाशिये पर पड़ी है और सत्ता के लिए छटपटा रही है। नवम्बर में उसका वनवास खत्म होगा कि नहीं ये अभी से कहना मुश्किल है लेकिन फिलहाल कोलारस, मुंगावली ने उसे वापसी की राह तो दिखा ही दी है।

प्रदेश में शिवराज सिंह सरकार पिछले महीनों में हुए उपचुनाव हारती चली आ रही है। अटेर, चित्रकूट के बाद कोलारस, मुंगावली को सत्ता का सेमी फाइनल माना जा रहा था। दोनों सीटें कांग्रेसी दिग्गज ज्योतिरादित्य सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में हैं इसलिए उनके लिए ये उपचुनाव नाक का सवाल थे।

उधर बीजपी और खासकर शिवराज सिंह के लिए ये दोनों उपचुनाव बेहद अहम थे। उनकी अपनी लोकप्रियता सवालों के घेरे में है और पार्टी के भीतर भी खेमेबाजी चरम पर है।
ऐसे में शिवराज के लिए इन दोनों सीटों पर हार आगे की राह कठिन बनाने का काम करेगी।
वे सिर्फ यह कह कर फेस सेविंग नहीं कर सकते कि ये सीटें तो पहले भी कांग्रेस के पास ही रहीं हैं।
नतीजे बता रहे हैं कि खुद शिवराज सिंह जहाँ रुके, रोड शो किये पार्टी वहां भी गिनती के ही वोट हासिल कर सकी।

बीजपी और शिवराज सरकार ने इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों में जीत के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। मुख्यमंत्री ,दर्जनों मंत्री, विधायक, बेहिसाब घोषणाएं, ताबड़तोड़ दौरे और साम, दाम, दंड, भेद भी झौंक दिए गए। दूसरी तरफ कांग्रेस की कमान सिंधिया के हाथ थी। वे खुद सभी बड़े नेताओं को साथ लेकर मैदान में डटे रहे।
कमलनाथ, अजय सिंह,अरुण यादव, सुरेश पचौरी सब एकजुट दिखे। जो कांग्रेस गुटबाजी का शिकार रहती है वो एकजुट और अनुशासन का ढोल पीटने वाली बीजपी में सब बिखरे दिखे।

आज के नतीजे आगे क्या गुल खिलाएंगे देखना दिलचस्प होगा। कांग्रेस का चेहरे बनने का ज्योतिरादित्य सिंधिया का दावा बेहद मजबूत तो हो गया लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि पार्टी उन्हें सीएम कैंडिडेट घोषित करती है या नहीं। निर्विवाद रूप से इस दोहरी सफलता ने उनका कद बाक़ी नेताओं से ऊंचा कर दिया है।

उधर शिवराज सिंह को लेकर बीजपी के केंद्रीय नेतृत्व की त्यौरियां चढ़ना तय है। वैसे भी वे नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खास चहेते हैं भी नहीं। प्रदेश में सत्ता ,संगठन में नेतृत्व परिवर्तन
की बात उठेगी ही। यद्यपि अब भी बीजपी के पास शिवराज सिंह जैसा लोकप्रिय चेहरा दूसरा कोई नहीं है। ऐन विधानसभा चुनाव के आठ महीने पहले मुख्यमंत्री बदलना कम जोखिम का काम नहीं है। नरेंद्र मोदी के टूटते तिलिस्म के दौर में ये जोखिम पार्टी शायद ही उठाये।

नवम्बर में जब सर्दी धीरे धीरे बढ़ रही होगी मध्य प्रदेश चुनाव की गर्मी महसूस कर रहा होगा। दोनों पार्टियों के पास वक्त बहुत कम बचा है। उपचुनावों में लगातार हार ने बीजपी के माथे पर चिंता की लकीरें गहरीं कर दीं हैं और कांग्रेस के खेमे में खम ठोंकने की ताकत लौटा दी है।
देखना है नंवबर में चुनाव का ऊंट किस करवट बैठता है। फिलहाल जश्न मनाने की बारी कांग्रेस की है।